Daivalok Dharma Shastra-Daivyniyam

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Venkata Raju (Sri Rama Dharmaja) Founder Of This Is Divine Law


 

दैवलोक धर्मशास्त्र दैवी नियम
लेखक: एम. वेंकट राजू (श्री राम धर्मजा)

 

ईमेल: info@thisisdivinelaw.com

अनुवाद: वेंकटेश देवनपल्ली

 

सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पुस्तक का कोई भी भाग बिना प्रकाशक एवं लेखक की पूर्व लिखित अनुमति के पुनर्मुद्रित, संग्रहित, अथवा किसी भी प्रकार (इलेक्ट्रॉनिक, यांत्रिक, छायाप्रति, रिकॉर्डिंग या अन्य किसी भी माध्यम से) प्रसारित नहीं किया जा सकता, सिवाय संक्षिप्त उद्धरणों के जो समीक्षाओं, लेखों या शैक्षणिक कार्यों में प्रयुक्त होते हैं।

ग्रंथ परिचय

‘दैवी नियम’ (ईश्वरीय नियम)

विश्व में मौजूद सभी नियम एक ही परम नियम का अनुसरण करते हुए कार्य कर रहे हैं। उसी नियम को ‘दैव नियम’ (Divine Law) के रूप में वर्णित करते हुए, इस ग्रंथ ‘दैवलोक धर्मशास्त्र’ में विस्तारपूर्वक समझाया गया है।

इस नियम को पूर्णतः समझकर। इस ग्रंथ का मूल उद्देश्य यह है कि मनुष्य, मानवता से दिव्यता की ओर उन्नति करके मोक्ष प्राप्त करे तथा इस पृथ्वीलोक को दैवलोक (ईश्वरीय लोक) में रूपांतरित करे। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य को कुछ दैवी रहस्यों का ज्ञान होना आवश्यक है। इस ग्रंथ में उन्हीं दैवी रहस्यों को बहुत विस्तार से समझाया गया है।

दैवी रहस्य, कुछ सृष्टि के नियमों के रूप में कार्य करते हैं – इनमें से कुछ दृश्य रूप में भौतिक जगत में देखे जा सकते हैं, और कुछ अदृश्य होते हैं, जो अतीन्द्रिय शक्तियों के रूप में क्रियाशील रहते हैं। जैसे, मनुष्य ने जल और अग्नि के धर्म (स्वभाव) को समझ लिया है, इसलिए वह उनका अनुकूल उपयोग कर रहा है और उनसे होने वाले संकटों से बचाव भी कर रहा है। किंतु जो अदृश्य अतीन्द्रिय शक्तियाँ हैं, उन्हें न समझ पाने के कारण वह अनेक पीड़ाओं का शिकार हो रहा है तथा उन शक्तियों को अपने अनुकूल नहीं बना पा रहा है।

इस ग्रंथ में यह स्पष्ट किया गया है कि अतीन्द्रिय शक्ति क्या है, उसे जानने से कौन से संकट टल सकते हैं, और उसे कैसे जागरूकता तथा विवेक के माध्यम से अपने हित और लोकहित में परिवर्तित किया जा सकता है।

इस ग्रंथ में सृष्टि के रहस्यों को अत्यंत सरल भाषा में बताया गया है, जिससे प्राथमिक विद्यालय का विद्यार्थी भी इन्हें समझ सके। यह ग्रंथ पाठकों को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक – दोनों दृष्टियों से स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।

इस ग्रंथ का अध्ययन करने के पश्चात् पाठक की प्रकृति और पदार्थों को देखने की दृष्टि बदल जाएगी। जब यह शास्त्र पूर्ण रूप से समझ में आता है, तब पाठक इस जगत को उसी दृष्टिकोण से देखता है, जैसा कि उसे देखना चाहिए। इस प्रकार, सृष्टि के रहस्यों की एक संपूर्ण और गहन समझ विकसित होती है।

            अल्बर्ट आइंस्टीन, स्टीफन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों ने यह परिकल्पना की थी कि Theory of Everything – अर्थात् “सभी सिद्धांतों का एकमात्र नियम” -हो सकता है, जो पूरे ब्रह्मांड के सभी नियमों को नियंत्रित करता है। इस ग्रंथ में बताया गया है कि वे जिस नियम की कल्पना कर रहे थे, वह कोई भौतिक नियम नहीं है। वह नियम पहले मानसिक स्तर पर अस्तित्व में आता है, तत्पश्चात् भौतिक स्वरूप धारण करता है। इसी नियम को इस ग्रंथ में ‘दैव-नियम’ (ईश्वरीय नियम) के रूप में विस्तार से समझाया गया है।

इस दैव-नियम का सभी जीव किस प्रकार उपयोग करते हैं, और मनुष्य इस नियम का सकारात्मक या नकारात्मक रूप में किस प्रकार उपयोग करता है – इन सभी पहलुओं की चर्चा इस ग्रंथ में की गई है।

 कृतज्ञता

 माता-पिता के प्रति

मेरे जीवन में मेरे पिताजी की जीवनचर्या और उनके अनुभवों ने मुझे अनेक अमूल्य पाठ सिखाए। उनके जीवन से मैंने विपुल सांसारिक ज्ञान अर्जित किया। इस संसार का प्रथम दर्शन कराने वाले मेरे पिताजी ही हैं। प्रारंभ से ही वे उन सभी के संबल बने रहे, जिन्होंने उन पर विश्वास किया, और उन्होंने अनेक लोगों के जीवन को आलोकित किया। उन्होंने जो मूल्य मुझे प्रदान किए, वे मेरे जीवन के लिए अनमोल निधि हैं।

पिताजी का शारीरिक रूप से हमारे बीच न होना ऐसा अभाव है, जिसे शब्दों में व्यक्त कर पाना मेरे लिए असंभव है। यद्यपि वे भौतिक रूप से दूर हैं, फिर भी मेरे हृदय के अत्यंत निकट हैं। मैं अपने पितृदेव, कीर्तिशेष श्री मंजुल वेंकटेश्वरलु जी को साष्टांग प्रणाम करता हूँ।

मैं हृदय से प्रार्थना करता हूँ कि उनके आशीर्वाद और अनुग्रह सदा मुझ पर बने रहें। निःनिस्वार्थ भाव से मेरे कल्याण के लिए निरंतर प्रयत्न करने वाली मेरी मातृ मूर्ति श्रीमती मंंजुला रमणम्मा और मुझे अपने पुत्र के समान स्नेह देने वाली माता श्रीमती मंंजुला लक्ष्मी देवी जी को साष्टांग प्रणाम।
उनके प्रेम, त्याग, धैर्य और समर्थन के लिए मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ।

     मेरे विवाह के दिन से ही अपनी अटूट प्रेम, सहयोग और निरंतर परिश्रम के साथ मेरे प्रत्येक कदम पर साथ खड़ी रहीं मेरी पत्नी पुष्पांजलि जी के प्रति मैं हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। हमारे जीवन में दुर्लभ रत्नों के समान दो अमूल्य संतान प्रदान करने वाले उनके मातृत्व के प्रति मैं सदैव ऋणी रहूँगा।

इसी प्रकार, मुझे सहारा देकर, स्नेहपूर्वक अपनापन दिखाने वाले मेरे तीनों छोटे भाइयों तथा उनके परिवारों को, मेरी दोनों बहनों और उनके परिवारों को भी मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।

साथ ही, मेरे जीवन यात्रा में मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर चले, हर आवश्यकता के समय मेरा संबल बने मेरे रिश्तेदारों, मित्रों और समाज के सत्सहचरों के प्रति भी मैं अपनी हृदय से कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।

ब्रह्मज्ञानी वशिष्ठ, वाल्मीकि और व्यास मुनियों को

इस ग्रंथ में ‘अतीन्द्रिय शक्तियों’ के विषय में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इनके प्रमाणस्वरूप, मैंने महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण की घटनाओं को प्रस्तुत किया है। इसी प्रकार, महर्षि वेदव्यास द्वारा वर्णित दशावतारों के माध्यम से अंतर्निहित रूप से विकास सिद्धांत (Evolution Theory) का ही प्रतिपादन किया गया है — इस तथ्य को सभी को समझना चाहिए। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने लोक को महान ज्ञान प्रदान किया।

इस अवसर पर मैं ब्रह्मज्ञानी महर्षि वशिष्ठ, महर्षि वाल्मीकि, व्यासभगवान तथा अन्य ऋषियों के प्रति अपनी हार्दिक भक्ति और कृतज्ञता अर्पित करता हूँ।

आचार्य मसना चेनप्पा जी के प्रति:

इस ग्रंथ की रचना पूर्ण होने के बाद, इसे उस्मानिया विश्वविद्यालय के तेलुगु विभाग के पूर्वाध्यक्ष आचार्य मसना चेनप्पा जी को परीक्षण और उचित सुझावों हेतु विनम्रतापूर्वक प्रस्तुत किया गया। तेलुगु भाषा पर उनकी असाधारण प्रतिभा के साथ उन्होंने इस ग्रंथ का अत्यंत धैर्यपूर्वक अवलोकन कर इसे और अधिक परिष्कृत किया। अपने अमूल्य समय को समर्पित करने के लिए मैं उनके प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। वे केवल भाषा और शास्त्र ज्ञान में ही निपुण नहीं, बल्कि उच्च नैतिक मूल्यों से युक्त श्रेष्ठ स्वभाव वाले व्यक्तित्व भी हैं। निर्मल मुस्कान के साथ स्वागत करने वाले आत्मीय स्वभाव के धनी हैं। मैं प्रार्थना करता हूँ कि उन पर सदैव दैवी अनुग्रह बना रहे और वे स्वस्थ एवं आनंदमय जीवन व्यतीत करें।

मुझे उनसे परिचित कराने वाले श्री बेतवोलु रामब्रह्मम जी और प्रोफेसर नित्यानंद राव जी के प्रति भी मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ।

ब्रह्मर्षि श्री चागंटी कोटेश्वर राव गुरु के प्रति:

मैं ब्रह्मर्षि श्री चागंटी कोटेश्वरराव जी के उपदेशों को टेलीविज़न माध्यम से सुनता रहता हूँ। पवित्र हृदय से धर्मपरायण नैतिक विषयों का उपदेश देने वाली उनकी वाणी-शक्ति मुझे अत्यंत शांति और आनंद प्रदान करती है। समाज के कल्याण की अभिलाषा रखते हुए अनेक अमूल्य विषयों का ज्ञान कराने वाले ब्रह्मर्षि श्री चागंटी कोटेश्वरराव जी को मैं अपनी हृदयपूर्वक प्रणाम अर्पित करता हूँ।

श्री व्यंकटेश देवनपल्ली जी के प्रति:

व्यंकटेश देवनपल्ली जी को हिंदी भाषा के साथ-साथ शास्त्रों का भी उत्कृष्ट ज्ञान है। उन्होंने इस ग्रंथ के प्रत्येक विषय को अपनी विद्वत्ता और गंभीर दृष्टिकोण से बारीकी से परखा, समझा और अनूदित किया। जहाँ कहीं कोई संदेह उत्पन्न हुआ, वहाँ उसे समाधान करके ही आगे बढ़े। उन्होंने अपने बहुमूल्य समय का सदुपयोग करते हुए ‘दैवलोक धर्मशास्त्र’ इस मूल तेलुगु ग्रंथका हिंदी में सुंदर अनुवाद किया है। इसके लिए मैं उन्हें हृदय से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। इन्हें परिचित कराने वाले आचार्य मसना चेनप्पा जी को हृदयपूर्वक धन्यवाद।

पाठकों से निवेदन

इसे धार्मिक ग्रंथ न समझें।; यह ज्ञान का ग्रंथ है। प्राचीन काल में दिव्य नियमों का कैसे उपयोग किया गया, इसे समझाने के लिए रामायण और महाभारत से कुछ घटनाएँ प्रस्तुत की गई हैं।

यदि इन बातों को स्वीकार करके उनके सार पर विचार करने की दृष्टि से इस ग्रंथ को पढ़ा जाए, तो पाठक पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर श्रेष्ठ फल प्राप्त कर सकते हैं।

इसी प्रकार, इस ग्रंथ में दुरूह परिस्थितियों का वर्णन किया गया है। वे परिस्थितियाँ केवल कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं हैं। विश्व के अत्यधिक विकसित देशों में भी लोग इन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। मैंने इन्हें मीडिया के माध्यम से देखते आया हूँ। मैं हृदय से कामना करता हूँ कि ये कष्ट शीघ्र ही समाप्त हों और लोग शांतिपूर्ण तथा आनंदमय जीवन व्यतीत करें।                      

                                                                                                                                                                                                          आपका विनीत

                                                                                                                                                                                   एम. वेंकट राजू (श्री राम धर्मजा)

                     

         Contents

  1. दैवी सभा… 12
  2. दैव लोक धर्म शास्त्र का आविर्भाव: 13
  3. दैवी शक्ति का श्रीराम के मन से संवाद.. 15
  4. श्रीराम का लोक-संचार. 18
  5. श्रीराम ने विश्व की दुर्दशा देखकर महाशक्ति से अपने दुख को व्यक्त करते हुए कहा –. 19
  6. श्रीराम ने इस लोक को दिव्य लोक में बदलने की अपनी संकल्पना प्रकट करना: 23
  7. ‘दैवी शक्ति’ द्वारा दिव्य लोक बनने का मार्ग बताना: 24
  8. दिव्य लोक बनाने के लिए श्रीराम को करने योग्य कार्यों का दैवी शक्ति द्वारा प्रकट किया जाना… 26
  9. श्रीराम द्वारा सृष्टि के रहस्यों से जुड़े संदेह व्यक्त करना… 27
  10. दैवी शक्ति द्वारा दिव्य रहस्यों का उद्घाटन: 29
  11. मन और शक्ति के अविनाभाव संबंध के बारे में बताना… 30
  12. आत्म-ज्ञान का उपदेश.. 31
  13. जीव का मनोबल और मनोविश्वास प्राप्त करने की प्रक्रिया… 33
  14. जीव द्वारा विषय की भावना करने से कर्म आरंभ होता है।. 35
  15. जीव की मानसिक भ्रांति और विश्वास के अनुसार कार्यरत शक्ति: 36
  16. द्रष्टा (जीव) की दृष्टि के अनुसार दृश्य (पदार्थ, शरीर) आधारित होता है। 38
  17. जीव भूतकाल के कर्मों के प्रभाव से वर्तमान में कर्मफलों को जड़ रूप में अनुभव कर रहा है।. 45
  18. दृश्य के प्रभाव से जीव का मानसिक दृष्टिकोण बदल जाना: 46
  19. विश्व में दो प्रकार की शक्तिशाली आत्माओं का विवरण.. 53
  20. परिपालक आत्मा और सहायक आत्माओं को विभिन्न भौतिक धर्म प्रदान करना: 55
  21. आत्मा का अस्तित्व… 57
  22. 22. जीव की त्रिविध देह (तीन प्रकार की शरीर धारणा): 65
  23. 23. संकल्प के अनुरूप जीवों का शरीर व इन्द्रियाँ प्राप्त करना… 66
  24. भौतिक शरीर की रचना: 67
  25. इंद्रियों और अंगों का शक्तिशाली रूप में रूपांतरित होना: 73
  26. जीव की यात्रा – बल का समीकरण: 79
  27. जीव के विश्वास के अनुरूप अतिंद्रिय रूप में कार्य करने वाली शक्ति: 80
  28. योग और व्यायाम द्वारा मानव शरीर को शक्तिशाली बनाना: 82
  29. साधना से शरीर के अंगों में गुणात्मक परिवर्तन: 84
  30. प्रकृति जीव को स्वयं की रक्षा प्रदान करती है।. 86
  31. जीव अमर है। वह शरीर में दिव्य तत्त्व के रूप में विद्यमान रहता है। 86
  32. जीव की मनोवृत्ति के अनुसार कार्य करने वाली शक्ति….. 88
  33. जीव का ज्ञान संस्कार रूप में: 92
  34. विकसित शरीर-ज्ञान को जीव प्राप्त कर रहा है.. 93
  35. दैवी शरीर तक का विकासक्रम.. 95
  36. भविष्य के अनुरूप शरीर की रचना और सृष्टि का निर्माण: 100
  37. सृष्टि के क्रम में और संतुलन में स्थापित किए गए धर्म.. 101
  38. जगत-शरीर (ब्रह्मांड) की रचना… 103
  39. जीव का अंतरिक्ष में दिव्य-शक्ति प्राप्त करना… 104
  40. जीव का शरीर — योग और भोग शरीर के रूप में विविध धर्मों से युक्त 110
  41. लौकिक विषयों में कर्म का प्रभाव.. 118
  42. धर्म से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति…. 126
  43. दैव-लोक धर्मशास्त्र…. 127
  44. (क्रोध) 147
  45. शील (चरित्र) 149
  46. मन और बुद्धि…. 149
  47. सत्य… 154
  48. ज्ञान.. 159
  49. शौच (शुद्धता) 160
  50. शरीर – उपयोगिता… 162
  51. देही – शरीर. 163
  52. शम (आंतरिक शांति) 167
  53. संतोष.. 168
  54. दिव्यलोक प्रशासन प्रणाली. (DIVINE RULE) 170

1. दैवी सभा

धर्माचार्य: सभा को मेरा प्रणाम। सभा में पधारे सभी वरिष्ठजनों, मित्रों और कल्याण-चिंतकों को मेरा वंदन। हमारे ऋषि-मुनि प्राचीन काल से एक महत्वपूर्ण बात कहते आ रहे हैं, जो हमें परंपरागत रूप से ज्ञान के रूप में प्राप्त हुई है — “धर्मो रक्षति रक्षितः”। इसका अर्थ है — यदि हम धर्म की रक्षा करेंगे, तो धर्म हमारी रक्षा करेगा।

धर्म एक शक्तिशाली गुण है। “धर्म” शब्द अच्छाई का पर्यायवाची माना जाता है। सत्कर्म, सद्मार्ग, ज्ञान, अनुशासन, संयम, नियम, सिद्धांत, नीति, न्याय, सत्य, जिम्मेदारी, आजीविका, व्यवसाय, कर्तव्य-निष्ठा आदि — सभी ज्ञान से जुड़ी बातें धर्म का सार हैं। धर्म के विपरीत, बुराई के लिए “अधर्म” शब्द का प्रयोग होता है। अधर्म, अज्ञान, असत्य, दुष्कर्म, दुर्गुण, भ्रष्टाचार, अन्याय, गैर-जिम्मेदारी जैसी प्रवृत्तियाँ अज्ञान के संकेत मानी जाती हैं। धर्म, ज्ञान और सत्य का प्रतीक है; जबकि अधर्म, अज्ञान और असत्य का प्रतीक है।

 मनुष्य जब धर्म से भटक जाता है, तो उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। अतः लोगों को निडर और निश्चिंत जीवन जीने के लिए धर्म का सहारा लेना चाहिए तथा सदैव जागरूक रहते हुए धर्म का आचरण करना चाहिए। धर्म के महत्व को समझने वाले हमारे पूर्वज और शासक भी इसकी रक्षा करते हुए, जनकल्याण की भावना के साथ, धर्ममार्ग का अनुसरण करते आए हैं। अनादि काल से धर्मशास्त्र मानव के आचरण के लिए दिशा-सूचक बना हुआ है।

कालक्रम में धर्म लुप्त होता गया और अधर्म का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
अनेक लोगों द्वारा धर्म का आचरण न किए जाने के कारण संसार अत्यंत दुरवस्था में पहुँच गया।

इन दुष्परिस्थितियों को जड़ से समाप्त करने हेतु एक धर्मशास्त्र का आविर्भाव हुआ।
यह बार प्रस्तुत किया गया धर्मशास्त्र कोई सामान्य धर्मशास्त्र नहीं है, बल्कि “दैवलोक धर्मशास्त्र” है।

दैवलोक धर्मशास्त्र को जानकर, उसका आचरण करके तथा दूसरों को भी उसका पालन करवाने से यह लोक दैवलोक के रूप में विराजमान होगा।
दैवलोक में देवताओं द्वारा जिस प्रकार के धर्म का पालन किया जाता है, उसी प्रकार का धर्म मानव जाति को अनुग्रहित किया गया है।

2.  दैव लोक धर्म शास्त्र का आविर्भाव:

अब मैं विस्तार से बताऊँगा कि दैवलोक धर्मशास्त्र कैसे प्रकट हुआ। ध्यानपूर्वक सुनिए।

 

एम. वेंकट राजू उर्फ़ श्री राम धर्मज जी ने इस धर्मशास्त्र को विश्व के समक्ष प्रकट किया है।

माता-पिता द्वारा प्रदत्त नाम वेंकट राजू होने के बावजूद, उन्हें रामधर्मज नाम से पुकारने के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक कारण है।

राम नाम — आत्मा और जीव का प्रतीक है।
धर्मज नाम — महाशक्ति और प्रकृति का प्रतीक है।

इन दोनों तत्वों के बीच हुई दिव्य संवाद ही इस ग्रंथ के रूप में आपको प्रस्तुत की जा रही है।

हे भक्तजनो! मैं जो रहस्य बताने जा रहा हूँ, उसे सावधानीपूर्वक सुनिए। जब भी हमें कोई शंका उत्पन्न होती है, उसका उत्तर ‘शक्ति’ से प्राप्त होता है। ‘शक्ति’ पूरे ब्रह्मांड में, प्रारंभ से अंत तक, प्रत्येक कण और उसकी गति की जानकारी जीव को दे सकती है तथा उन गतियों में परिवर्तन भी कर सकती है। प्रत्येक जीव के भीतर यह शक्ति विद्यमान रहती है, और वही शक्ति उसकी शंकाओं का समाधान भी करती है। जीव जितना तप, साधना और संकल्प-बल रखता है, ‘शक्ति’ उतनी ही समर्थता से उसकी इच्छाओं के अनुरूप कार्यों को पूर्ण करती है।यदि इसे पूर्ण रूप से समझ लिया जाए, तो नरक समान लोक को भी स्वर्ग लोक में परिवर्तित किया जा सकता है।

परमाणु से लेकर ब्रह्मांड तक, उनकी दृष्टि में आए प्रत्येक विषय को उन्होंने स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है।
उनमें निहित परम सत्य और महान दोषों को भी उन्होंने उद्घाटित किया है।

पदार्थ क्या है और परमार्थ क्या है,
सारवान क्या है और निस्सार क्या है —
इन सभी का सूक्ष्म भेद उन्होंने अपनी “शक्ति” के माध्यम से भली-भांति पहचानकर स्पष्ट किया है।

उनकी दृष्टि में आए अनेक विषयों के संबंध में,
उनकी महान शक्ति द्वारा प्रकट किए गए अद्भुत और दिव्य समाधानों को
यहाँ आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।

वर्तमान काल में, जब वह इस पृथ्वी पर विचरण कर रहा था, तब उसकी दृष्टि में जो अनेक बातें आईं, उन पर उसने अपनी ‘शक्ति’ से जो अद्भुत समाधान किए — वही समाधान अब मैं आपको बताने जा रहा हूँ। उसे अनेक नामों से पुकारा जाता है, किंतु वर्तमान में, उसकी स्थिति और जन्मकाल के अनुसार, दैवी शक्ति उसे “श्रीराम धर्मज” नाम से संबोधित करती है।

प्रत्येक व्यक्ति में उसके पिछले जन्मों के संस्कार ज्ञान के रूप में स्मृतियों और अनुभवों के रूप में विद्यमान रहते हैं। ये संस्कार इस जन्म में हमारे द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य में उनकी छाप के रूप में अनुभव में आते रहते हैं और उन कार्यों को प्रभावित करते रहते हैं। ये हमें जो कार्य करना है, उसके लिए प्रेरित भी करते हैं। चाहे वह कार्य अच्छा हो या बुरा, स्मृति कराना संस्कार ज्ञान का स्वभाव होता है। इसी प्रवृत्ति के कारण श्रीराम जब इस पृथ्वी पर जन्मे, तो 14 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही उन्हें कई पूर्वजन्मों के अनुभव स्मृति के रूप में आने लगे थे।

इस सृष्टि के जगनाट्य रूपी संसार और सृजनात्मक, विविधताओं से भरी प्रकृति को देखकर उनके मन में अनेक प्रकार के प्रश्न और संदेह उठते रहते थे। वे उनकी स्थितियों और परिस्थितियों के बारे में सोचते और मनन करते रहते थे।

श्रीराम अपने मन में गहन चिंतन करते हुए विचार कर रहे थे—
मुझे संचालित करने वाली वह शक्ति कौन-सी है?
इस सृष्टि को स्थिर रूप से बनाए रखने वाला कौन है?
इसे सही दिशा में संचालित करने वाला कौन है?

पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि जैसे पंचतत्त्व
पृथ्वी पर जीवों के अस्तित्व के लिए
समान और संतुलित अनुपात में कैसे विद्यमान हैं?
इन सभी को नियंत्रित करने वाला कौन है?

इस प्रकार अनेक शंकाओं और विचारों में डूबे हुए श्रीराम चिंतनरत रहते थे।
ऐसे ही गहन चिंतन के समय, “शक्ति” श्रीराम के मन से जुड़कर
इस प्रकार संवाद करती है।

3. दैवी शक्ति का श्रीराम के मन से संवाद

महाशक्ति: हे श्रीराम! शांत हो जाओ। इस आयु में इतनी तीव्र जिज्ञासा करना श्रेयस्कर नहीं है। बहुत जल्द तुम्हें सब प्रश्नों के उत्तर जान जाओगे। मैं ही तुम्हारी शक्ति हूँ। मैं तुम्हारे अंतर में अंतरवाहिनी के रूप में विद्यमान हूँ। मैं ही महाशक्ति हूँ, तुम्हारे संदेहों, इच्छाओं और संकल्पों को पूर्ण करने वाली ‘दैवी शक्ति’ हूँ। तुम्हारे मन में कोई भी संकल्प उत्पन्न होता है तब देश-काल के अनुसार उसे पूर्ण करना मेरा धर्म है। यदि तुम आनंद चाहते हो तो आनंद, धन चाहते हो तो धन, अन्न चाहते हो तो अन्न, संतान चाहते हो तो संतान मैं तुम्हें प्रदान करती हूँ। तुम चाहो या न चाहो, देश-काल और परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न कार्यों को प्रेरित करना, विभिन्न आजीविकाओं का प्रबंध करना मेरा धर्म है। हे श्रीराम! जब भी तुम किसी कार्य का संकल्प करोगे, उस कार्य को निर्विघ्न रूप से संपन्न कराने वाली ‘धर्मजा’ मैं ही हूँ। अब तक तुम मेरी शक्तियों और उपायों से ज्ञात थे, पर इस समय तुम्हें पूर्व ज्ञान का विस्मरण हो चुका है। देश और काल की महिमा तथा देह के नियमों के कारण तुम्हें इसकी प्रतीति नहीं हो रहा है। शीघ्र ही तुम्हें सब ज्ञान हो जाएगा।

श्रीराम: हे धर्मजा (महाशक्ति)! मैं तुम्हारी शक्ति को समझ पा रहा हूँ। वर्तमान में मैं अनेक विचारों और संदेहों से परेशान हूँ, मेरा मन स्थिर नहीं हो रहा है, मुझे समझ नहीं आ रहा कि ये विचार क्यों आ रहे हैं। इन विचित्र परिस्थितियों का कारण क्या है, कृपया बताओ। मेरे मन में जो विचार आ रहे हैं, उन्हें मैं तुम्हें सुना रहा हूँ, कृपया उन्हें सुनो।

महाशक्ति: हे श्रीराम! तुम्हारे मन में जो विचार उठ रहे हैं, उन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूँ । तुम्हारे मन में उत्पन्न होने वाले ये विचार पूर्वजन्म की स्मृतियाँ हैं। अभी तुम्हारी आयु ऐसी नहीं कि तुम सब बातें समझ सको। जब उपयुक्त आयु और समय आएगा, तब मैं तुम्हें सब विस्तार से बताऊँगी। इस समय मैं तुम्हें कुछ बातें स्पष्ट कर रही हूँ, ध्यान से सुनो।

राम! तुम्हारे भीतर विद्यमान पूर्व संस्कारों की शक्ति के कारण ही वे तुम्हें प्रभावित कर रहे हैं।
तुम्हारे भीतर स्थित संस्कारजन्य ज्ञान का प्रकट होना उसका स्वभाव है।
परंतु यह समय उपयुक्त न होने के कारण मैं उसे नियंत्रित कर रही हूँ।

तुम्हारी शक्ति और ज्ञान को मैं देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित करती हूँ और प्रकट करती हूँ।
देश–काल की परिस्थितियों के अनुरूप तुम उन स्थितियों के अधीन रहते हो —
यही मेरा धर्म है।

जब समय समीप आता है, तब पूर्व ज्ञान स्वतः स्मरण में प्रकट हो जाता है।

हे श्रीराम! तुम किस चीज़ के लिए प्रयासरत हो? तुम कौन-सा संकल्प कर रहे हो? उसके अनुसार ही मैं देश-काल की परिस्थितियों के अनुरूप तुम्हें आवश्यक ज्ञान, शक्ति और संपत्ति प्रदान करती हूँ। तुम्हें इन शक्तियों का उपयोग करने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि तुम अपनी प्राप्त शक्तियों का उपयोग किस कार्य के लिए करना चाहते हो। तुम्हारे पास जो यह दिव्य, अद्भुत ज्ञान है, उसे महान कार्यों और लोक कल्याण के लिए उपयोग करने से ही इसका सार्थकता प्राप्त होगी। इसके लिए तुम्हें इस संसार की परिस्थितियों को समझना होगा। जब तुम्हारा उचित आयु आएगा, तब मैं तुम्हें उन कार्यों में योग्य मार्गदर्शन करूँगी। तुम्हें जो विभिन्न अनुभव मिल रहे हैं, उनके साथ-साथ वर्तमान सांसारिक और पारमार्थिक विषयों का भी ज्ञान होना आवश्यक है। तभी तुम अपनी शक्ति, धन, बल और ज्ञान का श्रेष्ठ मार्ग में उपयोग कर सकोगे और लोक कल्याण में लगा सकोगे। मैं तुम्हें अच्छे और बुरे परिस्थितियों में स्थापित करती रहूँगी और उचित दिशा में मार्गक्रमित करते रहूँगी। इन परिस्थितियों में विचलित हुए बिना स्थितप्रज्ञ बने रहो। तभी तुम्हें जो पाना है, उसमें सही समझ प्राप्त होगी। तब तक धैर्य रखो, अधिक चिंता मत करो और शांतचित्त बने रहो। अपने बाल्यकाल का आनंद लो। जैसे ही तुम यौवन में प्रवेश करोगे, तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जाएगा कि श्रेष्ठ क्या है।

श्रीराम: हे महाशक्ति! मेरे मन के संदेहों को दूर करने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। मुझे सही मार्ग पर ले जाने के लिए मैं तुम्हारा आभारी हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आगे भी तुम मुझे उत्तम मार्ग पर चलाती रहो।

महाशक्ति: भविष्य में अच्छे कार्यों की सिद्धि के लिए वर्तमान में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहो। सब कुछ अच्छा ही होगा। तुम्हें विजय प्राप्त हो।

धर्माचार्य: पूर्व जन्म की स्मृतियों के अनुभव से उत्पन्न संदेहों से ग्रस्त श्रीराम को दैवी शक्ति द्वारा शांत किए जाने के बाद, उन्होंने अपने मन के संदेहों को त्यागकर अत्यंत शांति और मनोबल के साथ अपने बाल्यकाल का आनंद लिया। वे अन्य बच्चों के साथ खेल-कूद में खुश रहते हुए प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर आगे अपने पिता के मार्गदर्शन में चलते रहे।

     4. श्रीराम का लोक-संचार

जब श्रीराम युवावस्था में पहुँचे, तब विधि ने उन्हें उनके नियत कार्य की ओर ले जाना शुरू किया। श्रीराम का लोक-संचार प्रारंभ हुआ। महाशक्ति श्रीराम को संसार की ऊँच-नीच स्थितियों में ले जाकर विभिन्न अनुभवों से परिचित करा रही थी। श्रीराम अनेक घटनाओं और परिस्थितियों को देख रहे थे और लोक व्यवहार का सूक्ष्मता से निरीक्षण कर रहे थे। कभी वह अत्यंत गरीबों के बीच रहकर उनकी जीवन स्थितियों को देख रहे थे, तो कभी धनी बनकर उनमें से एक की तरह जी रहे थे। वे विभिन्न संस्थाओं और व्यवस्थाओं में कर्मचारी के रूप में, तो कभी कई व्यापारों में व्यापारी के रूप में रहकर उनके व्यवहार के तरीके को समझते रहे। कालांतर में उन्होंने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। वर्षों से लोगों की जीवनशैली, उनके व्यवहार और शासकों की शासन पद्धति का अवलोकन करने के बाद श्रीराम ने महसूस किया कि संसार बहुत ही विकट और दयनीय स्थिति में, अव्यवस्थित और संकटग्रस्त है। विभिन्न स्थानों पर दुनिया की दशा को देखकर श्रीराम का हृदय दुख और चिंता से व्याकुल हो उठा। शासकों के व्यवहार और जनता की जीवनशैली को देखकर वे मन ही मन क्रोधित और निराश हो गए और चुपचाप चिंता में डूब गए।

5. श्रीराम ने विश्व की दुर्दशा देखकर महाशक्ति से अपने दुख को व्यक्त करते हुए कहा –

श्रीराम: महाशक्ति! संसार में लोगों और शासकों का व्यवहार, उनके द्वारा किए जा रहे अन्याय और अधर्म को देखकर मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ। उनके आचरण में निराशा और उदासीनता स्पष्ट झलक रही है। लोगों में उत्साह और शांति का अभाव है। वे अपना जीवन निर्भय होकर नहीं जी पा रहे हैं। उनके मुख पर भय और चिंता स्पष्ट दिखाई दे रही है। शासकों का शासन भ्रष्ट और अत्याचारी है। प्रजा के सुख-समृद्धि की कामना करते हुए शासकों को धर्मपूर्वक शासन करना चाहिए, परंतु कई शासक अधर्म और शोषण द्वारा जनता को पीड़ित कर रहे हैं।

विभिन्न संस्थाओं में कार्यरत कर्मचारी और अधिकारी अपने कर्तव्यों का दायित्वपूर्वक निर्वाह नहीं कर रहे हैं। उनके कार्यों में उपेक्षा, अनुत्तरदायित्व और आलस्य स्पष्ट दिखाई दे रहा है। लोग एक-दूसरे से ईर्ष्या और द्वेष में जल रहे हैं। कोई भी प्रेम और सद्भाव से व्यवहार नहीं कर रहा है। उनमें अज्ञानता का गहन अंधकार व्याप्त है।

भ्रष्टाचार, उत्पात, अभिमान जैसी अनेक अवांछनीय व्यवहार ने लोगों को जकड़ रखा है।

संसार में शांति और आनंद का अभाव है। अपार शक्ति और महान ज्ञान से युक्त मनुष्य पशुओं की तरह व्यवहार कर रहा है। उसका मन अत्यंत करुणाजनक स्थिति में है। एक-दूसरे से व्यवहार में घोर अज्ञान और संवेदनहीनता परिलक्षित हो रही है।

माया देवी! संसार में स्थिर आर्थिक स्थिति, शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति से बढ़कर कोई ऐश्वर्य नहीं है, लेकिन आज दुनिया में लोग आर्थिक असमानता और भय व चिंता के बीच जीवन जी रहे हैं। अज्ञान और अधर्म के कारण ही हर जगह बेहद दयनीय परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं।

संसार में धन अर्जन के लिए अनेक प्रकार के छल- कपट हो रहे हैं । दूध मिलावटी है, पानी प्रदूषित है, भोजन भी अशुद्ध किया जा रहा है। तरह-तरह की छलपूर्ण व्यवस्थाओं से लोग पीड़ित हो रहे हैं।

लोग धन के लिए जुआ, कपट और लोभ जैसे अधर्म के मार्ग पर चल रहे हैं। पूरी दुनिया में अज्ञान का अंधकार चारों ओर फैल गया है।

लोग ऐसे कई निरर्थक और अनुपयोगी कामों में भी उत्साहपूर्वक जुट रहे हैं, जिनकी दुनिया को कोई आवश्यकता नहीं है। लोग अपना सारा समय व्यर्थ कर रहे हैं, लेकिन उन्हें श्रेष्ठ और सार्थक परिणाम कभी नहीं मिल पा रहा है।

मन में अनेक दोष और कुसंस्कार घर कर गई हैं। लोभ के कारण मनुष्य बुद्धिहीन, गुणहीन और शक्तिहीन बन गया है तथा हर क्षण अनेक व्यसनों में डूबा हुआ रहता है। अंतःकरण में उत्पन्न होने वाले दुष्ट संकल्प ही इस जीव को दीन-हीन बना रहे हैं।

शासक को प्रजा को अपने संतान के समान समझना चाहिए, और प्रजा को शासक को अपने पिता के समान मानकर उसका सम्मान करना चाहिए। लेकिन वर्तमान संसार में शासक प्रजा को वर्गभेद के आधार पर देख रहा है, उन्हें अपमानित कर रहा है। वहीं प्रजा भी शासक को जाति, धर्म, वर्ग और समूह के भेद के आधार पर चुन रही है और दूसरों को शत्रु की दृष्टि से देख रही है।

काले-गोरे के भेद, जातिवाद, और सांप्रदायिक वैमनस्य के कारण पूरी दुनिया में अफरा-तफरी और अराजकता का माहौल बना हुआ है।

दुनिया में ड्रग्स, ब्लैकमेल, साइबर ठगी जैसी चालाक और धोखाधड़ी से भरी गतिविधियों के जरिए अवैध तरीके से पैसा कमाने वालों की संख्या बहुत बढ़ गई है। कई लोग इन गलत रास्तों के गुलाम बन चुके हैं।

मेहनत से कमाने वालों को उचित प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। जो लोग कठिन परिश्रम से भी गुजारा कर रहे हैं, वे भी लुटेरों के हाथों लुटकर अपनी मेहनत का उचित फल नहीं पा रहे हैं, जिससे भूख और दुख में डूबकर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।

सत्यनिष्ठा से किए जा रहे व्यापार लाभ नहीं दे रहे हैं, जिससे कई लोग कर्ज में डूबकर दिवालिया हो रहे हैं। इसके उलट, बेईमानी और अनैतिक तरीकों से किए जा रहे व्यापार ही खूब फल-फूल रहे हैं।

संसार में कल तक ऐश्वर्य में रहने वाला व्यक्ति, दूसरे ही दिन सब कुछ गंवाकर भिखारी बन जा रहा है। आर्थिक परिस्थितियाँ बेहद कमजोर हो चुकी हैं। कहीं भी आर्थिक स्थिरता नजर नहीं आ रही है।

वर्तमान में अनेक कुशल लोग अनुद्योग के कारण असहाय और निष्क्रिय बैठे हैं, उनके कौशल और क्षमताएँ बेकार जा रही हैं। हर साल उच्च शिक्षा प्राप्त कर हजारों-लाखों स्नातक निकल रहे हैं, पर उनके भविष्य का कोई स्पष्ट मार्ग नहीं दिखता। सरकारें बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने में पूरी तरह असमर्थ नजर आ रही हैं।

अनेक लोग मानसिक विकारों से ग्रसित होकर विक्षिप्त और सनकी बनते जा रहे हैं, जो छोटे बच्चों की बलि देने जैसे घृणित अपराध कर रहे हैं।

जो लोग यह नहीं समझ पा रहे कि क्या करें और जिन्हें कोई मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा, वे भी अज्ञानवश अपनी संपत्तियों के बावजूद व्यर्थ बैठे हैं। अनेक अद्भुत प्रतिभा और कौशल वाले लोग बिना किसी रोजगार के भटक रहे हैं। यह कितनी भयंकर, अस्तव्यस्त और दयनीय स्थिति है!

जो माता-पिता अपनी संतानों को जन्म से ही आँख की पुतली की तरह पाल-पोसकर उन्हें अच्छा भविष्य प्रदान करते हैं, ऐसे माता-पिता का बुढ़ापे में सहारा बनने वाली संतान आज बहुत ही कम दिखाई देती है। लोग पारिवारिक मूल्यों को भुलाकर अपने आत्मीयजनों से जुड़ने के बजाय वस्तुओं से अधिक लगाव बढ़ा रहे हैं।

संसार के कुछ क्षेत्रों में लोग सुंदर भवनों, मनमोहक वातावरण और सभी सुविधाओं के बीच आनंदपूर्वक जीवन बिता रहे हैं। ये स्थान किसी स्वर्ग का आभास कराते हैं। वहीं, दूसरी ओर कुछ स्थानों पर लोगों के पास न तो रहने के लिए घर है, न खाने के लिए भोजन, और न ही पहनने के लिए कपड़े; इस कारण वे नर्क जैसी स्थिति में जीवन जीने को विवश हैं। यह असमानता क्यों?

नगरों में विकास के प्रकाश स्तंभ चमक बिखेर रहे हैं, परंतु जिन श्रमिकों, उद्यमियों, ठेकेदारों, वस्तु उत्पादकों और विक्रेताओं के परिश्रम से यह प्रकाश संभव हुआ है, उनका जीवन अंधकार में डूबा रहता है।”

दुर्दशा, द्वेष और अस्थिरता से अत्यधिक ग्रस्त इस संसार में
विनाश के अतिरिक्त मुझे कुछ भी सारवान दिखाई नहीं देता।

दुष्ट स्वभाव से युक्त मनुष्य अंततः विनाश को ही अपना परिणाम बनाता है।

धर्माचार्य: श्रीराम द्वारा देखी गई विश्व की स्थितियों पर उनके क्रोध, आवेश और दुःखभरी बातें सुनने के बाद महाशक्ति ने कहा, “राम! तुम्हारे भीतर उठ रहे आवेश और तुम्हारे अंतरमन की भावनाएँ मैं भलीभाँति समझ रही हूँ। तुम्हारा यह लोक-संचार अवश्य ही शुभ परिणाम की ओर ले जाएगा। बताओ, तुम इस संसार को कैसा देखना चाहते हो? इस संसार की जिन स्थितियों को तुमने देखा, उनमें क्या-क्या बातें तुम्हारे अनुभव में आईं? और अपनी शक्ति को किस कार्य में लगाना चाहते हो, यह स्पष्ट करो।”

6. श्रीराम ने इस लोक को दिव्य लोक में बदलने की अपनी संकल्पना प्रकट करना:

श्रीराम: महादेवी! पृथ्वी को दिव्य लोक बनाने के लिए आवश्यक सभी संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। मैं इस संसार को दिव्य लोक के रूप में देखना चाहता हूँ, कृपया मुझे इसके लिए मार्गदर्शन करें।

इस संसार में सभी के लिए आवश्यक संसाधन भरपूर मात्रा में हैं। लेकिन शासक वर्ग इन्हें सही तरीके से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं और उनका दुरुपयोग हो रहा है। शक्तिशाली व्यक्ति ‘सब कुछ मुझे ही चाहिए’ जैसी स्वार्थपूर्ण मानसिकता के कारण संसाधनों को हड़प लेता है, जिससे बाकी लोग भूख और गरीबी में जीने को मजबूर हो जाते हैं। सबसे शक्तिशाली, अत्यंत बुद्धिमान, और देवता के समान मानव अपनी शक्ति का केवल सीमित उपयोग कर जीवन यापन कर रहा है। जबकि अपनी शक्ति से वह संसार को अत्यंत अद्भुत रूप में बना सकता है। मैंने जो दुनिया देखी है, वह एक प्रकार की है; लेकिन अनुभव में जो संसार सामने आया, वह बिल्कुल अलग है। इस संसार को और भी सुंदर और व्यवस्थित बनाया जा सकता है। ऐसा करना कोई कठिन कार्य नहीं लगता। मानव अपनी शक्ति को निरर्थक कार्यों में अधिक लगाता है और लोक कल्याण के लिए कम उपयोग करता है। यदि मनुष्य मिल-जुलकर अपनी शक्ति और कौशल से प्रत्येक नगर को सुंदर महा-नगर में बदल दे, सुंदर घर बनाएँ, बाग-बगिचे विकसित करें, तो वे सुखपूर्वक जीवन बिता सकते हैं।

महाशक्ति! ऐसा वातावरण बनाइए जिसमें सभी लोगों की आवश्यकताओं और सुविधाओं की पूर्ति हो सके। सभी लोग परम शांति से जीवन जी सकें। साथ ही, उन्हें पूर्ण ज्ञान और आठ प्रकार के ऐश्वर्यों से संपन्न महान सौभाग्य प्रदान करें।

मानव मानसिक रूप से दिव्यता और शारीरिक रूप से दिव्य बल को कैसे प्राप्त कर सकता है, इसका मार्ग स्पष्ट कीजिए।

मैं आपके आशीर्वाद से इस संसार को दिव्य लोक में बदलना चाहता हूँ।

महाशक्ति: हे श्रीराम! तथास्तु। तुम्हारे मनोरथ की सिद्धि हो। तुम्हारा संकल्प अवश्य पूरा होगा।

7. ‘दैवी शक्ति’ द्वारा दिव्य लोक बनने का मार्ग बताना:

 

  1. महाशक्ति: श्रीराम! तुमने लोक कल्याण की इच्छा की है। यह इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। इस महान कार्य की सिद्धि के लिए इस संसार के सभी लोगों को तीन प्रकार के दिव्य ज्ञान प्रदान करना आवश्यक है।

दैव नियम का ज्ञान। दैवलोक धर्मशास्त्र का अनुग्रह। सुपर पावर एडमिनिस्ट्रेशन युक्त ‘दैवलोक प्रशासन धर्म’ का ज्ञान। जब इस प्राप्त दिव्य ज्ञान को विश्व के शासक और सामान्य लोग समझेंगे, आचरण में लाएँगे और उसे अपने जीवन में लागू करेंगे, तब यह संसार ‘दैवलोक’ के समान आलोकित हो उठेगा। समय के साथ मनुष्य दैवत्व और दिव्य शक्ति को प्राप्त करेगा। सभी लोगों को जीवन की समस्त सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। समस्त जन सुख, शांति और आनंद के साथ जीवन व्यतीत करेंगे।

2. 1 दैव नियम: प्रकृति में विद्यमान सभी नियम एक ही महान नियम का पालन करते हुए कार्य कर रहे हैं, और वही महान नियम दैव नियम कहलाता है। इस अलौकिक विषय-ज्ञान के माध्यम से ही सच्चा सत्य प्रकट होता है। लोग यह मानते हैं कि जो आँखों से दिखाई देता है वही सत्य है, किंतु एक अदृश्य सत्य भी अस्तित्व में है, जो केवल अलौकिक ज्ञान से ही समझ में आता है।

बाह्य विषय-ज्ञान का अर्थ है — जल, अग्नि, वायु, धारदार उपकरण आदि से कैसे व्यवहार करना चाहिए; उनके प्रभाव के अनुसार उनसे कितनी दूरी या निकटता बनाए रखनी चाहिए — इस ज्ञान के कारण मनुष्य उन वस्तुओं से होने वाले संकटों से बचता है और सतर्क रहता है। साथ ही, वह अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उनका उपयोग करके उनसे लाभ भी प्राप्त करता है।

किन्तु, जो अदृश्य अलौकिक विषय-ज्ञान है, उसे न समझ पाने के कारण मनुष्य उसके प्रभाव में आकर अनेक संकटों और पीड़ाओं का सामना करता है। अतः यह आवश्यक है कि अलौकिक विषय-ज्ञान लोगों को बोध कराया जाए। तभी वे उसे अपने अनुकूल बनाकर समस्त दुःखों से मुक्त हो सकेंगे।

अलौकिक विषय-ज्ञान से मनुष्यों को सृष्टि के रहस्य ज्ञात होते हैं। वे महान ज्ञानी बनकर अवतरित होते हैं। सृष्टि के नियमों और प्रकृति के सिद्धांतों को समझकर वे श्रद्धा और भक्ति के साथ जीवन व्यतीत करते हैं।

2.दैव लोक धर्मशास्त्र: इस संसार को दैव लोक (ईश्वरीय लोक) में रूपांतरित करने के लिए नागरिकों को निश्चित रूप से कुछ मानसिक और शारीरिक नियमों का पालन करना आवश्यक है। इन नियमों को इस शास्त्र में विस्तार से बताया गया है। इसमें दो मुख्य भाग हैं: 1) उपदेश और 2) आदेश। इनका सही प्रकार से ज्ञान प्राप्त कर उन्हें आचरण में लाना चाहिए। इससे मानसिक और शारीरिक रूपांतरण होता है, जिससे मानवता से दैवत्व की ओर संक्रमण संभव होता है।

3.दैव लोक प्रशासनिक नियम: सुपर पावर एडमिनिस्ट्रेशन (सर्वोच्च शक्ति शासन) के अंतर्गत दैव लोक प्रशासनिक नियमों में एक निश्चित क्रम और अनुपात में शासन धर्म और विभिन्न व्यवसायों के कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं। जब इन नियमों को प्रशासन में लागू किया जाता है, तो नागरिकों की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण होती हैं और वे आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। इस प्रकार यह संसार दैवीय शासन व्यवस्था का अनुभव करता है।

अत्युच्च शासकीय प्रशासन से युक्त दैव लोक प्रशासन के नियमों में शासकों, अधिकारियों और कर्मचारियों को धर्मपूर्वक चलने का मार्गदर्शन किया जाता है। यह उन्हें उनके कर्तव्यों का बोध कराता है। इससे प्रत्येक व्यक्ति जिम्मेदारी के साथ अपने कार्यों को सही ढंग से संपादित करता है।

इस लोक में इन तीनों दिव्य ज्ञानों में से यदि कोई एक भी अभाव में रहा तो यह लोक साधारण लोक ही बना रहेगा। यदि इनके धर्म नष्ट हो जाएँ तो यह नरक तुल्य लोक बन जाएगा। परंतु इन तीनों दिव्य ज्ञानों का आचरण करने वाला लोक दिव्य लोक के समान दीप्तिमान बनेगा।

श्रीराम: महाशक्ति! कृपा कर ये तीनों दिव्य ज्ञान मुझे प्रदान करें।

8. दिव्य लोक बनाने के लिए श्रीराम को करने योग्य कार्यों का दैवी शक्ति द्वारा प्रकट किया जाना

महाशक्ति: श्री राम! इस महान कार्य में तुम्हारा सहयोग भी आवश्यक है।
यह अखंड ज्ञान तुम्हारे भीतर गूढ़ रूप से निहित है।
तुम्हारे भीतर स्थित इस महान ज्ञान को पुनः स्मृति में लाने से
तीन दिव्य ज्ञान मानव जाति को अनुग्रहित किए जाएँगे।

इसके लिए तुम्हें केवल इतना करना है कि
इस महान ज्ञान पर निरंतर विचार करते रहो,
इसे एक तपस्या के रूप में स्वीकार कर
संबंधित विषयों पर सतत चिंतन करते रहो।
तब मैं उन-उन विषयों का ज्ञान तुम्हें प्रदान करती रहूँगी।

तुम्हारी मनोवांछा, तुम्हारा मनो-संकल्प और तुम्हारी मनो-विचारणा के अनुरूप
मैं, शक्ति, पूर्ण सामर्थ्य और क्रियाशीलता के साथ कार्य करती हूँ।

महाशक्ति: हे श्रीराम! सबसे पहले तुम्हारे मन में सृष्टि के रहस्यों और अतिन्द्रिय ज्ञान के बारे में जो भी संदेह हैं, उन्हें प्रकट करो। इन्हें जानने की प्रक्रिया में तुम उन ज्ञानों को आत्मसात कर सकोगे।

9. श्रीराम द्वारा सृष्टि के रहस्यों से जुड़े संदेह व्यक्त करना

श्रीराम: महाशक्ति! इस सृष्टि के रहस्यों में मेरे मन में कई संदेह और आश्चर्य हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है – क्या आपने इस गणेश प्रतिमा को देखा? कितनी सुंदर है! मुझे पता है कि किसी दक्ष शिल्पकार ने इसे तराशा है। लेकिन उस गणेश मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर मुस्कुराती हुई उस सजीव सुंदर स्त्री को किस महाशिल्पी ने रचा? मैं इसी दुविधा में हूँ। पर इस सजीव मूर्ति को बनाने के लिए कोई अलौकिक शक्ति अवश्य रही होगी। वह शक्ति क्या है? उसे किस प्रकार जाना जा सकता है?

लोग कहते हैं कि यह सब भगवान ने बनाया है। यदि भगवान ने ही मनुष्यों को रचा, तो उनमें यह असमानता क्यों है? कोई बलशाली है, कोई दुर्बल; कोई धनी पैदा हुआ, तो कोई गरीब। क्या भगवान सबको समान क्यों नहीं बना सकता था? यह भेदभाव क्यों?

मनुष्य अपनी आवश्यकताओं के अनुसार, वस्तुओं और यंत्रों को विभिन्न गुण और नियम प्रदान कर उन्हें उपयोग करता है। लेकिन मनुष्य के शरीर में जीवन बनाए रखने के लिए आवश्यक इंद्रियों, अंगों को उनके विशिष्ट धर्म किसने दिए? जैसे तालाब का पानी अपने खेत में लाने के लिए किसान मोटर पंप का उपयोग करता है, जो यांत्रिक धर्म के अनुसार पानी को पाइप से खेत तक पहुँचाता है; वैसे ही मनुष्य के शरीर में मौजूद जीवंत यंत्र ‘हृदय’  रक्त को स्पंदित करके धमनियों के माध्यम से इंद्रियों, अंगों और कोशिकाओं तक पहुँचाता है। इतनी अद्भुत शक्ति से काम कर रहे इस हृदय को यह धर्म किसने प्रदान किया? मनुष्य की मेधा शक्ति ने मोटर को यांत्रिक धर्म दिया, लेकिन शरीर के भीतर हृदय, फेफड़े जैसे असाधारण जीवंत यंत्रों को किस बुद्धिमत्ता ने बनाया?

महाशक्ति: हे श्रीराम! तुमने बहुत सारगर्भित प्रश्न उठाए हैं। अब मैं तुम्हें यह बताऊँगी कि उन नियमों को किसने बनाया और क्यों बनाया। ध्यानपूर्वक सुनो।

10. दैवी शक्ति द्वारा दिव्य रहस्यों का उद्घाटन:

जैसे मनुष्य पेड़ से फल प्राप्त करना ही अपना मुख्य उद्देश्य मानकर मोटर यंत्र का नियम बनाकर उसका उपयोग करता है, वैसे ही जीव को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध जैसे इंद्रिय विषयों का अनुभव कराने के मुख्य उद्देश्य से ‘चित् शक्ति’ ने भौतिक शक्ति की सृष्टि की। यह सृजित ‘भौतिक शक्ति’ जीव को नेत्र, हाथ, नाक, त्वचा आदि इंद्रियों के धर्म प्रदान करती है और उनके माध्यम से वह इंद्रिय विषय ज्ञान प्राप्त करता है। इन इंद्रियों के पोषण और रक्षा के लिए हृदय, फेफड़े, किडनी आदि अंगों की रचना की गई है।

शरीर में मौजूद इंद्रियाँ और अंग, जीव को विषय-ज्ञान बताने के लिए सहायक साधन के रूप में कार्य करते हैं।

भौतिक शक्ति में वस्तु को आँखों से दिखाने का पदार्थ-धर्म निहित होने के कारण, जीव आँखों के माध्यम से वस्तु को देखने में सक्षम होता है। इसी प्रकार, वह आँखों द्वारा विभिन्न रूपों का विषय-ज्ञान प्राप्त करता है। ‘शक्ति’ कानों में ध्वनि को सुनाने वाले पदार्थ-धर्म को धारण करने के कारण, जीव उस शक्ति के द्वारा ध्वनि का ज्ञान प्राप्त करता है। त्वचा में सुख-दुःख को अनुभव कराने वाला धर्म निहित होने के कारण, जीव स्पर्श का ज्ञान प्राप्त करता है। शरीर की समस्त इंद्रियों और उनके अंगों का मुख्य उद्देश्य जीव को संबंधित विषयों का ज्ञान प्रदान करना है।

श्रीराम: हे महाशक्ति! ‘शक्ति’ जीव को विषय-ज्ञान क्यों कराती है?

11.  मन और शक्ति के अविनाभाव संबंध के बारे में बताना

महाशक्ति: हे श्रीराम! और शक्ति का अविभाज्य संबंध है। इसी संबंध के कारण, जीव जिस प्रकार की विषय-भावना करता है, ‘चित्-शक्ति’ भौतिक शक्ति के माध्यम से उसी प्रकार का विषय-ज्ञान अनुभव के रूप में प्रदान करती है। जीव के भीतर जो भी इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें पूर्ण करने के साधन ‘शक्ति’ प्रकृति के गुणों द्वारा निर्मित करती है और उन्हीं साधनों के द्वारा उन इच्छाओं को पूरा करती है। जीव की मनो-इच्छा शक्ति तक दैवी-नियम के रूप में संदेश के रूप में पहुँचती है, और शक्ति उसी के अनुरूप अपना गुण धारण करती है। जीव की विषय-भावनाओं के कारण ही वह बल और दुर्बलता, सुख और दुःख, भ्रम और विश्वास का अनुभव करता है। इच्छाओं के प्रभाव से, उन इच्छाओं को पूर्ण करने के साधन रूप में इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं।

श्रीराम: हे महाशक्ति! जीव को विषय-ज्ञान और विषयेंद्रियाँ देने वाली प्रकृति के ज्ञान को और भी विस्तार से जानना चाहता हूँ।

महाशक्ति: हे श्रीराम! बाहरी रूप में विषय-ज्ञान का अनुभव कराने वाली प्रकृति को जानने से पहले अंतर में स्थित ‘आत्मा’ के ज्ञान को समझना चाहिए। केवल आत्म-ज्ञान जान लेने पर ही अनगिनत रूपों में प्रकट होने वाला प्रकृति का ज्ञान बोधगम्य होगा।

12. आत्म-ज्ञान का उपदेश

आत्मा एक चेतना है। वह प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती। उसका मनो-ज्ञान भौतिक शक्ति (द्रव्यराशि) के रूप में प्रकृति में व्यक्त होता है। इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी विषय-ज्ञान और पदार्थ के रूप में प्रकट होता है, वह आत्मा के मनो-ज्ञान के अनुसार प्रकृति में प्रकट होता है।

आत्मचेतना में विषय का चिंतन करने वाला मन होता है। मन के चिंतन पर प्रतिक्रिया करने वाली ‘शक्ति’—ये दोनों तत्व आत्म-ज्ञान के रूप में होते हैं। मन जैसा विषय-चिंतन करता है, वैसा ही अनुभव देने के लिए चित्तशक्ति प्रभावित होती है और उसी के अनुसार भौतिक शक्ति को सृजित करती है। भौतिक शक्ति विषय-ज्ञान देने के लिए विविध द्रव्यराशि के धर्मों से युक्त होकर प्रकृति के गुण के रूप में विषय-ज्ञान का अनुभव मन को कराती है। प्रकृति मन के हर प्रतिबिंब का दर्पण होती है।

प्रकृति में मौजूद सभी पदार्थों के नियम मन के नियमों के अनुसार चलते हैं।

चित्तशक्ति विषय-ज्ञान को उत्पन्न करने वाली शक्ति है। भौतिक शक्ति (द्रव्यराशि) विषय-ज्ञान के रूप में प्रकट होती है। चित्तशक्ति अंतरंग ज्ञान है, जबकि भौतिक शक्ति बाह्य ज्ञान है।

आत्मचेतना में विचार करने वाला जीव ‘जीवी’, ‘देही’, ‘दृक्’ और ‘विषयी’ जैसे नामों से पुकारा जाता है। मनोभावना के अनुसार विषय-ज्ञान का निर्माण करने वाली शक्ति को चित्तशक्ति, महाशक्ति या क्रियाशक्ति कहा जाता है; वहीं विषय-ज्ञान का अनुभव कराने वाली भौतिक शक्ति को संदर्भ के अनुसार प्रकृति, पदार्थ, द्रव्यराशि, विषय, इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, शरीर, दृश्य आदि नामों से पुकारा जाता है।

चित्तशक्ति एक ऐसी अलौकिक शक्ति है, जो जीव की इच्छाओं और संकल्पों को पूरा करती है। यहाँ मुख्य रूप से समझने योग्य एक गूढ़ रहस्य यह है: मन जिन भावनाओं को अनुभव करता है, उन्हें जीव पहचान सकता है; लेकिन उन भावनाओं के अनुरूप चित्तशक्ति किस तरह से अलौकिक शक्ति के रूप में कार्य कर रही है, यह जीव की समझ में नहीं आता। इसी कारण जीव चित्तशक्ति के कार्यों को नहीं जान पाता, क्योंकि चित्तशक्ति आँखों से दिखाई नहीं देती।

श्रीराम ने पूछा: हे महाशक्ति! जब शक्ति मन की भावना और संकल्प का साथ देती है, तब मन जो चाहता है, वह कुछ इच्छाएँ क्यों पूरी नहीं होतीं?

महाशक्ति बोली: हे श्रीराम! जीव का मनोबल और मन के विश्वास के अनुरूप ही शक्ति कार्य करती है। जीव का मनोबल और उसका विश्वास जितना प्रबल होगा, शक्ति भी उतनी ही प्रभावशाली होकर काम करेगी।

श्रीराम ने पूछा: महाशक्ति! जीव को मनोबल और मन का विश्वास कैसे प्राप्त होता है?

13. जीव का मनोबल और मनोविश्वास प्राप्त करने की प्रक्रिया

महाशक्ति बोली: किसी विषय पर जीव द्वारा लंबे समय तक किए गए चिंतन-मनन से मन उस विषय के विश्लेषण की शक्ति और मनोबल प्राप्त करता है।

जीव की मानसिक अभिलाषा और मनो-संकल्प का नियम ही चित्तशक्ति को प्रेरित करता है, जिससे चित्तशक्ति भौतिक शक्ति को द्रव्य (पदार्थ) के धर्म प्रदान करती है।

हे श्रीराम! मन और शक्ति के बीच जो अभिन्न संबंध है, उससे शक्ति किस प्रकार काम करती है और जीव मनोबल कैसे प्राप्त करता है, पहले इसे शरीर के संदर्भ में बताऊंगा और फिर सांसारिक इच्छाओं के बारे में विस्तार से बताऊंगा — सुनो।

जिस विषय पर जीव विचार करता है, मन उस विषय पर अनुकूल या प्रतिकूल भेदभाव किए बिना, दोनों प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त करता है। यदि लंबे समय तक अनुकूल भावना करता है तो मन को अनुकूल शक्ति मिलती है; और यदि प्रतिकूल विचार करता है तो प्रतिकूल शक्ति बढ़ती जाती है।

महाशक्ति ने कहा: जीव का मन जिस विषय का चिंतन करता है, शक्ति उसी विषय पर कार्यरत होती है। जीव जिस दृष्टिकोण से देखता है, शक्ति भी उसी दृष्टिकोण के अनुरूप कार्य करती है। यदि जीव शांत मन से प्रसन्नता से जुड़ी अनुकूल विचारधारा करता है, तो शक्ति उस विषय में सक्रिय होकर अनुकूल शक्ति का रूप धारण करती है। उस विचार की तीव्रता के अनुसार शक्ति शरीर में उसी विषय का ज्ञान व्यक्त करती है। प्रसन्न विचारों से जीव के शरीर में तेज, स्वास्थ्य, उत्साह और आनंद प्रकट होते हैं। लेकिन यदि वह दुःख से जुड़ी प्रतिकूल विचारधारा करता है, तो शक्ति प्रतिकूल रूप से काम करते हुए शरीर में निस्तेजता, निराशा और कमजोरी उत्पन्न करती है। जीव की विचार-शक्ति को शक्ति उसके चेहरे और शरीर में व्यक्त करती है। जब जीव क्रोध और उग्र भावनाओं में होता है, शक्ति भी उग्र रूप में बदल जाती है; आँखें लाल हो जाती हैं और शरीर में भी उसी के अनुरूप विकार प्रकट होते हैं।

जिस प्रकार कोई व्यक्ति खाना बनाते समय दोनों हाथों से अलग-अलग कार्य करता है, जैसे दाहिने हाथ से चूल्हे में लकड़ी डालना और बाएं हाथ से आग जलाना। परंतु इन दोनों क्रियाओं का कर्ता वही व्यक्ति होता है, वैसे ही मन और शक्ति के कार्यों का कर्ता जीव ही होता है। जीव अपने मन से विषय का चिंतन करता है, शक्ति उस विषय के अनुरूप क्रिया करती हुई परिणाम का अनुभव कराती है। मन और शक्ति जीव की ज्ञानशक्तियाँ हैं। इन दोनों का आधार आत्मा है, जो समस्त क्रियाओं का साक्षी रहती है।

जीव के अंतरंग ज्ञान को शक्ति प्रकृति के गुणों के माध्यम से अनुभव के रूप में प्रदान करती है और उसके मन की जो भी अवस्था होती है, उसे व्यक्त करती है।

शरीर में शक्ति के रूप में प्रकट होने वाला तेज, उत्साह, निरुत्साह, क्रोध, आनंद, दुःख आदि जैसे शारीरिक विकारों के उत्पन्न होने का मुख्य कारण मन ही है। जीव द्वारा की जाने वाली भावना और ज्ञान ही शक्ति के द्वारा शरीर में प्रकट होता है।

कारण में जो कुछ होता है, वही कार्य में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

14. जीव द्वारा विषय की भावना करने से कर्म आरंभ होता है।

हे श्रीराम! जब जीव विषयों पर विचार करता है, वही कर्म कहलाता है। जीव जो भी कर्म करता है, उसी कर्म का फल विषय-ज्ञान के रूप में अनुभव होता है।

विषय की भावना करने वाला जीव तीन चरणों में उस विषय-ज्ञान को कर्मफल के रूप में प्राप्त करता है: क) पहला चरण: विषय की भावना की शुरुआत होती है, लेकिन इस चरण में वह अनुभव में नहीं आता। ख) दूसरा चरण: जब बारंबार उसी विषय का मनन किया जाता है, तब चित्त-शक्ति उस भावना के अनुरूप क्रिया करते हुए विचार-शक्ति को बढ़ाती है। ग) तीसरा चरण: जब विचार-शक्ति प्रबल हो जाती है, तब चित्त-शक्ति, भौतिक शक्ति के माध्यम से, उस विषय को कर्मफल के रूप में अनुभव में लाती है।

भूतकाल में की गई विषय भावना और उस भावना से उत्पन्न विचार-शक्ति के अनुसार वर्तमान में उसका फल विषय-ज्ञान के रूप में अनुभव होता है। इसी प्रकार, वर्तमान में की जा रही विषय भावना और विचार-शक्ति के अनुसार भविष्य में विषय-ज्ञान अनुभव के रूप में प्राप्त होगा।

मन जिस विषय का चिंतन करता है, भौतिक शक्ति उसी को “यह है वह भावनात्मक विषय जो तुम सोच रहे हो” यह कहकर मन को स्फुरित करती है। यह स्फुरण ही शरीर-तत्त्व में प्रकट होता है। वास्तव में जो परिवर्तन होता है, वह केवल जीव की मनःप्रवृत्ति में होता है; लेकिन स्वयं जीव नहीं बदलता।

अपनी ही मनःभावना से आरंभ हुई प्रक्रिया में आगे जो दो क्रियाएँ घटित होती हैं, उनके प्रति आत्मा केवल साक्षी रूप में रहती है। जैसे दीपक में ऊष्मा और प्रकाश दो क्रियाएँ होती हैं, वैसे ही आत्मा में भावना करनेवाला जीव, ‘जीव’ कहलाता है। उस भावना पर प्रतिक्रिया देती हुई शक्ति, ‘प्रकृति’ रूप में विविध क्रियाओं को धारण करती है। स्वयं जीव दिखाई नहीं देता, लेकिन उसका मनःज्ञान शरीर के रूप में एक प्रतिबिंब की तरह प्रकट होता है।

15. जीव की मानसिक भ्रांति और विश्वास के अनुसार कार्यरत शक्ति:

जीव जिस-जिस विषय में जैसी मानसिक भ्रांति या विश्वास रखता है, शक्ति उन विषय-धर्मों के अनुरूप रहते हुए, उसे उस विषय का अनुभवात्मक ज्ञान प्रदान करती है।

जीव अपनी नीयत, मानसिक भ्रांति, और विश्वास के अनुरूप, भौतिक शक्ति उसी के अनुरूप रूप, बल और ज्ञान को धारण करती है।

जब जीव किसी विषय पर विचार करता है, तब वह उस विषय पर एक दृष्टिकोण (perspective) बना लेता है। यदि वह सकारात्मक नीयत से देखता है, तो उसे मानसिक विश्वास प्राप्त होता है। यदि नकारात्मक नीयत से देखता है, तो उसे मानसिक भ्रांति उत्पन्न होती है।

मन जो कुछ सोचता है, जैसा विश्वास करता है, या जिस प्रकार भ्रांति में पड़ता है, उसका परिणामस्वरूप शक्ति प्राकृतिक गुणों के माध्यम से जीव को उन अवस्थाओं का अनुभव कराती है।

इस प्रकार, मानसिक विश्वास के परिणामस्वरूप जीव को साहस और उत्साह प्राप्त होता है; जबकि मानसिक भ्रांति के कारण वह भय और चिंता का अनुभव करता है।

जब झाड़ियों में से कोई आवाज़ आती है, तब— यदि किसी व्यक्ति में नकारात्मक सोच हो और वह यह मान लेता है कि वहाँ कुछ तो है, तो उसकी मानसिक भ्रांति के कारण उसकी शक्ति शरीर में चिंता व्यक्त करने वाले लक्षणों को प्रकट करती है, जैसे कि पसीना आना, कांपना, दिल की धड़कन तेज़ होना आदि। इसी तरह, यदि व्यक्ति में सकारात्मक दृष्टिकोण, मानसिक स्थिरता और जिज्ञासा हो, तो वह उसी आवाज़ को लेकर यह सोचता है कि “देखना चाहिए वहाँ क्या है”, और विश्वासपूर्वक प्रतिक्रिया देता है। ऐसे में उसकी शक्ति, उत्साह, निर्भयता और आनंद के रूप में शरीर में प्रकट होती है। यदि मन भ्रम में पड़कर डर को उत्पन्न करता है, तो प्रकृति उसमें भय व्यक्त करने वाले पदार्थ-गुण उत्पन्न करती है। लेकिन अगर मन विश्वास से भरकर साहस को उत्पन्न करता है, तो शक्ति साहस का अनुभव कराने वाले प्रकृति-धर्म को धारण करती है। जीव की उद्देश्य के अनुसार उसकी शक्ति, उसी अनुरूप प्रवृत्ति के साथ विभिन्न गुणों को धारण करती है। जीव की मानसिक भ्रांति और मानसिक विश्वास शरीर में भौतिक रूप से फलित  होते हैं।

जीव के भीतर जैसे अंतःकरणीय भाव और ज्ञान होते हैं, प्रकृति भी उसी अनुरूप भौतिक स्वभाव और पदार्थ धर्म को धारण करती है। अर्थात, जीव की आंतरिक भावना जैसी होती है, प्रकृति उसी प्रकार की भौतिक अभिव्यक्ति को उत्पन्न करती है।

पीड़ा देने वाले विषयों का मनन नहीं करना चाहिए। जो घटनाएँ घटी ही नहीं हैं, उनके घट जाने की कल्पनाएँ भी नहीं करनी चाहिए। किसी के प्रति द्वेषभाव लेकर बार-बार सोचना उचित नहीं है। इस प्रकार की चिंतन प्रवृत्तियाँ मन को दुर्बल बना देती हैं। और जब मन दुर्बल हो जाता है, तब यह समझ लेना चाहिए कि उसकी शक्ति भी उसी अनुपात में दुर्बल हो चुकी है।

16.  द्रष्टा (जीव) की दृष्टि के अनुसार दृश्य (पदार्थ, शरीर) आधारित होता है।

हे श्रीराम! जीव अपने शरीर में जो तेज, आनंद, भय, निर्भयता, चिंता, साहस, उत्साह आदि अनुभव करता है—उन सबका मूल कारण उसका मानसिक उद्देश्य ही होता है। इसी प्रकार, जीवों को जैसा शरीर और बल प्राप्त हुआ है, वह उनके अनेक जन्मों से चली आ रही मानसिक कल्पना और धारणा का ही परिणाम है।

जीव कई जन्मों से, जाने-अनजाने, आंतरिक रूप से एक विशेष शरीर और बल की कामना या धारणा करता आया है। उसी के अनुरूप उन्हें वैसा शरीर और बल प्राप्त हुआ है। प्रत्येक जीव अपने मानसिक रूप और मानसिक शक्ति के अनुरूप ही प्रकट होता है।

जीव की जो मानसिक धारणा और भावना है, उसी के अनुसार ‘शक्ति’ क्रिया को उत्प्रेरित करती है। मन और शक्ति कभी अलग-अलग मार्गों में नहीं चलते—मन जहाँ होता है, शक्ति भी वहीं होती है। मन जिस विषय पर केंद्रित होता है, शक्ति भी उसी विषय पर कार्य करती है। जिस दृष्टिकोण के साथ मन स्थित होता है, शक्ति भी उसी दृष्टिकोण के अनुसार क्रियाशील होती है। मन जितना अधिक बलशाली होता है, शक्ति उतनी ही प्रभावशाली कार्य करती है। जब जीव किसी विषय पर थोड़े समय तक ध्यान केंद्रित करता है, उसे ‘ध्यान’ कहते हैं; और जब वह दीर्घकाल तक गहनता से एक ही दिशा में स्थिर चित्त से स्थित रहता है, उसे ‘तपस्या’ कहते हैं। मन जिस विषय पर ध्यान या तपस्या करता है, उस पर उसकी दृष्टि स्थिर हो जाती है। उसी के अनुरूप शक्ति, उस विषय को प्रकृति धर्म के रूप में प्रकट करती है।

जीवों ने जिस प्रकार के शारीरिक बल और शरीर-रूप पर विश्वास किया है, उसी के अनुरूप वे वर्तमान में शारीरिक अनुभव को प्राप्त कर रहे हैं। जिन जीवों में बलवान शरीर की धारणा सुदृढ़ होकर मानसिक विश्वास में परिणत हुई है, वे बलवान शरीर-ज्ञान के साथ प्रकट हो रहे हैं। वहीं, जिनमें दुर्बल शरीर की धारणा सुदृढ़ होकर मानसिक भ्रांति में बदल गई है, वे दुर्बल शरीर-ज्ञान के साथ दिखाई दे रहे हैं। संसार में जितने भी जीव दिखाई दे रहे हैं, वे सभी अपने मानसिक ज्ञान, मानसिक बल और मानसिक रूप के अनुसार ही प्रकट हो रहे हैं।

सिंह, हाथी, बंदर, खरगोश, मनुष्य (चाहे वह बलवान हो या दुर्बल, बुद्धिमान हो या बुद्धिहीन) — सभी अपने मानसिक विचार, मानसिक उद्देश्य, मानसिक बल और मानसिक रूप के अनुसार ही प्रकट होते हैं। शक्ति उनके मानसिक उद्देश्य के अनुसार ज्ञान, बल और रूप को धारण कर शरीर-रूप में व्यक्त होती है।

सिंह का मानसिक ज्ञान उसके शारीरिक अनुभव के रूप में प्रकट होता है, और वह इस ज्ञान को दूसरों के सामने व्यक्त करता है। इसी प्रकार, खरगोश का मानसिक ज्ञान भी उसके शारीरिक अनुभव के रूप में प्रकट होता है और वह भी अपने अनुभवों को संसार के समक्ष प्रकट करता है।

संसार में करोड़ों रूपों में विद्यमान जीव-जातियाँ, अपने मानसिक विकारों और मानसिक ज्ञान के अनुसार दिखाई देती हैं।

जब किसी भावना की कल्पना मन में दृढ़ हो जाती है, तो वह अनुभव के रूप में सिद्ध हो जाती है।

जीवों के मन में जो भी रंग, रूप और बल दृढ़ रूप से स्थापित हो जाते हैं, वही रंग, वही रूप, वही बल उनके शरीर में प्रकट होते हैं।

जैसे चित्रकार दीवार पर चित्र बनाने से पहले उस चित्र को अपने मन में रच लेता है, वैसे ही जीव स्वयं चित्रकार बनकर, अपने ही मानसिक रूपों को शरीर में प्रकट करता है।

जो पदार्थ भौतिक शक्ति के रूप में दिखाई देता है, वह सत्य नहीं है। यह केवल जीव की मानसिक भ्रांति के अनुसार चित्-शक्ति द्वारा भौतिक शक्ति के माध्यम से उत्पन्न की गई पदार्थ संबंधी भ्रांति है। जो अदृश्य जीव है, वही वास्तव में सत्य है। उस जीव की सत्ता का संकेत केवल भौतिक पदार्थ के माध्यम से मिलता है।

जैसे कोई मिठाई विक्रेता व्यक्ति मिठाई बेचता है, और जब कोई छोटा बच्चा उससे किसी विशेष आकार में मिठाई माँगता है, तो वह उसे वैसा ही आकार देकर प्रसन्न करता है, चाहे वह मिठाई तोता जैसी हो या बाघ जैसी। बच्चा उन्हें देखकर प्रसन्न होता है और कहता है, “यह तोता है”, “यह बाघ है।” परंतु वह मिठाई देने वाला व्यक्ति सब जानता है, इसलिए उसके लिए उसके मन में कोई भेद नहीं होता। ठीक उसी प्रकार, आत्मा की शक्ति भी मन की इच्छा के अनुसार भ्रांतियों की रचना करती है।

जब जीव किसी रूप या बल के बारे में दीर्घकाल तक सोचता है, तो वह अंततः एक मानसिक निष्कर्ष पर पहुँचता है। उस मानसिक निष्कर्ष के अनुसार शक्ति, शारीरिक ज्ञान के रूप में कार्य करती है। जब जीव अपने शरीर के बारे में धारणा करता रहता है, तो वह धारणा धीरे-धीरे दृढ़ हो जाती है। उस दृढ़ मानसिक बल और रूप के अनुसार ही शक्ति, शरीर के बल और शरीर के रूप को प्राप्त करती है।

जब कोई जीव लंबे समय तक सकारात्मक विचारों का चिंतन करता है, तब वह सकारात्मकता उसके मन में दृढ़ होकर उसी के अनुरूप शारीरिक बल और ज्ञान के रूप में अनुभव में आती है। इसी प्रकार, यदि जीव दीर्घकाल तक नकारात्मक विचारों का चिंतन करता है, तो वह नकारात्मकता मन में दृढ़ होकर शक्ति, भौतिक ज्ञान के माध्यम से जीव को दुर्बलता और अज्ञान का अनुभव कराती है। जिस ज्ञान पर विश्वास करते हुए नकारात्मकता को स्वीकार किया जाता है, उसे भ्रम (भ्रांति) कहा जाता है, और जिस ज्ञान पर विश्वास करते हुए सकारात्मकता को स्वीकार किया जाता है, उसे विश्वास कहा जाता है — ऐसा समझना चाहिए।

जब जीव “मैं शक्तिशाली हूँ” इस तरह का मानसिक संकल्प करता है, तो शक्ति उसी के अनुरूप क्रियाशील होकर उसके अनुभव में बलवान शारीरिक ज्ञान और मजबूत मानसिक ज्ञान के रूप में आती है। तब वह जीव उत्साह, आनंद, साहस और तेज से भर जाता है। वह जितने अधिक विश्वास से भरपूर होता है, शक्ति उतनी ही धर्मयुक्त होकर उसकी आचरण में, कार्यों में, व्यक्तित्व में, वाणी में और प्रतिभा में प्रकट होती है। उसका वह बलवती मानसिक भाव ही बलवान शरीर के रूप में उसके अनुभव में प्रकट होता है।

जब जीव दोषयुक्त आत्म-स्तुति करता है, तो वह भ्रम को प्राप्त करता है; और जब वह श्रेष्ठ आत्म-स्तुति करता है, तो वह विश्वासयुक्त ज्ञान को प्राप्त करता है।

जीव का मानसिक ज्ञान आंतरिक होता है। उसे प्रतिबिंबित करने वाला शारीरिक ज्ञान भौतिक होता है।

जब जीव “मैं दुर्बल हूँ” इस प्रकार की मानसिक भ्रांति रखता है, तब उससे दुर्बल मानसिक निष्कर्ष बनता है। जब जीव भ्रम से ग्रसित होता है, तब उसकी शक्ति समय के अनुसार दुर्बल शारीरिक ज्ञान और दुर्बल मानसिक ज्ञान का रूप धारण करती है। तब वह जीव निरुत्साही हो जाता है, उसका हृदय दुख से आक्रांत रहता है, और वह भय से भर जाता है। उसका अज्ञान उसके व्यक्तित्व और आचरण में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। वही दुर्बल मानसिक भाव अंततः दुर्बल विषय-ज्ञान के रूप में अनुभव में आता है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक दुर्बल विचारों का चिंतन करता है, तब शक्ति उसी अनुरूप कार्य करती हुई दुर्बल शारीरिक ज्ञान के रूप में प्रकट होती है।

जीव दुर्बल नहीं है। शक्ति भी दुर्बल नहीं है। केवल मानसिक स्थिति के दुर्बल होने के कारण ही शारीरिक ज्ञान दुर्बल हो जाता है।

भ्रम को भी प्रतिकूल विश्वास के रूप में, और विश्वास को अनुकूल भ्रम के रूप में समझना चाहिए। क्योंकि ध्वनि (शब्द) और भावना जीव को प्रभावित करते हैं, इसलिए बलवती हुई प्रतिकूलता को भ्रम और बलवती हुई अनुकूलता को विश्वास मानना उचित है।

दुर्बल विचारों का बार-बार चिंतन नहीं करना चाहिए। यदि वे अचानक स्मरण में आ भी जाएँ, तो उन्हें त्याग कर अच्छे विचारों को धारण करना चाहिए।

श्रीराम ने पूछा: “महा शक्ति! यदि कोई छोटा जीव स्वयं को महान जीव समझने लगे, तो क्या वह वास्तव में महान जीव बन जाएगा? यदि कोई दुर्बल व्यक्ति यह भावना करे कि वह बलवान है, तो क्या वह बलशाली बन जाएगा? कृपया इस विषय में और अधिक स्पष्टता प्रदान करें।”

महा शक्ति ने उत्तर दिया: “जीव जो कुछ भी सोचता है, वही भावना जब मन में दृढ़ हो जाती है, तभी वह प्रकट होती है। मन जिस ज्ञान को ‘मैं यही हूँ’ कहकर दृढ़ता से स्वीकार करता है, केवल वही अनुभव के रूप में साकार होता है। प्रत्येक जीव, प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर संचित विश्वास और दृढ़ धारणा के अनुरूप ही दिखाई देता है।”

जो व्यक्ति दुर्बल शरीर वाला है, केवल यह सोच लेने से कि ‘मैं बलवान हूँ’, वह बलवान नहीं बन जाएगा। जब वह अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर, बलशाली कर्म और क्रियाएँ करता रहेगा, तब उसका मन ‘मैं बलशाली हूँ’ इस निश्चय तक पहुँचेगा। उस मनो-निश्चय के अनुरूप ही उसकी शक्ति उसे बलशाली शरीर और मानसिक बल प्रदान करेगी।

और यदि कोई बलवान व्यक्ति थोड़े समय के लिए दुर्बल भावना रखे, तो भी उसकी शक्ति दुर्बल होकर उसे दुर्बल नहीं बनाएगी। लेकिन यदि वह दीर्घकाल तक दुर्बल विचार रखे, दुर्बल आचरण करे और दुर्बल कर्म करता रहे, तो वह अंततः ‘मैं दुर्बल हूँ’ इस मनो-निश्चय तक पहुँचता है। इसलिए, जीव जैसा मनो-निश्चय रखता है, वैसा ही वह अनुभव और संसार में प्रकट होता है।”

मानव को भ्रांति के कारण टूटकर नहीं गिरना चाहिए। विश्वास बनाए रखना चाहिए। अहंकारपूर्ण आचरण नहीं करना चाहिए। यह समझना चाहिए कि विश्वास भी अंततः एक प्रकार की भ्रांति ही है। इस संसार को भली-भांति जानने वाले चिदानंद स्वरूप के रूप में स्वयं को प्रकाशित करना चाहिए।

शरीर में विश्वास को दिखाने की लालसा नहीं रखनी चाहिए। जब आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, तो तुम्हारी शक्ति स्वयं ही उसके अनुरूप ढल जाती है।

जब मन उत्तेजित होता है, तो शक्ति भी उत्तेजित होती है। जब मन उथल-पुथल में होता है, तो शक्ति भी उसी अवस्था में रहती है। मन ही शक्ति को गति प्रदान करता है। जितना शांत मन रहेगा, उतनी ही शांत प्रकृति शक्ति की भी होगी।

यदि प्रतिकूल विचार मन में आते हैं, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। लाखों प्रतिकूल विचार भी आत्मज्ञान को प्राप्त व्यक्ति को प्रभावित नहीं कर सकते।

हर छोटी बात पर अपने मन को विचलित न होने देने के लिए, चिंता से दूर और शांत रहने के लिए, हर दिन कुछ समय आत्म-अनुभूति में बिताना चाहिए। आत्म-अनुभूति की स्थिति में पहुँचने हेतु शांत वातावरण में बैठना आवश्यक है। उस समय शरीर शिथिल होता है। शरीर के प्रत्येक अंग, जैसे पैर, घुटने, जांघें, नाभि, पेट, हृदय क्षेत्र, कंधे, हथेलियाँ, गर्दन, आँखें, चेहरा, ललाट, कान और सिर इन सभी को भी शिथिल करना चाहिए। इन अंगों का ध्यान रखते हुए उन्हें पूरी तरह से आराम की स्थिति में लाना चाहिए। इस प्रक्रिया को दो से तीन बार धीरे-धीरे करने से मन में शांति का भाव उत्पन्न होता है। फिर अत्यधिक शांति की स्थिति में कुछ समय के लिए विचारों को शून्य कर देना चाहिए। ‘विचारों को शून्य करना’ का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें बलपूर्वक रोका जाए, बल्कि इसका तात्पर्य बिना किसी विचार के तटस्थ और मुक्त होकर रहना है। यदि कोई विचारों को नियंत्रित कर रहा है, तो वहाँ मन कार्य कर रहा होता है। लेकिन जब मन विचारों को देखे बिना तटस्थ रहता है, तभी स्थिर, अत्यंत शांत आत्मिक स्थिति का अनुभव होता है। यही स्थिति परम शांति और परम आनंद प्रदान करती है। यदि प्रतिदिन कुछ समय इस आत्मिक स्थिति में बिताया जाए, तो ‘मैं यह शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ’ इस सत्य का सीधा अनुभव होता है। इस अभ्यास को विश्रांति के समय में कई बार दोहराने से मन किसी भी छोटी बात से विचलित नहीं होता और श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहता है।

आत्मानुभव में आने का एक और मार्ग है – श्वास पर ध्यान। श्वास लेना और छोड़ना शरीर का स्वाभाविक गुण है। शरीर में हो रहे श्वास-प्रश्वास को ध्यानपूर्वक देखना चाहिए। ऐसा करते रहने की प्रक्रिया में मन शांत हो जाता है। वही शांत अवस्था आत्मानुभव में ले जाती है।

श्रीराम: कोई ठीक से चल नहीं पाता, कोई बीमारी के कारण न तो ठीक से बैठ सकता है और न चल सकता है। कोई मानसिक रूप से अस्थिर होकर विक्षिप्तों जैसा व्यवहार करता है, कोई अपने हाथ भी नहीं हिला सकता। क्या ये सभी लोग अपनी-अपनी मानसिक स्थिति के अनुसार दिखाई देते हैं?

महाशक्ति: हे श्रीराम! वह स्थिति मानसिक नहीं है। उस जीव ने अपने पूर्व संकल्पों के अनुरूप यह शरीर प्राप्त किया था, लेकिन वह या तो स्वयं किसी दुर्घटना का कारण बना या दुर्घटना का शिकार हो गया, इस बात को समझना चाहिए। इसे इस रूप में समझो कि उसे जो सजीव शरीर (वाहन) मिला है, वह किसी दुर्घटना के कारण क्षतिग्रस्त हो गया है।

17.  जीव भूतकाल के कर्मों के प्रभाव से वर्तमान में कर्मफलों को जड़ रूप में अनुभव कर रहा है।

महा शक्ति: हे श्रीराम! यदि भूतकाल में जीव ने केवल 10 क्षणों तक प्रतिकूल मानसिक विचार किए हों, तो वह वर्तमान में शरीर में दुख का अनुभव करता है और उस स्थिति के अधीन होकर उसे जड़ रूप में भोगता है। लेकिन यदि वह वर्तमान में शांत स्वभाव और अनुकूल विचारों को अपनाए, तो भविष्य में, अर्थात् केवल 10 क्षण बाद वही शरीर आनंद और उत्साह का अनुभव करता है और जीव उस स्थिति को भी जड़ रूप में भोगता है। जीव वर्तमान को नहीं बदल सकता, लेकिन उसके पास भविष्य को बदलने की शक्ति है। यही नियम जीवों के शरीर के गुणों पर भी लागू होता है।

जीव, जो भूतकाल में अनेक जन्मों से प्राप्त शरीर की शक्ति और रूप के अनुरूप वर्तमान में मानसिक ज्ञान के द्वारा उन शरीर गुणों को धारण कर रहा है, वह उन गुणों के अधीन होकर, “मैं ऐसा ही हूँ” ऐसा मानते हुए उस अवस्था को जड़ रूप में अनुभव कर रहा है। यद्यपि जीव वर्तमान को जड़ता के साथ अनुभव करता है, उसके पास भविष्य को बदलने की शक्ति है। इसी कारण, उनके मानसिक ज्ञान और कर्मों में परिवर्तन के कारण, छोटे जीव भी बलवान जीवों के रूप में बदल रहे हैं और विभिन्न रूपों में परिवर्तित हो रहे हैं।

जीव जो स्वर्ग और नर्क का अनुभव करता है, वह भी भौतिक (जड़) रूप में ही अनुभव करता है। भूतकाल में किए गए दुष्कर्मों के फलस्वरूप जीव वर्तमान में दुख और नर्क जैसी स्थितियों को इसी धरती पर जड़ रूप में भोग रहा है। वहीं वर्तमान में किए गए सत्कर्मों के फलस्वरूप भविष्य में सुख और आनंद के फल प्राप्त करने की शक्ति और क्षमता जीव के पास होती है।

18. दृश्य के प्रभाव से जीव का मानसिक दृष्टिकोण बदल जाना:

महा शक्ति: हे श्रीराम! इस जगत में जो दृश्य उपस्थित हैं, वे भी द्रष्टा के मानसिक ज्ञान को प्रभावित करते हैं। उसी मानसिक ज्ञान के अनुसार जीव का शरीर संबंधी अनुभव भी बदलता है।

जगत में विद्यमान वस्तुओं को देखने वाला जीव, उनके प्रभाव से मानसिक रूप से प्रभावित होता है। जैसे—मनोहर वातावरण, शीतल चाँदनी आदि दृश्य, द्रष्टा के दृष्टिकोण को परिवर्तित कर उसे शांति प्रदान करते हैं। उसी प्रकार अन्य दृश्य भी मन पर प्रभाव डालते हैं।

दृश्यमान व्यक्ति के शारीरिक विकारों से उसे देखने वाले अन्य लोगों की शक्ति भी प्रभावित होती है।

इस संसार में दृश्य रूप में उपस्थित कोई व्यक्ति जब क्रोध, द्वेष या आनंद जैसी स्थितियों में होता है, तो उसे देखने वाले द्रष्टा की मानसिक भावना भी परिवर्तित हो जाती है। उसका मन भी कुछ हद तक उन्हीं भावनाओं से भर जाता है। सामने वाले व्यक्ति के शारीरिक विकारों से प्रभावित होकर, वह स्वयं भी उन्हीं विकारों से ग्रस्त होकर भावनात्मक रूप से प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है। जैसे, कोई हँसता है तो हम भी हँसने लगते हैं, कोई रोता है तो हम भी रो पड़ते हैं। ऐसी मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाएं स्वयं की भौतिक शक्ति के माध्यम से प्रकट होती हैं।

सामने वाले व्यक्ति में मौजूद क्रोध, द्वेष, या आनंद उसे कुछ हद तक प्रभावित करते हैं, लेकिन जो लोग इन भावनाओं को स्वीकार नहीं करते, उन पर इनका पूर्ण प्रभाव नहीं पड़ता। यह केवल उन लोगों को प्रभावित करता है जो उनके साथ तादात्म्य स्थापित करते हैं। यदि उनकी भावनाओं में पूरी तरह लीन हो जाएँ, तो ज्ञान अनुभव में आता है।

समाज में उनके सहचर और उच्च आदर्शों वाले व्यक्ति जो उच्च विचारों वाले होते हैं, उनके मानसिक भावों का अन्य लोग अनुकरण करते परिणामस्वरूप उसकी अपनी व्यवहार-पद्धति कुछ हद तक उस व्यक्ति के समान बन जाती है।

किसी विशेष क्षेत्र के लोग, अपने समाज में जिन व्यक्तियों को श्रेष्ठ मानते हैं, उन्हें मन में आदर्श मानकर, बिना बताए उनका अनुकरण करने लगते हैं। इस अनुकरण में सबसे पहले स्वर या बोलने का ढंग बदलता है। उसके बाद धीरे-धीरे व्यक्ति का व्यक्तित्व, व्यवहार, शक्ति, रीति-नीति और चेहरे की अभिव्यक्तियाँ भी उस आदर्श के अनुसार बदलने लगती हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग एक-दूसरे के शरीर की अभिव्यक्ति को अनजाने में अनुकरण करते हैं, जिसके कारण उन क्षेत्रों के लोगों की चेहरे की अभिव्यक्तियाँ (मुक़कवलीकाएँ) प्रायः एक जैसी होती हैं। भारतीयों, चीनी लोगों, अमेरिकियों, यूरोपीय, जापानी और अफ्रीकी लोगों की चेहरे की बनावट में जो समानताएँ हैं, उनका कारण यह है कि वे अपने-अपने वातावरण में रहने वाले अन्य लोगों की ही तरह मानसिक भावनाओं और मानसिक प्रतिक्रियाओं का अनुभव करते हैं। उन्होंने उन लोगों के चेहरे के भावों को आत्मसात कर लिया है और उसी अनुरूप एक काम-रूप (इच्छा आधारित रूप) धारण कर लिया है। आत्मा में कोई भेद नहीं है, परंतु मानसिक विकारों के भेद के कारण विभिन्न प्रकार की चेहरे की अभिव्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। जीव के मानसिक भावों और मानसिक विकारों के अनुरूप ही उसका रूप बनता है।

वैज्ञानिकों द्वारा जिन प्रजातियों को जैसे कि बंदर, ऑस्ट्रालोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस, निएंडरथल्स और होमो सेपियन्स, मानव विकास क्रम की विभिन्न अवस्थाएँ बताया गया है, वे सभी एक अवस्था से दूसरी अवस्था की ओर अपने मानसिक उद्देश्यों और मानसिक विकारों में परिवर्तन करते हुए आगे बढ़ती गईं। जो रूप एक अवस्था में बदला, उसी रूप को अगली अवस्था ने अनुकरण किया। उनकी गतिविधियाँ, उनका भोजन, और उनकी गतिशील जीवनशैली (यात्राएँ आदि) इस क्रमिक विकास में सहायक सिद्ध हुईं।

शक्ति-तत्त्व को जानने वाले महान दैवांश सम्बूत जैसे हनुमानजी, शुक्राचार्य, श्रीकृष्ण आदि ने अपनी तपस्या की शक्ति से इच्छानुसार रूप धारण कर विविध कार्यों को सिद्ध किया। हनुमानजी ने अपनी शक्ति का उपयोग लोक-कल्याण के लिए किया, जबकि मारीच, शूर्पणखा आदि ने उन शक्तियों का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए कर लोक में हानि पहुँचाई।

कुछ जीव अपने आपको बचाने या शिकार करने के लिए भी इच्छानुसार रूप बदलते हैं। उदाहरण के लिए: गिरगिट, ऑक्टोपस, कीट-पतंगे आदि।

जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपनी मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार अपने घर को रंगता है, उसी प्रकार जीव का मानसिक विकार ही उसके शारीरिक स्वरूप में परिवर्तन लाता है। जीव स्वयं ही अपनी प्रवृत्तियों और रूपों को अपने ऊपर आरोपित कर लेता है।

चेहरे के हाव-भाव (मुद्राएँ) में भिन्नता केवल मनुष्यों में ही नहीं होती, बल्कि प्रत्येक प्राणी जाति में भी पाई जाती है। सभी गायों के चेहरे एक जैसे नहीं होते। प्रत्येक गाय का एक विशिष्ट मनोरूप होता है, जिसे केवल उसकी देखभाल करने वाला ही पहचान सकता है।

व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र में व्याप्त मानसिक ज्ञान को आत्मसात कर, उसी रूप में उसे व्यक्त भी करते हैं। दृश्य रूप में दिखाई देने वाले सामने वाले व्यक्ति के शारीरिक ज्ञान को वे भी अपनाते हैं। यह सामाजिक ज्ञान शरीर में भी आरोपित हो जाता है।

जब समाज में किसी व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति, भाषा, जाति, पहनावा या पेशा दूसरों से अलग होता है, तो लोग उसे “हमसे अलग” मानते हैं और उसे भिन्न जाति के रूप में देखने लगते हैं। इसका मूल कारण यह है कि उनका मन उन अवस्थाओं को स्वीकार नहीं करता, यही उनकी अज्ञानता है। इसलिए जो व्यक्ति अपने इस अज्ञान को पहचान लेता है, वही सच्चा ज्ञानी होता है।

जो लोग जाति, वर्ग और वर्ण के भेदभाव में विश्वास रखते हैं, उन्हें अज्ञानी ही समझना चाहिए। क्योंकि उनका यह दृष्टिकोण एक ज़हरीली हवा की तरह समाज में फैलता है। वे लोग अज्ञान के प्रचारक बनकर समाज में विघटन फैलाते हैं।

जिस व्यक्ति को हम देख रहे हैं, जिससे प्रेम या द्वेष कर रहे हैं, उसका वास्तविक स्वरूप वह नहीं है। वह भी एक दैवी तत्व से बना जीव ही है।

हे श्रीराम! जीव आत्मा स्वयं दैवस्वरूप है। जीव के मानसिक स्वभाव के अनुरूप जो रूप, बल और ज्ञान को उत्पन्न करने वाली शक्ति है, वही देवता है। इन दोनों (जीव और शक्ति) के परस्पर सहयोग से ही कोई भी कार्य संपन्न होता है।

जो ईश्वर पर विश्वास करता है, वह ईश्वर और उसकी दिव्य शक्ति का दर्शन करता है। जो भूत-प्रेत पर विश्वास करता है, वह उसी प्रकार की दुष्ट शक्तियों को देखता है। प्रत्येक व्यक्ति को उसकी मानसिक अवस्था के अनुरूप ही अनुभव होते हैं। जो लोग अपने मन को दूषित विचारों से भर लेते हैं, वे विक्षिप्त हो जाते हैं। जो शांत स्वभाव में रहते हैं, वे सुखी रहते हैं। किसी के विचार ही उसे मनुष्य बनाते हैं, राक्षस बनाते हैं या फिर महान बनाते हैं।

यदि जीव का मन संकुचित है, तो उसकी शक्ति भी संकुचित रहती है। जब मन का विस्तार होता है, तब उसकी शक्ति और बुद्धि का भी विस्तार होता है।

जो वस्तुएँ हमें दिखाई देती हैं, उनकी कोई स्थायी सत्ता नहीं होती। इनका अधिष्ठान आत्मा ही है, और आत्मा ही एकमात्र सच्ची सत्ता है। जो इस सत्य को जान लेता है, वही वास्तव में मुक्त पुरुष होता है।

मनुष्य कुछ समय तक दुःख में रहता है और फिर अपनी स्थिति को बदल कर कुछ समय के लिए सुख में रहता है। एक समय वह शक्तिशाली होता है, तो दूसरी बार दुर्बल बन जाता है। जो कुछ भी बदल रहा है, वह शाश्वत नहीं है। लेकिन जो उन्हें बदलता है, वह शाश्वत है।

जिस प्रकार एक कमरे में जल रहा दीपक अपनी रोशनी दीवार पर डालता है, और यदि वही रोशनी यह सोचने लगे कि मैं ही वह दीवार हूँ, उसका रंग, उसकी ताकत और उसकी कमजोरियाँ मैं ही हूँ, तो यह कितना मूर्खतापूर्ण होगा। उसी प्रकार, आत्मचैतन्य का अंशरूप मन जब अपनी चेतना को शरीर पर प्रकाशित करता है, तब यदि वह अज्ञानवश यह सोचता है कि यही शरीर ही मैं हूँ, इसका रूप, इसकी ताकत और इसकी कमजोरियाँ मैं ही हूँ, और यह डरना कि यह शरीर नष्ट हो जाएगा—यह उतना ही मूर्खतापूर्ण है।

जीव का यह शरीर पंचभूतों का समन्वय है। और जीव द्वारा शरीर से किए जाने वाले कार्यों में ये पंचभूत उसकी सहायता करते हैं।

श्रीराम ने पूछा: हे महाशक्ति! पाँच महाभूत जीव की सहायता क्यों करते हैं?

19.  विश्व में दो प्रकार की शक्तिशाली आत्माओं का विवरण

महाशक्ति ने उत्तर दिया: हे श्रीराम! इस विश्व में दो प्रकार की शक्तिशाली आत्माएँ हैं — एक परिपालक आत्मा (शासक आत्मा) और दूसरी सहायक आत्मा। जिन आत्माओं में मन की शक्ति और तप की शक्ति अधिक होती है, वे परिपालक आत्माएँ कहलाती हैं। उनसे थोड़ी कम शक्ति वाली आत्माएँ सहायक आत्माएँ होती हैं।

परिपालक आत्मा वह होती है जो संकल्प-शक्ति और प्रभावशाली शक्ति से युक्त होती है। सहायक आत्मा वह होती है जो परिपालक आत्मा के संकल्प की पूर्ति के लिए आवश्यक सहायक शक्ति से युक्त होती है।

जैसे आत्मा की मनोभावना से शक्ति प्रभावित होती है, वैसे ही परिपालक आत्मा के मनो-संदेश से सहायक आत्मा की भौतिक शक्ति प्रभावित होकर उस संदेश के अनुसार भौतिक नियमों में कार्य करती है। परिपालक और सहायक आत्माओं की शक्ति को जो कार्य-नियम सौंपा गया है, वे ही पंचमहाभूत और अष्टवसु कहलाते हैं।

परिपालक आत्मा का मनो-संदेश सहायक आत्माओं तक एक दिव्य आदेश के रूप में पहुँचता है। उस दिव्य नियम के अनुसार, सहायक आत्माएँ विविध प्रकार की धर्म-शक्तियों से युक्त होती हैं।

परिपालक आत्मा, सहायक आत्माओं की भौतिक शक्ति को एक साधन के रूप में प्रयोग करके शरीर को धारण करती है। शरीर में जो जीव रूप में विद्यमान है, वह परिपालक आत्मा है। और शरीर में रहकर जो कार्य संपन्न हो रहे हैं  उन्हें संपन्न कराने वाले  पंचमहाभूत और अष्टवसु ही सहायक आत्माएँ हैं।

मनुष्य के पास जो शरीर है, उसमें करोड़ों करोड़ पंचमहाभूतों और सूक्ष्म जीवों का समावेश होता है। परिपालक आत्मा की ‘चित्त शक्ति’ इन सभी को आकर्षित करती है और उनकी भौतिक शक्ति को विभिन्न धर्मों से युक्त करती है। इन्हीं के सहयोग से मनुष्य इस शरीर को धारण करके जीवन जी रहा है।

20. परिपालक आत्मा और सहायक आत्माओं को विभिन्न भौतिक धर्म प्रदान करना:

परिपालक आत्मा के मानसिक संकल्प से प्रभावित होने वाली चित् शक्ति सहायक आत्माओं को आकर्षित करती है, उनकी चित् शक्ति को नियंत्रित करती है और उनकी भौतिक शक्ति के लिए नियम निर्धारित करती है। सहायक आत्माएँ परिपालक शक्ति के आदेशानुसार कार्य करती हैं।

जीव अपने मानसिक बल के आधार पर भूतात्मा, जीवात्मा, महात्मा और दैवात्मा रूप में विभिन्न शक्तियों से युक्त होता है।

भूतात्मा पंचमहाभूतों के धर्म को धारण करती है। परिपालक आत्मा जीवात्मा के रूप में अधिक शक्ति से युक्त होकर जीवों और मनुष्यों के रूप में शरीर धर्म को धारण करती है। महात्मा अखंड शक्ति से युक्त होकर मनुष्यों और महापुरुषों के रूप में शारीरिक ज्ञान और बुद्धिबल से युक्त होते हैं। दैवात्मा दैव शक्ति से युक्त होकर दैव भौतिक शरीर-ज्ञान और अखंड बल को धारण करती है।

जीवात्मा और महात्मा भूतात्माओं के लिए परिपालक आत्मा के रूप में कार्य करते हैं। वहीं भूतात्मा, जीवात्मा और महात्मा — इन सभी के लिए दैवात्मा परिपालक आत्मा के रूप में कार्य करती है।

पंचभूत उप-पंचभूतों, महा-पंचभूतों और अखंड पंचभूतों के रूप में विभिन्न शक्तियों और धर्मों के साथ विद्यमान रहते हैं। उप-पंचभूत इलेक्ट्रॉन्स, प्रोटॉन्स, न्यूट्रॉन्स आदि परमाणु रूप में होते हैं। उप-पंचभूत पंचभूतों के लिए शक्ति के रूप में सहायक होने के कारण, पंचभूत उनके सहयोग से आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि (घन पदार्थ) जैसे धर्मों को धारण करते हैं। महा-पंचभूत, पंचभूतों और उप-पंचभूतों के सहयोग से शरीर में अंगों के रूप में आकार ग्रहण करते हैं। अखंड पंचभूत, ब्रह्मांड में पंचभूतों और उप-पंचभूतों के सहयोग से सूर्य, चंद्र, ग्रहों और नक्षत्रों के रूप में आकार ग्रहण करते हैं।

भूतात्मा को प्रदान किए गए भौतिक शक्ति के तत्व-नियम के अनुसार, जीव उसी तत्त्व के अधीन होकर संबंधित धर्मों का पालन करता है। उसका मन और चित्-शक्ति विचलित हुए बिना उसी कार्य में स्थित रहते हैं।

परिपालक शक्ति, सहायक आत्माओं की भौतिक शक्ति को विद्युत चुम्बकीय शक्ति, गुरुत्वाकर्षण शक्ति, प्रबल शक्ति, और दुर्बल शक्ति जैसे विविध धर्म प्रदान करती है। इस कारण भौतिक शक्ति, भूतात्माओं और महाभूतात्माओं में पंचमहाभूतों के धर्मों को धारण करती है और परिपालक आत्मा को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध के साथ-साथ शीत, ऊष्मा, कठोरता, कोमलता जैसे विषय-ज्ञान का अनुभव कराती है। जीव शरीर की सहायता से यदि केवल पलक झपकाना या एक कदम चलना भी चाहता है, तो इन शक्तियों का सहयोग आवश्यक होता है।

हे श्रीराम! जो भी परमाणु प्रत्यक्ष रूप में प्रकट होता है, उसमें आत्मा आधार रूप में विद्यमान है। वह अपनी भौतिक शक्ति की क्रियाशीलता को धारण करता है।

जीव स्वयं शक्ति से युक्त होता है। जैसे एक व्यक्ति कोई वस्त्र धारण करके उसका रूप दूसरे व्यक्ति को दिखाता है, वैसे ही तरह जीव की भौतिक शक्ति को प्रदान किया गया पदार्थ धर्म ही दूसरे जीव को शब्द, स्पर्श और विषय ज्ञान देता है। जैसे वस्त्र व्यक्ति को आधार बनाता है, वैसे ही भौतिक शक्ति जीव को आधार बनाकर विषय ज्ञान प्रदान करती है।

श्रीराम ने पूछा: हेधर्मजा (महाशक्ति)! परिपालक आत्मा और सहायक आत्माएं किस प्रकार अस्तित्व में आईं? इनका जन्म किस प्रकार होता है?

21. आत्मा का अस्तित्व

आत्मा न जन्म लेती है, न मृत्यु को प्राप्त होती है। वह शुद्ध चैतन्य है। नित्य, सत्य और पुरातन तत्व है। शरीर के नष्ट हो जाने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती। आत्मा सर्वशक्तिमान है; उसका न आदि है, न अंत। वह तीनों कालों में विद्यमान रहती है। वह सर्वव्यापक, अविनाशी, अद्वितीय तथा स्थायी अस्तित्व से युक्त है। सभी वस्तुओं, पदार्थों और समस्त जीवों में वह सूक्ष्म रूप से निरंतर विद्यमान रहती है, कभी लुप्त नहीं होती। आत्मा मलिनता-रहित, शुद्ध, अमृततुल्य तथा आनंदस्वरूप है। वह स्वयंप्रकाशक है, समस्त सृष्टि को चैतन्य प्रदान करती है और उसमें प्रकाश भरती है। वह एक है, पूर्ण है, सर्वव्याप्त है तथा साक्षीस्वरूप है। जैसे फूलों की माला में धागा होता है, वैसे ही आत्मा भी सभी में व्याप्त रहकर उन्हें प्रकाशित करती है। यह एक होकर भी समस्त का आधार है। यह सभी प्रकाशों का प्रकाश है। यह स्वयं प्रकाशित होकर सभी को प्रकाशित करती है। यह “मैं” के रूप में जानी जाती है। वह सत्यस्वरूप, अखंड, निर्लिप्त, अविनाशी, अप्रमेय, अनादि, स्वतंत्र, समस्त का आधार, श्रेष्ठतम, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञ, स्वयंसिद्ध, विभु, सर्वानुगत और सभी का आश्रय है। वह सच्चिदानंद स्वरूप में समस्त प्राणियों में प्रकाशित रहती है। यही निराकार, अव्यक्त, अद्वितीय “सत्” ही आत्मा कहलाती है।

सृष्टि के प्रारंभ में आत्मा शून्य आकाश की तरह, चिदाकाश स्वरूप में, बिना किसी शरीर के विद्यमान थी। जब तक आत्मा के मन में कोई भावना उत्पन्न नहीं होती, तब तक उसमें कोई भौतिक शक्ति नहीं होती और वह अचेतन अवस्था में रहती है। देश, काल, आकार, या विकास जैसे कोई भी तत्व उस समय नहीं होते। उस समय शक्ति आत्मा में ही निश्चल और , निराकार अवस्था में रहती है। जब मन में “मेरे पास शरीर है” — ऐसी भावना उत्पन्न होती है, तभी विवेक (विचार शक्ति) के अनुसार चित् शक्ति सक्रिय होकर भौतिक शक्ति की रचना करती है। यह भौतिक शक्ति मन के ज्ञान के अनुसार विशेष पदार्थ धर्म (गुण) को धारण करती है और उस ज्ञान के अनुरूप आत्मा को ‘शरीर अनुभव’ देती है। प्रारंभिक अवस्था में आत्मा द्वारा प्राप्त शरीर जड़स्वरूप, अत्यंत सूक्ष्म परमाणु स्थिति में होता है, जिसे समझना या अनुभव करना कठिन होता है। जब जीव को यह पदार्थ शरीर रूप में प्राप्त होता है, तभी उसके लिए देश, काल, आकार और विकास आरंभ होते हैं। आत्मा के लिए न कोई काल है, न ही उसे मापा जा सकता है। आत्मचैतन्य में स्थित मन जो भी विचार करता है, वही “विषय ज्ञान” बनकर प्रकृति के रूप में प्रकट होता है। जो पदार्थ विषय रूप में दिखाई देता है, वही मापने योग्य आकार और गुणों को धारण करता है।

जिस जीव में आकाश तत्त्व और मनोस्वरूप (मन का स्वभाव) विद्यमान हैं, वह चित् शक्ति से युक्त ‘प्रज्ञा’ (सुप्रबुद्धि) को धारण करता है। और जो भौतिक शक्ति (प्रकृति) है — जो विषय ज्ञान प्रदान करती है — वह भी प्रज्ञा को धारण करती है।

शून्य अंतरिक्ष में गतिहीन अवस्था में रहने वाला जीव देह भ्रांति प्राप्त करने के कारण शक्ति को प्राप्त करता है, जो देह भ्रांति को प्रकट करने वाले पदार्थ के गुण को जीव में प्रेरित करती है। प्रारंभ में देह भ्रांति के कारण पदार्थ को देह के रूप में प्राप्त करने वाली आत्माएं भूतात्माओं के रूप में, उनकी शक्ति बिना किसी नियम के धूल कणों के रूप में विश्व में संचार करती रहती हैं।

परमाणु अवस्था में शरीर की भावना प्राप्त करनेवाला जीव का मन हृदय स्थान में स्थित होता है, और मनोभावों के अनुसार वह चलता है। भौतिक शरीर को अनुभव कराने वाली शक्ति का स्थान हृदय है। हृदय में उत्पन्न होनेवाली गति की शक्ति को वही नियंत्रित करती है। जो मन चिंतित होता है, उसे भी यह शक्ति ही नियंत्रित करती है। इस प्रकार, मन और शक्ति दोनों परस्पर निर्देश और सहयोग द्वारा स्थिरता को प्राप्त करते हैं।

पदार्थ के रूप में अस्तित्व में आए भूतात्मा की भौतिक शक्ति को कोई भी नष्ट नहीं कर सकता। आत्मा अविनाशी है। उसकी भौतिक शक्ति, जो पदार्थ है, वह भी अविनाशी है। लोक कल्याण की इच्छा से उनकी भौतिक शक्ति के पदार्थ के गुण को परिवर्तित किया जाता है। सृष्टि की व्यवस्था में बने रहने के लिए परिपालक आत्मशक्ति भूतात्मा की शक्ति को उप-पंचभूतों और पंचभूतों के रूप में विभिन्न गुण प्रदान करती है।

भूतात्मा रूप में स्थित जीव, संकल्प और विकल्पों के माध्यम से, तथा विषयों की गहराई से की गई विवेचना से मनोबल अर्जित करता है। इस अर्जित मनोबल के अनुसार, वही भूतात्मा परिपालक आत्मा के रूप में शक्ति प्राप्त करती है।

बिना किसी विशेष नियम के धूल के कणों के रूप में विद्यमान भूतात्माओं को, परिपालक आत्मा के मनो-संदेश के अनुरूप चित् शक्ति भूतात्माओं की भौतिक शक्ति को पंचभूत गुण प्रदान करती है।

जीवात्मा (परिपालक आत्मा) का मनो उद्देश्य ही संदेश के रूप में शक्ति को आकर्षित करता है, और वह शक्ति भूतात्माओं को विभिन्न धर्म प्रदान करती है। चित् शक्ति एक विधि की तरह भूतात्माओं को गुण प्रदान करती है, और जीवात्मा एक विधाता की तरह शक्ति को लक्ष्य प्रदान करती है।

प्रत्येक आत्मा की शक्ति को स्थिर रखने के लिए प्रकृति का नियम निर्धारित किया गया है। भूतात्माओं को प्रदान किए गए प्रकृति नियमों के कारण उनकी मानसिकता स्थिर रहती है और उनकी शक्ति विभिन्न उपाधियों को प्राप्त करती है।

जिस प्रकार एक डॉक्टर अपनी बुद्धि शक्ति के माध्यम से वैद्यकीय ज्ञान रखता है, उसी प्रकार भूतात्माएं अपने गुणों के आधार पर होती हैं और उनकी शक्ति भी गुणमय होती है। यदि जीव में अग्नि तत्व है, तो उसकी शक्ति अग्नि के रूप में होती है। परस्पर आधार-आधेय संबंध के साथ वे एक ही पदार्थ के रूप में विद्यमान हैं। आत्मा का चैतन्य जीव है, और शक्ति जीव की गति है। शक्ति भूतात्माओं के मनोविकार को नियंत्रित कर निर्धारित गुण में रहने के लिए प्रेरित करती है। प्रत्येक भूतात्मा एक विशिष्ट गुण रखती है और उससे संबंधित विषय ज्ञान प्रदान करती है।

यद्यपि आत्मचैतन्य को मापा नहीं जा सकता, परंतु आत्मा के मनोज्ञान को मापा जा सकता है। आत्मा का मनोविज्ञान किस स्तर पर है, यह भी जाना जा सकता है। सृष्टि के धर्म और लोककल्याण के अनुसार, आत्मा को जो भौतिक शक्ति प्रदान की गई है, वह किस नियम के अधीन कार्य कर रही है, यह स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। भूतात्माएँ, सहायक आत्माओं के रूप में, उन्हें सौंपे गए पंचभूत नियमों के अनुरूप ही दृष्टिगोचर होती हैं। सभी जीवों के भौतिक शरीर उनके मनोज्ञान और मानसिक संकल्प के अनुसार दिखाई देते हैं।

आँखों से दिखाई न देने वाला जीव ही वास्तविक है। जो वस्तु आँखों को दिखती है और जीव को पदार्थ धर्म के माध्यम से विषय-ज्ञान का अनुभव कराती है, वह भौतिक शक्ति वास्तविक नहीं है। यह भौतिक शक्ति, जीव को विभिन्न विषयों की भ्रांति उत्पन्न कराने वाली माया है।

आत्मा शून्य में ही विद्यमान है। आत्मा की भौतिक शक्ति भी शून्य में ही विद्यमान है। मन जिस विषय का चिंतन करता है, उस विषय के ज्ञान को देखने, प्रेरित करने और पदार्थ के किस गुण के साथ होने को समझने की सुविधा परिपालक शक्ति प्रदान करती है। कार्य के लिए उनकी ज्ञान स्थिति को जानने, जीव को अपनी स्थिति का बोध कराने, दूसरों की स्थिति को समझने, और पंचभूतों के नियमों को जानने के लिए परिपालक शक्ति पदार्थ को व्यक्त करती है। विषय ज्ञान और विषय दोषों को समझने, जीव की उच्च और नीच स्थिति को ग्रहण कर समाधान करने के लिए शक्ति पदार्थ को व्यक्त करती है।

जीवात्मा, अपनी चित् शक्ति के साथ मिलकर दिव्य शरीर के रूप में विद्यमान रहती है। यह चित् शक्ति केवल अहं-भाव का अनुभव कराती है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, सुसंवेदनशीलता, कठोरता आदि जैसे विषय-ज्ञान को, वे पंचभूत जो उपयुक्त धर्मों से युक्त हैं, जीवात्मा को अनुभव स्वरूप प्रदान कर रहे हैं।

चित् शक्ति भौतिक शक्ति की रचना करती है और उसके माध्यम से भौतिक पदार्थ के जटिल अनुभव को प्रदान करती है। पंचभूतों की शक्ति, प्रकृति के गुणों से युक्त होती है। प्रकृति रूपी माया मन को कभी कोमल और मधुर अनुभव कराती है, तो कभी जटिल और कठोर अनुभव भी उत्पन्न करती है। माया मन को गुणों को प्रेरित करके उसे प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित करती है, जिससे मन वैसा ही व्यवहार करता है जैसा उसे निर्देशित किया जाता है। यह माया जीव में गति उत्पन्न करती है, उसे मोहित करती है और जीव को अपने नियंत्रण में रखती है।

परम माया से युक्त परिपालक आत्मा अपनी माया के प्रभाव से सहकारी आत्माओं (जो छोटी माया से युक्त हैं) को प्रभावित करती है।

जिस प्रकार मनुष्य अपनी भौतिक शक्ति यानी हाथ की ताकत से वस्तु में गुणों को संप्रेषित करता है, उसी प्रकार परिपालक आत्मा अपनी इच्छाशक्ति (will power) और चित् शक्ति द्वारा भूतात्माओं को पंचभूतों के धर्म (गुण) प्रदान करती है।

प्रत्येक आत्मा दिव्य शरीर और भौतिक शरीर दोनों से युक्त होती है। भूतात्मा, अपनी चित् शक्ति के साथ मिलकर दिव्य शरीर रूप में विद्यमान रहती है। उसकी भौतिक शक्ति को जो उपाधि नियम दिया गया है, वही भौतिक शरीर बनता है।

जीवात्मा, जो परिपालक आत्मा है, द्रष्टा (साक्षी) होती है। द्रष्टा के मनस्-दर्शन (मानसिक दृष्टिकोण) के अनुसार भूतात्माएँ, दृश्य रूप में कार्य-संबंधी गुणों के साथ प्रकट होती हैं।

परिपालक आत्मा के रूप में जीवात्मा, कार्य संकल्प से युक्त होती है। चित् शक्ति उस कार्य-संकल्प को पूरा करने वाली संकल्पशक्ति के रूप में कार्यकर्ता बनती है। भूतात्माएँ, जो सहकारी आत्माएँ हैं, उस संकल्प को मूर्त रूप देने वाले क्रियात्मक माध्यम बनती हैं।

जीवात्मा और भूतात्मा दोनों के बीच पारस्परिक आश्रय और अधीनता का संबंध होता है। इनके बीच कार्य-कारण संबंध भी विद्यमान होता है। जीवात्मा की इच्छा पंचभूतों रूपी भूतात्माओं तक संदेश के रूप में पहुँचती है, और वे उस संदेश के अनुरूप कार्यों का निष्पादन करती हैं।

पंचभूतों में, जीवात्मा के मानसिक भावों को व्यक्त करने की शरीर-संबंधी चेतना और लक्षणात्मकता होती है।

जैसे कुम्हार घडे को मूर्त रूप देने के लिए मिट्टी (पदार्थ) आधार होती है, वैसे ही परिपालक आत्मा (जीवात्मा) के अपने मनोविकारों को व्यक्त करने के लिए पंचभूतों (भूतात्माओं) को आधार बनाती है।

जीवात्मा जिस रूप और मानसिक बल के साथ भावना करता है, उसी के अनुरूप पंचभूतों की शक्ति उन बलों और रूपों को व्यक्त करने वाले शरीर के गुणों को धारण करती है। सभी जीवों का मनोज्ञान उनके देह रूप में प्रकट होने के लिए पंचभूत सहयोग करते हैं।

जीव जिस प्रकार स्वयं को अनुभव करता है, उसी के अनुरूप वह कभी पशु, पक्षी, बलवान, दुर्बल, महापुरुष या देवता जैसे विभिन्न रूपों और गुणों को धारण करता है। ऐसा कोई जीव नहीं है जो दैविक स्वरूप न रखता हो। जैसे कोई मनुष्य ज्ञान में अल्प होने पर भी मनुष्य ही रहता है, उसी प्रकार जीव भी यदि उसका मानसिक ज्ञान सीमित हो, तो भी वह जीवत्व से वंचित नहीं होता। समस्त जीवों में दैव स्वरूप ही विद्यमान है। जब जीवात्मा स्वयं को सीमित मानती है, तब वह सीमित शारीरिक ज्ञान में सीमित रूप में ही प्रकट होती है। परन्तु जब वह यह बोध कर लेता है कि उसकी शक्ति सर्वव्यापक है, और उसमें विश्वास करता है, तब उसकी शक्ति दैवशक्ति बन जाती है।

आत्मिक चेतना में प्रतिक्रिया देनेवाला जीव, प्रतिक्रिया उत्पन्न करनेवाली शक्ति के साथ मिलकर प्रकृति-पुरुष रूप में विद्यमान है। प्रकृति और पुरुष के विषय संयोग से ही विषय-ज्ञान प्रकट होता है।

जीव जिन-जिन विषयों से संयोग करता है, वे सभी विषय उसी अनुसार प्रकट होते हैं।

इस शरीर रूपी मूर्ति का परिपालक आत्मा ही द्रष्टा और शिल्पकार है। पंचभूत जैसे शिलाएं हैं, जो द्रष्टा के मानसिक दर्शन के अनुसार शिल्प (शरीर) का रूप धारण करती हैं।

हे श्रीराम! जीव के भौतिक शरीर में स्थित कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, उसकी इच्छाओं और संकल्पों को पूर्ण करने वाले ऐश्वर्य रूपी योग हैं। जीव, अपनी शक्ति के साथ जीवात्मा के रूप में, दिव्य शरीर के रूप में, और दैवी तत्व के रूप में इस भौतिक शरीर में विद्यमान है। जीव इन्द्रियों के माध्यम से विषयों का ज्ञान प्राप्त कर रहा है, लेकिन इन्द्रियाँ ही वह स्वयं नहीं हैं। इन्द्रियाँ तो उसकी संपत्ति हैं। जिस प्रकार एक व्यक्ति टेलीफोन में स्पीकर से बातें सुनता है और माइक से अपने विचार प्रकट करता है, उसी प्रकार जीव भी अपने मन के भावों को कंठ से प्रकट करता है और अन्य प्राणियों के भावों को कानों से सुनता है। जब वह किसी स्थान पर जाना चाहता है तो वह पैरों के माध्यम से वहाँ जाता है। इस प्रकार कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, जीव के लिए विषय ज्ञान को प्राप्त करने के इन्द्रिय साधन के रूप में विद्यमान हैं। जीव का इन इन्द्रिय साधनों से युक्त होना ही एक योग है। ये योग, जीव के मनो संकल्पों के अनुरूप प्राप्त होते हैं।

योग का अर्थ है जो नहीं है उसे प्राप्त करना, रखना या साथ होना। जिनके पास योग है, वे उसके भोग का अनुभव करते हैं। गृह (घर) होना गृह योग है। गृह होने के कारण इसका भोग अनुभव किया जाता है। धन होना धन योग है। धन योग के कारण इसका भोग अनुभव किया जाता है। वाहन योग होने के कारण इसका भोग अनुभव किया जाता है। जीव ने विषय वांछा के कारण ही देह प्राप्त की है। जीव का देह होना एक योग है। देह होने के कारण वह इसके भोग का अनुभव करता है। पक्षी के पास पंख होना एक योग है, जिसके कारण वह आकाश में विहार करते हुए भोग का अनुभव करता है।

हे श्रीराम! यह प्रकृति, जो देह के रूप में विद्यमान है, उस वस्त्र के समान है जिसे जीव धारण करता है। यह एक स्थिर और रक्षक निवास की तरह है। यह जीव के यात्रा करने के लिए एक वाहन के समान है।

22. जीव की त्रिविध देह  (तीन प्रकार की शरीर धारणा):

जीव के लिए जो प्रकृति है, वह उसे तीन प्रकार के शरीर ज्ञान प्रदान करती है: (1) दिव्य शरीर (2) पांचभौतिक शरीर (3) जगत शरीर.

(1) दिव्य शरीर: भौतिक शरीर के साथ सूक्ष्म शरीर में विद्यमान रहने वाले जीव को ही दैविक शरीर कहा जाता है। दिव्य शरीर में जीव देह भावना, मनो भावना, इच्छाएँ और संकल्प रखता है। वह पूर्व जन्मों की वासनाएँ भी रखता है। आत्मा, मन और चित् शक्ति से युक्त जीव दिव्य शरीर धारण करता है।

(2) पांचभौतिक शरीर: दिव्य शरीर वाले जीव की मनो भावना और मनो संकल्प को पूरा करने वाला संकल्प योग शरीर ही पंचभूतों से निर्मित यह भौतिक शरीर है। जीव इस भौतिक शरीर को वाहक बनाकर पृथ्वी पर संचरण करता है। भूतात्माओं को उनके लिए निर्धारित पदार्थ धर्म ही भौतिक शरीर के रूप में होता है। वे पंचभूतों की शक्ति को वाहक बनाकर यात्रा करती हैं।

(3) जगत् शरीर: जीव के संकल्पों को पूरा करने वाले भौतिक शरीर के लिए आश्रय और स्थिरता का आधार प्रदान करने वाली पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, ग्रह और नक्षत्र ही जगत् शरीर हैं। जीव के जीवित रहने के लिए पृथ्वी, और उसके अस्तित्व के लिए आधारभूत सूर्य, चंद्र, ग्रह-नक्षत्र आदि जीव के पास जगत् शरीर के रूप में हैं। इस प्रकार आत्मा तीन प्रकार के शरीर ज्ञान को अपनी संपदा के रूप में रखती है। Top of Form

श्रीराम : “हे महाशक्ति! मनोभावना के कारण शरीर ज्ञान प्राप्त करने की बात मैं स्पष्ट रूप से समझ सका। इसके लिए शक्ति और पंचभूत सहयोग करते हैं। विषय वांछा और मनो संकल्प के कारण इंद्रियाँ कैसे प्राप्त हुईं? उसी प्रकार विभिन्न जीवों में प्रत्येक का अलग-अलग शरीर ज्ञान और इंद्रिय ज्ञान है। कुछ जीव रेंगने वाले शरीर रखते हैं, कुछ सीमित रूप से चलने वाले शरीर, कुछ अत्यंत तेज गति से चलने वाले शरीर, और कुछ पंखों के साथ उड़ने वाले शरीर रखते हैं। जीवों ने विभिन्न शक्तियाँ कैसे प्राप्त कीं? इन अंतरों का कारण क्या है?

महाशक्ति: “हे श्रीराम! जीव जिस प्रकार की शक्ति की आकांक्षा करता है, वह अपनी मनोबल और प्रयत्नबल (पुरुषार्थ) के अनुसार उसी के अनुकूल भौतिक शक्ति तथा उसके अनुसार शरीर-बोध प्राप्त करता है।

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23. संकल्प के अनुरूप जीवों का शरीर व इन्द्रियाँ प्राप्त करना

जीवात्माएँ अपने पास विद्यमान बल और पंचमहाभूतों की शक्ति को विभिन्न रूपों में उपयोग कर रही हैं।

यदि जीव चलना चाहता है, तो पंचमहाभूत उसे चलने की शक्ति के रूप में सहयोग करते हैं। यदि वह रेंगना चाहता है, तो वे रेंगने की शक्ति के रूप में कार्य करते हैं। यदि वह उड़ने का प्रयास करता है, तो पंचमहाभूत उसे उड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं। अतः हर जीव को उसके संकल्प और प्रयासबल के अनुसार विभिन्न शक्तियाँ और क्षमताएँ प्राप्त होती हैं।

हे श्रीराम! जीवों को जो कर्मेन्द्रियाँ जैसे हाथ, पैर, पंख और ज्ञानेन्द्रियाँ (जैसे आंखे, कान) प्राप्त हुई हैं, वे सब उस मनोवांछा को पूर्ण करने के लिए ही साधन रूप में विकसित हुई हैं, जिनके लिए जीवों ने निरंतर प्रयास किया है।

यदि कोई जीव बार-बार चलने का प्रयास करता है, तो चैतन्य शक्ति पंचमहाभूतों के द्वारा उस विषय वांछा को पूर्ण करने हेतु पैरों का निर्माण करती है। इसी प्रकार, यदि कोई जीव हजारों-लाखों बार उड़ने का प्रयास करता है, तो उसकी मनोवांछा के अनुरूप पंचमहाभूत उसकी इच्छा को साकार करने हेतु पंखों के धर्म को धारण कर लेते हैं और भौतिक शक्ति के रूप में उसका शरीर ऐसा बनता है।

पंचभूत जीवात्मा के संकल्पित कार्य की सिद्धि के लिए उपयुक्त इंद्रिय नियमों से युक्त होते हैं। शरीर के सभी पदार्थ नियम विषय ज्ञान प्रदान करने के उद्देश्य से होते हैं।

जीव जहाँ अपनी मनोदृष्टि केंद्रित करता है, वहाँ शक्ति विद्यमान रहती है; जिसके लिए प्रयास करता है, शक्ति उस कार्य को करती है। जिस दृष्टिकोण के साथ रहता है, शक्ति उस ज्ञान को धारण करती है। उसी तरह, शक्ति जीव को संदेश देकर उसे प्रभावित करती है। जीव शक्ति को जिस धर्म की ओर निर्देशित करता है, शक्ति उस धर्म को ग्रहण करती है। शक्ति जीव के संदेश को स्वीकार करती है। शक्ति के आदेश जीव को प्राप्त होते हैं, और वह तदनुसार व्यवहार करता है।

जीव जिस कार्य के लिए प्रयास करता है, उसके प्रयासबल के अनुसार चैतन्यशक्ति (चित् शक्ति) पंचमहाभूतों को आकर्षित करती है। आकर्षित हुए पंचमहाभूत, जीवात्मा के मनो-लक्ष्य को पूर्ण करने वाले इन्द्रिय-साधनों के रूप में विविध धर्मों (गुणों) को स्वीकार करते हैं।

24. भौतिक शरीर की रचना:

 

 

 

 

 

 

महाशक्ति: हे श्रीराम! जो जीव अशरीरी रूप में केवल पदार्थ रूप में उपस्थित था, उसने कैसे अपने मानसिक संकल्प से शरीर और इन्द्रियाँ प्राप्त कीं। अब मैं तुम्हें बताऊँगा, ध्यानपूर्वक सुनो।

पृथ्वी पर, स्थूल जड़-पदार्थ रूप में और शरीरहीन रूप में स्थित जीव को जब गतिशील होने की इच्छा उत्पन्न हुई, तो उसके मानसिक प्रयास के कारण शक्ति ने उस गति के लिए आवश्यक शरीर-धर्म को उत्पन्न किया।

पृथ्वी पर निराकार रूप में विद्यमान जीव संकल्प-विकल्पों और मनोविकारों के द्वारा मनोबल प्राप्त करता है और परिपालक आत्मा के रूप में शक्ति अर्जित करता है। परिपालक आत्मा के रूप में शक्ति प्राप्त करने वाला जीव जब गति करने का प्रयास करता है, तब उसके मनो संकल्प को पूर्ण करने के लिए शक्ति पंचभूतों को आकर्षित करती है और जीव को गति करने के साधन के रूप में शारीरिक ज्ञान प्रदान करती है। जीव जितना अधिक मनोबल रखता है, उतना ही वह भौतिक शरीर प्राप्त करता है।

जीव के मनोबल के अनुसार शक्ति त्रिदशाओं में कार्य करती है। प्रारंभ में गति करने का संकल्प, और उसी संकल्प के साथ बार-बार गति करने का प्रयास करने से, लंबे समय तक “मैं गति कर सकता हूँ” की भावना बलवती होती है। यह बलवती भावना ही कर्म बल है। कर्म बल और विचारणा बल के अनुसार चित् शक्ति क्रिया उत्पन्न करती है और पंचभूतों के माध्यम से कर्म फल प्रदान करती है। जीव की मनोभावना के अनुरूप शक्ति गति के लिए उपयुक्त देह प्राप्त कराती है। इस प्रकार गति के लिए प्रारंभिक अवस्था में प्राप्त शरीर ही सूक्ष्म भौतिक देह है। जीव के पास मौजूद यह सूक्ष्म भौतिक देह ही प्रारंभिक परिणाम अवस्था में सूक्ष्म जीवों के रूप में दिखाई देती है।

जीव का मनोबल और मनोविश्वास एक शक्तिशाली चुम्बक की तरह पंचभूतों को आकर्षित करता है, उन्हें अपनी शक्ति के रूप में ग्रहण करता है और एक बलशाली आयुध की तरह नियमों की स्थापना करता है।

सीमित रूप से सूक्ष्म भौतिक देह धारण करने वाला वाला जीव समय के साथ संकल्प-विकल्पों और गति के प्रयासों के द्वारा अधिक स्थूल देह की भावना प्राप्त करता है। जीव की भावना बल के अनुरूप पंचभूत आकर्षित होते हैं और अधिक देह बल प्राप्त होता है। जीव का मानसिक परिणाम ही देह परिणाम का कारण है। यदि जीव मानसिक रूप से परिपक्व होता है, तो वह क्रमशः शारीरिक रूप से भी विकसित होता जाता है।

प्रत्येक क्रिया शक्ति से प्रभावित होती है। जीव उस शक्ति से प्रभावित हो रहा है। जीव और शक्ति के पारस्परिक सहयोग से ही क्रियाएँ संपन्न होती हैं। शक्ति के गुणों में से एक है – इच्छा शक्ति।यही इच्छा शक्ति जीव के भीतर गतिशीलता की इच्छा उत्पन्न करती है। इसी के कारण, वह विभिन्न कार्यों की ओर प्रेरित होकर प्रभावित होता है और कर्म करता है। ज्ञान शक्ति – बुद्धि का रूप लेकर, जीव को उन कर्मों की ओर प्रेरित करती है। अतः शक्ति जीव को प्रभावित करती है, और जीव उस शक्ति को प्रभावित करते हुए विषय ज्ञान की प्राप्ति करता है।

चित्तशक्ति पंचमहाभूतों को महापंचमहाभूतों के रूप में बल प्रदान करती है, और उस शक्ति से ही जीव को इंद्रियों के माध्यम से गतिशील करने योग्य बल प्रदान होता है।  

जब जीव तेज गति से चलने का प्रयास करता है, तब ‘शक्ति’ उसे उस प्रयास के अनुरूप तेजी से चलने में समर्थ साधन के रूप में इंद्रिय सामर्थ्य प्रदान करती है। इसके लिए शक्ति पंचमहाभूतों को विविध नियम प्रदान करती है। ये नियमबद्ध पंचमहाभूत ही जीव के भीतर पाँव, मछली के पंख व अन्य गतिशील अंगों के रूप में विविध धर्मों (गुणों) को धारण करते हैं। इसी अनुरूप, जीव कर्मेंद्रियों के सहयोग से तेज़ी से आगे बढ़ने की क्षमता प्राप्त करता है। उसके प्रयास के बल के अनुसार, वह छोटे जीवों या बड़े जीवों, जैसे मछली, कछुआ के रूप में विकसित होता है।

कच्चे पदार्थ के रूप में मौजूद लोहे को आवश्यकता के अनुसार आकार और गुण प्रदान करके वाहन के पहिए के रूप में उपयोग किया जा सकता है। उसी प्रकार, पानी भरने के लिए मटके के रूप में, फल काटने के लिए चाकू के रूप में, लोहे को जो भी गुण प्रदान किया जाता है, वह उसी गुण को धारण करता है। इसी तरह, परिपालक आत्मा, भूतात्म शक्ति, और महाभूतात्म को सक्षम बनाने वाले पदार्थ के गुण, पंचभूतों के गुण, और इंद्रियों के गुण प्रदान करके उन्हें नियत कार्यों के लिए उन्हें नियोजित करती है।

मन की संकल्प शक्ति और क्रियाशील प्रयास ही कर्म हैं। जीव की कर्मशक्ति के अनुसार उसे इंद्रियों की शक्ति प्राप्त होती है। 

हे श्रीराम! जिस प्रकार कोई व्यक्ति दूसरे के सहयोग से यात्रा करता है, उसी तरह,चलने की इच्छा रखने वाला जीवात्मा और चलने में सहायक पंचभूत मिलकर संसार में विचरण कर रहे हैं। जीवात्मा को जो अनुभव प्राप्त हो रहा है, उसी प्रकार पंचभूत और महापंचभूत भी अपनी सीमा में उस अनुभव को प्राप्त कर रहे हैं।

जीवात्मा द्वारा लिया गया भोजन पंचभूतों (भूतात्माओं), महापंचभूतों अर्थात् जीवकोशिकाओं, अंगों और इंद्रियों को प्राप्त होता है। भूख उत्पन्न करके अन्य पंचभूत प्रभावित होते हैं, और लिया गया भोजन उनके स्तर पर संतुष्टि प्रदान करता है।

जीव जो सुख-दुख अपने शरीर के माध्यम से अनुभव करता है, उसे पंचभूत भी अनुभव करते हैं। इसके कारण, जीव द्वारा ग्रहण किया गया भोजन पंचभूतों को प्रभावित करता है, जिससे शरीर में क्रोध, द्वेष, सात्त्विकता और सामंजस्य व्यक्त होता रहता है।

नेत्रहीन जीव के शरीर पर जब प्रकाश की तरंगें पड़ती हैं, तो उस दृश्य को स्पष्ट रूप से देखने की जीवात्मा की मनोवांछा के अनुसार पंचभूत दृश्य को स्पष्ट रूप से दिखाने वाले नेत्र ज्ञान और नेत्र निर्माण की क्षमता रखते हैं।

जीवात्मा में जब कोई प्रकाश अस्पष्ट रूप से झलकता है, तो उस प्रकाश को स्पष्ट रूप में देखने का मनोसंकल्प और उसके कर्मबल के अनुसार, चित् शक्ति पंचभूतों को आकर्षित करती है। चित् शक्ति से प्राप्त संदेश के अनुरूप, पंचभूत उस प्रकाश को स्पष्ट करने वाले ज्ञानेंद्रिय ‘नेत्र’ का धर्म प्राप्त करते हैं।

जीव संकल्प करता है, ‘शक्ति’ उस संकल्प को पूर्ण करने का सूत्र प्रदान करती है। पंचभूत उस सूत्र के अनुसार कार्य करते हैं।

चित् शक्ति, पंचभूतों और इंद्रियों को उनकी भूमिका के अनुसार पदार्थगत सामर्थ्य प्रदान करती है।

जब ध्वनि-तरंगें जीव के संपर्क में आती हैं, तो ध्वनि को स्पष्ट रूप से सुनने की मानसिक इच्छा के अनुसार पंचभूत प्रभावित होते हैं और ध्वनि को सुनने वाली ज्ञानेंद्रिय का धर्म प्राप्त करते हैं।

जीव की मनो-संकल्पना के अनुरूप, कर्मेंद्रियाँ और ज्ञानेंद्रियाँ उसकी मनोवांछा पूर्ति के साधन बनती हैं।

जीव की मनो संकल्प शक्ति के कारण, जिस प्रकार वह पैर, हाथ और जोड़ प्राप्त करता है, उसी प्रकार शिकार के लिए आवश्यक अंगों और आयुधों को भी उसके मानसिक प्रयास के अनुसार प्राप्त होते हैं।

जब जीव शिकार के लिए प्रयास करता है, और किसी अन्य जीव को पकड़ने की मानसिक इच्छा करता है, तो उसकी मानसिक अभिप्रेरणा एक आदेश के रूप में पंचभूतों तक पहुँचती है। तदनुसार, पंचभूत ‘पंजे’ का रूप धारण करते हैं, बिल्ली, अपने पूर्वजन्म के संकल्पों के प्रभाव से, तीन अवस्थाओं में ‘पंजे’ की शक्ति और समझ प्राप्त करती है।

जब जीव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बार-बार किसी कर्म को करता है, तो उसकी साधना से ‘इच्छाशक्ति (Will Power)’ विकसित होती है। यदि मन प्रबल इच्छाशक्ति से युक्त हो, तो चित् शक्ति उसके अनुरूप भौतिक शक्ति की रचना करती है।

जीव जिस उद्देश्य के लिए प्रयास करता है, वह देश और काल के अनुसार तीन अवस्थाओं में साकार होता है:कर्म करना, 2. कर्मबल प्राप्त कर उससे संबद्ध क्रिया का घटित होना, 3. कालक्रम में उस कर्म का फल अनुभव में आना।

बिल्ली द्वारा जीवों को पकड़ने की इच्छा उसके पूर्व संकल्प की अभिव्यक्ति है, और वही वर्तमान में उसकी ‘पंजा-बोध’ का कारण है। जैसे शिकारी को पैना खंजर दिया जाता है, उसी तरह ‘शक्ति’ जीव की आवश्यकता अनुसार तेज़ नख प्रदान करती है।

जीव अनेक प्रयासों से साधना-बल और तप-बल अर्जित करता है। उसके तपबल के अनुरूप ‘शक्ति’ उतनी ही बलवती होकर पंचभूतों को आवश्यक कार्यों में नियोजित करती है।

वर्तमान में जीव जिन इंद्रियों से युक्त है, वे पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप ही प्राप्त हुई हैं।

जीव को भूतकाल के संकल्प और कर्म-बल के अनुसार वर्तमान में ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ प्राप्त हुई हैं। और जो कर्म वह वर्तमान में करता है, उनके कर्म-बल के अनुसार, भविष्य में उसे नया शरीर- ज्ञान प्राप्त होगा।

प्रत्येक जीव के भीतर उसका मनोभाव और संकल्प उसके शरीर और इंद्रियों में प्रकट होता है। Top of Form

जीवों को प्राप्त इंद्रियाँ उन्हें जड़ रूप में ही अनुभव करनी पड़ती हैं। वर्तमान में उनके द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर भविष्य में उनमें परिवर्तन होता है।

जीव की मनो-संकल्पना ही शक्ति को दिशा दिखाती है। शक्ति उसी दिशा में यात्रा करते हुए पंचमहाभूतों को भी उन-उन मार्गों में प्रवाहित करती है। जीव की मनो-संकल्पना ही शक्ति को दिशा दिखाती है। शक्ति उसी दिशा में

पक्षी को पंख प्राप्त होने से पहले, जब वह एक छोटे जीव के रूप में होता है, तब वह अपनी जीविका के लिए ऊपर-नीचे कूदकर उड़ने का प्रयास करता है। उसकी दृष्टि और आवश्यकता के अनुरूप, पंचभूत उस आवश्यकता को पूरा करने वाली उपयुक्त पंखों की शक्ति प्रदान करते हैं। पक्षी के पंख उसके मनो संकल्प को पूरा करने के साधन के रूप में कार्य करते हैं।

जीव उड़ने के अनेक प्रयासों में कर्मबल को प्राप्त करता है। यही कर्मबल पंचमहाभूतों को आकर्षित करने की शक्ति रखता है। आकर्षित हुए पंचमहाभूत पंखों के धर्म (स्वभाव) को धारण करते हैं।

जैसे धागे के आधार पर मोतियों की माला बनती है, वैसे ही पूर्व-संस्कारों (संकल्पों) के आधार पर जीव को ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ मोतियों के समान सजकर प्राप्त होती हैं।

जीव का लक्ष्य, शक्ति का लक्ष्य और पंचमहाभूतों का लक्ष्य अलग-अलग नहीं है। जीव के मनो लक्ष्य के अनुसार ही शक्ति, पंचमहाभूत और महा-पंचमहाभूत सभी एक ही लक्ष्य की साधना के लिए कार्य करते हैं।

25. इंद्रियों और अंगों का शक्तिशाली रूप में रूपांतरित होना:

हे श्रीराम! ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ प्राप्त करने वाला जीव, जब उन्हें अधिक बार प्रयोग करता है, तो वे शक्तिशाली और सामर्थ्यवान बनती जाती हैं।

जीव को कर्मफल के रूप में प्राप्त हुए अंग और इंद्रिय-ज्ञान प्रारंभ में सीमित शक्ति के साथ, सूक्ष्म और दुर्बल होते हैं। किंतु जब जीव बार-बार उन इंद्रियों का उपयोग करता है और उनके द्वारा विभिन्न कार्यों का अभ्यास करता है, तो उसकी दुर्बल अवस्था समाप्त होकर वे शक्तिशाली इंद्रियों में रूपांतरित हो जाती हैं। जिस इंद्रिय का अधिक उपयोग होता है, उसमें से दुर्बलता मिटकर शक्ति का संचार होता है। कठिन है यह समझना ही दुर्बलता का भ्रम है। कार्य की सिद्धि में यह भ्रम मिटकर मनोबल और आत्मविश्वास को दृढ़ बनाता है। इस आत्मविश्वास के अनुसार ही भौतिक शक्ति उसे शक्तिशाली अंग, इंद्रियाँ और शरीर-संवेदना प्रदान करती है।

जीव अपने साधना-बल के माध्यम से इच्छा-शक्ति (Will Power) को बढ़ाता है, और उस शक्ति से इंद्रिय ज्ञान को भी सबल बना लेता है।

जब जीव लगातार चलता है और पैरों का अधिक उपयोग करता है, तब उसकी शक्ति और पंचमहाभूतों की शक्ति उसी कार्य में संलग्न रहती है। चलने, शिकार करने, दौड़ने जैसे प्रयासों में निरंतर पैरों के प्रयोग से उनकी दुर्बलता समाप्त हो जाती है और वे शक्तिशाली पैरों के रूप में विकसित होते हैं।

जब जीव बार-बार अपने पैरों का प्रयोग करता है, तब पैरों के प्रति उसकी जो दुर्बल दृष्टि होती है वह समाप्त हो जाती है और उसमें एक सशक्त दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। उस दृष्टिकोण के अनुसार, उसके पैर भी शक्तिशाली बनते जाते हैं। इसके साथ-साथ उसका सम्पूर्ण शरीर भी बलशाली रूप में परिवर्तित होता है। केवल कार्य की निरंतरता के माध्यम से ही जीव अपनी इंद्रियों और अंगों को शक्तिशाली बनाता है। एक छोटा जीव भी समय के साथ बलशाली शरीर और सामर्थ्य से युक्त प्राणी में रूपांतरित हो जाता है।

गिद्ध आकाश से भोजन को खोजने की प्रक्रिया में अपनी आँखों का अधिक उपयोग करता है। दूरस्थ वस्तुओं को देखने की उसकी मनोवांच्छा के अनुरूप, पंचभूत उसकी इस भावना को पूर्ण करने हेतु निरंतर उसी कार्य में संलग्न रहते हैं और उसे तीव्र दृष्टिशक्ति प्रदान करते हैं। परिणामस्वरूप, जीड़ को अत्यंत शक्तिशाली नेत्र-ज्ञान प्राप्त होता है। इसी प्रकार, अपने पैरों और पंखों का निरंतर उपयोग करने के कारण, वे बलशाली कर्मेंद्रियों में रूपांतरित हो जाते हैं। मन जिस विषय पर अधिक एकाग्र होता है, या जो कार्य करने का प्रयास करता है, शक्ति उसी दिशा में कार्य करती है और उसे अधिक शक्तिशाली बना देती है।

गिद्ध अपने दैनिक जीवन में मनोबल और आत्मविश्वास को बढ़ाते हुए एक शक्तिशाली पक्षी बन जाता है, जो प्रबल पंखों, बलशाली पैरों और तीव्र दृष्टि से युक्त होता है।

मन के विश्वास का अनुसरण करते हुए शक्ति यात्रा करती है। यह विभिन्न धर्मों (कर्तव्यों) को प्रदान करती है। ‘शक्ति’ को जीव का मनोविश्वास और मानसिक बल ही गतिमान करता है।

हे श्रीराम! पृथ्वी पर जो भी जीव किसी भी प्रकार की इंद्रिय-शक्ति प्राप्त करते हैं, वह केवल उनके प्रयत्न, अभ्यास और साधना-बल के कारण ही संभव होता है। बिना प्रयास और साधना के कुछ भी प्राप्त नहीं होता। प्रयास से साधना बल और कर्म बल पाकर ही जीव अपने कर्मों के फल प्राप्त करते हैं।

प्रयास का स्वरूप ही कर्म है। ऐसे कर्मबल के परिणामस्वरूप ही प्रत्येक जीव को प्राप्त हुई इंद्रियाँ शक्तिशाली बनती जा रही हैं।

जीव के द्वारा अपने दैनिक जीवन में किए गए कर्मों की साधना के कारण ही उसकी कर्मेन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ और शारीरिक क्षमता में वृद्धि होती है। जितना अधिक प्रयास किया जाता है, उतना ही साधना बल बढ़ता है। साधना के बल से कठिनाई रूपी मानसिक दुर्बलता दूर होती है, और मनोबल एवं आत्मविश्वास सुदृढ़ होते हैं। इसके अनुरूप, शरीर और इंद्रिय-ज्ञान भी विकसित होता है।

जीव के मनोबल में परिवर्तन आने से उसकी दुनिया बदल जाती है। जीड़ जैसे पक्षी अपनी साधना शक्ति से शक्तिशाली बाज (डैग) में परिवर्तित होकर अपना ज्ञान, आकार और रूप बदल लेता है और एक अलग जीव के रूप में प्रतीत होता है। आत्मा में न विकार होते हैं, न ही आकार। उसके बल और ज्ञान के अनुसार ही वह विकार या आकार को प्राप्त करती है। जीव का मानसिक परिवर्तन ही उसके भौतिक शरीर में परिलक्षित होता है। उदाहरण के लिए, बिल्ली निरंतर शिकार करने की प्रक्रिया में मनोबल और मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर शरीर ज्ञान में शेर या सिंह जैसे भिन्न जातियों में रूपांतरित हो जाती है।

मुर्गी के उड़ने के प्रयासों के अनुसार ही उसे सीमित पंख प्राप्त होते हैं। वह और अधिक उड़ने का प्रयास नहीं करती, इसलिए वह अपनी शक्ति को सीमित मानने के भ्रम में रहती है। जीव जितनी मात्रा में प्रयास करता है और शारीरिक शक्ति का उपयोग करता है, उतनी ही शक्ति वह प्राप्त करता है।

“मुर्गी और गृद्ध में मौजूद पंचभूत तत्व समान होते हैं। पंचभूतों में कोई बल या दुर्बलता नहीं होती। बल और दुर्बलता उन व्यवस्थाओं में होती है जो पंचभूतों द्वारा संचालित होती हैं। इनकी इंद्रिय-व्यवस्थाओं की वर्तमान स्थिति का कारण उनका पूर्वज प्रयास है। मुर्गी और गृद्ध अपने-अपने पूर्वकर्म बल के अनुसार वर्तमान में उस विशेष शारीरिक तत्व में स्थित हैं।

प्रयास के अनुसार कर्म होता है, और कर्म की तीव्रता के अनुसार कर्म में बल उत्पन्न होता है। कर्म के बल के अनुसार शक्ति में क्रिया-बल होता है। क्रिया-बल के अनुसार उसका प्रतिफल प्राप्त होता है।

बिल्ली ने शिकार करने की प्रक्रिया में मजबूत शरीर प्राप्त किया। बिल्ली दौड़कर जीवों का शिकार करने के क्रम में अपने पैरों का अधिक उपयोग करने के कारण उसके पैर और शरीर ने बल प्राप्त किया और वह जंगली बिल्ली के रूप में विकसित हुई। उसी क्रम में जंगली बिल्ली चीते, बड़े बाघ, सिंह के रूप में विभिन्न रूपों में बल प्राप्त करती गई। आत्मा नहीं बदली, परंतु उसका मनोभाव और मनोबल परिवर्तित हुआ। जीव के विभिन्न रूप और बल प्राप्त करने के कारण उसे विभिन्न प्रजातियों के रूप में जाना जाता है।

सोना विभिन्न रूपों में होता है। एक अंगूठी के रूप में होता है, एक हार के रूप में होता है। रूप अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उनमें अंतर्निहित सोना एक ही होता है। उसी प्रकार, जीवों के रूप अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उन सभी में जो जीव है, वह एक ही होता है।

जीव का विश्वास ही पंचभूतों को एक निश्चित क्रम में बनाए रखता है। जीव के आदेश का पालन करते हुए पंचभूत, शरीर में कभी शक्तिशाली ज्ञानशक्ति के रूप में, तो कभी दुर्बल ज्ञानशक्ति के रूप में कार्य करते हैं।

भूतकाल के मनःसंकल्प द्वारा एक सीढ़ी चढ़ सकने वाला शरीर-ज्ञान प्राप्त करने वाला जीव, वर्तमान में न केवल एक सीढ़ी चढ़ने की सामर्थ्य रखता है, बल्कि भविष्य में पाँच सीढ़ियाँ चढ़ सकने की सामर्थ्य भी अर्जित कर सकता है।

वर्तमान जन्म में जो जीव प्रयासबल से पाँच किलो उठा सकता है, वह अगले जन्म में अपनी शक्ति को और अधिक विकसित कर अधिक भार उठाने की शक्ति प्राप्त करता है। जो जीव चलना कठिन मानता है, वह चलने के प्रयास में अपने विश्वास को बढ़ाकर तेज़ी से चल सकने वाले जीव में रूपांतरित हो जाता है। इस प्रकार जीव अपनी शक्ति को जन्म-जन्मांतरों से विकसित करता हुआ बलशाली जीवों के रूप में परिवर्तन प्राप्त कर रहा है।

चींटियाँ करोड़ों बार भारी वस्तुएँ उठाने के क्रम में कर्मबल अर्जित करती हैं और स्वयं से सौ गुना अधिक वजन को आसानी से उठा सकने वाले मनोबल और विश्वास को प्राप्त कर चुकी हैं। उनके द्वारा भारी भार उठाने के लिए सहायक बन रहे पदार्थ को प्राप्त करने का कारण ही उनका निरंतर प्रयास और साधना बल है। अपने प्रयासों के अनुसार उन्होंने मनोबल प्राप्त किया है, और उनके मनोबल के अनुसार पंचभूतों ने उस कार्य को पूरा करने के लिए उपयुक्त भौतिक गुणों को धारण किया है।

कई लोग यह मानते हैं कि चींटियों के जीन मजबूत होने के कारण वे भारी भार को सहजता से उठा लेती हैं। किंतु समझना चाहिए कि उनके जीन में यह शक्ति पूर्वजन्मों में किए गए प्रयासों का ही फल है। जीव ने जो ज्ञानशक्ति कर्मसाधना से प्राप्त की है, वही सशक्त भौतिक ज्ञान के रूप में जीन के रूप में प्रकट होती है। जीव द्वारा अर्जित इन जीनों की रक्षा ‘शक्ति’ करती है, और उन्हें वंश परंपरा में हस्तांतरित कर विकास करती है। चींटी के जीन मजबूत होने के कारण वह आसानी से भारी वजन उठा सकती है, ऐसा कई लोग मानते हैं। उनके जीन के मजबूत होने का कारण पहले की गई उनकी मेहनत है, यह समझना चाहिए। जीव द्वारा कार्य साधन के माध्यम से प्राप्त ज्ञान-शक्ति ही मजबूत भौतिक ज्ञान के रूप में जीन के रूप में प्रकट होती है, यह समझना चाहिए। जीव द्वारा प्राप्त जीन को शक्ति संरक्षित करती है और उसे अपनी विरासत में स्थानांतरित करके वृद्धि करती है।

जैसे चींटियाँ अपने ज्ञान के अनुरूप घर बनाती हैं, पक्षी अपने ज्ञान के अनुसार घोंसला बनाते हैं, और मनुष्य अपने ज्ञान के अनुसार गृह का निर्माण करता है, उसी प्रकार, परिपालक आत्मा (जीवात्मा) अपने मनो-ज्ञान के अनुरूप उसी के अनुसार शारीरिक ज्ञान रखती है। सूक्ष्म जीव अपने मनो-बल के अनुरूप उतना ही शारीरिक ज्ञान रखते हैं। पशु अपने मनो-ज्ञान के अनुरूप उतना ही शारीरिक ज्ञान रखते हैं। मनुष्य अपने-अपने मनो-ज्ञान और मनो-बल के अनुरूप विभिन्न रूपों में शारीरिक ज्ञान रखते हैं। उच्च लोकों में स्थित देवता अपने मनो-ज्ञान और बल के अनुरूप दैवीय शरीर रखते हैं।

26. जीव की यात्रा – बल का समीकरण:

हे श्रीराम! जीव जिस स्थिति में होता है, उसी के अनुरूप वह अपनी बल को एकत्र करता है। मनुष्य केवल इस जन्म में ही अपनी प्रतिभा को विकसित नहीं कर रहा, बल्कि वह अनेक जन्मों से संचित ज्ञान के आधार पर अपने कार्य कर रहा है। इस जन्म में वह अपने कर्मबल के अनुसार और अधिक बल प्राप्त करता है। उसका पूर्व-संस्कारजन्य ज्ञान और वर्तमान ज्ञान, दोनों ही उसका साथ देते हैं। जीव द्वारा अर्जित ज्ञान को प्रकृति संरक्षित करती है और पुनः उसी जीव को लौटा देती है। एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को इस जन्म में परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में पूर्वज्ञान सहायता करता है। सिंह ने शिकार करना केवल इस जन्म में ही नहीं सीखा, उसके पूर्वज्ञान ही उसे सीखाता है। पक्षी जो घोंसला बनाता है, वह केवल इस जन्म में ही नहीं सीखा गया कौशल है, वह जन्मों से विकसित हो रहा है। वर्तमान में उसे वही पूर्वज्ञान सहारा दे रहा है। ‘शक्ति’ जीव को उसके पूर्वसंस्कारों की स्मृति दिलाती है और उसे आवश्यक कार्यों के लिए प्रेरित करती है।

दिव्य शरीर से युक्त जीव अपने भौतिक शरीर को मौजूदा स्थिति से उच्च स्थिति में परिवर्तित कर रहा है। जीव अपने सामान्य स्थूल शरीर से दैवीय शरीर तक विकास करने का कारक बन रहा है।

27. जीव के विश्वास के अनुरूप अतिंद्रिय रूप में कार्य करने वाली शक्ति:

मनुष्य में विद्यमान दुर्बल उद्देश्य को बदलना चाहिए। किसी भी कार्य को अत्यंत कठिन न मानने वाला मानसिक बल अर्जित करना चाहिए। इस मानसिक बल को प्राप्त करने के लिए साधना अत्यंत आवश्यक है।

कोई व्यक्ति चाहे 70 किलो वजन का क्यों न हो, यदि वह 50 किलो वजन नहीं उठा पा रहा है, तो इसका कारण यह है कि उसके मन में यह भ्रांति है कि वह वजन अत्यंत भारी है। जब वह बार-बार उस वजन को उठाने का अभ्यास करता है, तो उसकी यह भ्रांति दूर हो जाती है। और उस वजन के बारे में उसका दृष्टिकोण बदलता है। तब उसमें यह विश्वास उत्पन्न होता है कि यह कार्य कठिन नहीं है। ऐसा विश्वास प्राप्त करने वाला व्यक्ति कोई भी भारी कार्य सहजता से कर सकता है। वह हर कार्य को सकारात्मक रूप से करने में समर्थ हो जाता है।

बिना प्रयास के भ्रांति को दूर नहीं किया जा सकता। जब प्रयासपूर्वक भ्रांति दूर होती है, तभी ज्ञान का रहस्य प्रकट होता है।

मनो-बल और मनो-विश्वास के विपरीत शारीरिक ज्ञान, मानसिक ज्ञान, और बुद्धि-बल का अस्तित्व नहीं हो सकता।

विश्वास के रहस्य को समझने वाले पूर्वजों ने उसका ज्ञान प्राप्त किया और अपनी शक्ति व सामर्थ्य को विश्व कल्याण के लिए उपयोग किया।

माया के भ्रम को पैदा करने वाले रहस्य को जानने वाले ही शिव और महाविष्णु हैं। उन्होंने अत्यधिक घनत्व वाले पदार्थों से बने शिव धनुष और विष्णु धनुष को, जो साधारण लोग उठा नहीं सकते, धारण किया और उसे सहजता से उपयोग में लाने का बल और विश्वास प्राप्त किया। कालांतर में, जब श्रीराम ने विश्वामित्र की कृपा से बल और अतिबल विद्याएँ प्राप्त कीं, तब उन्होंने शिवधनुष और विष्णुधनुष को भेदकर अपने पराक्रम को समस्त विश्व के सामने प्रदर्शित किया।

श्रीकृष्ण और हनुमान ने पर्वत को सहजता से उठाकर अपने बल का परिचय दिया। वास्तव में भार एक मानसिक भ्रांति है, जो जीव के मनोबल और आत्म-विश्वास से संबंधित होती है।

कमजोर भ्रांति को जीतकर विश्वास रखना ही अतींद्रिय बल है। अतींद्रिय बल प्राप्त करने वालों में कृष्ण, राम, विष्णु, शिव, हनुमान, सीता, वसिष्ठ, बुद्ध आदि सम्मिलित हैं।

बाहर प्रकट होने वाला और दिखाई देने वाला बल भौतिक शक्ति है। मानव नेत्र को दिखाई न देने वाला, क्रिया को संचालित करने वाला और कार्य को अतींद्रिय रूप से करने वाला चित् शक्ति है।

चाहे कोई अपनी स्वयं की शक्ति और सामर्थ्य में दृढ़ विश्वास रखे, या फिर किसी दिव्य सत्ता में अटूट आस्था रखे — दोनों ही दशाओं में उसकी शक्ति अतिंद्रिय रूप में कार्य करती है।

हे श्रीराम! मंत्र भी विश्वास के अनुसार ही प्रभावी होते हैं। जब किसी गुरु पर पूर्ण विश्वास रखते हुए वह गुरु अपने शिष्य को मंत्रोपदेश करता है, तब वह मंत्र उस शिष्य पर अत्यंत प्रभावशाली ढंग से कार्य करता है।

28. योग और व्यायाम द्वारा मानव शरीर को शक्तिशाली बनाना:

हे श्री राम! मानव ने परिणाम क्रम में अपने दैनिक जीवन में किए गए कार्यों, यात्राओं, अधिक दूरी तक चलने, दौड़ने, और भारी वजन उठाने के कारण अपनी आवश्यकताओं के लिए किए गए विभिन्न कार्यों द्वारा मनो-बल और मनो-विश्वास के साथ अपने शरीर को मजबूत बनाया है।

शरीर में अंगों और इंद्रियों का बल कम न हो और बल को बनाए रखने के लिए शारीरिक व्यायाम करना चाहिए, अन्यथा शरीर और उसके अंग अपनी सक्रियता खो देते हैं और दुर्बल हो जाते हैं।

शरीर को बलवान बनाने के लिए ही ऋषियों ने योगासन की विधियाँ संसार को प्रदान कीं। योगासनों के अभ्यास से शरीर हल्केपन का अनुभव करता है। योग-साधना के माध्यम से व्यक्ति दुर्बल मानसिक भावनाओं से छुटकारा पाकर, मनोबल को विकसित करता है। उसी अनुरूप, वह शक्तिशाली शारीरिक संतुलन और योगबल को प्राप्त करता है।

कठिन आसनों के अभ्यास के क्रम में शरीर की दुर्बलता समाप्त होकर, एक दृढ़ दृष्टिकोण उत्पन्न होता है।

शारीरिक बल के लिए योगासनों का अभ्यास करते हुए, मानसिक बल के लिए भी मानसिक साधनाएँ करनी चाहिए। मानसिक की स्थिति में उत्पन्न होने वाली नकारात्मकताओं का समय-समय पर निरीक्षण करते हुए उन्हें नियंत्रित करने की साधना करनी चाहिए। उत्तेजना, भय, व्यसन, असूया और द्वेष जैसे विकारों को पहचानते हुए, उन्हें रोकने की साधना करनी चाहिए। जो व्यक्ति इन मानसिक दुर्बलताओं को साधना द्वारा जीत लेता है, वही सच्चा योगी है।

अपने भीतर के शांत स्वभाव को कभी विचलित नहीं होने देना चाहिए। यदि मन शांत होता है, तो जीव आनंदित रहता है और शरीर भी स्वस्थ और शक्तिशाली बना रहता है।

जीव को अपनी शक्ति से बुद्धिबल को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। शरीरबल की तुलना में बुद्धिबल अधिक श्रेष्ठ है। बुद्धिबल को विकसित करने के लिए निरंतर नवीन आविष्कारों की दिशा में प्रयत्नशील रहना चाहिए। नई बातों को सीखते रहना चाहिए, और हर कार्य में निपुणता प्रदर्शित करनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो बुद्धिबल क्षीण हो जाएगा।

प्रत्येक जीव के पास अपार शक्ति होती है। लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि उस शक्ति का उपयोग कैसे करना है, इसलिए वह सीमित शक्ति का ही अनुभव कर रहा है। जब वह अपनी शक्ति का उपयोग उन्नत कार्यों और लोककल्याण के लिए करता है, तब शक्ति उसे उसके अनुकूल ज्ञान और बल प्रदान करती है।

शरीर के लिए व्यायाम, बुद्धि के लिए विचार, हृदय के लिए अच्छी अनुभूति, और जीवन के लिए एक उत्तम लक्ष्य होना आवश्यक है। व्यायाम से शरीर बलवान बनता है। विचार से बुद्धिबल बढ़ता है। उत्तम अनुभूतियों से हृदय मानवता और दैवत्व से भर उठता है। श्रेष्ठ लक्ष्य होने से शक्ति उसी दिशा में जीव को प्रेरित करती है।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्य और पेशे के प्रति दृष्टिकोण बदलना चाहिए। व्यवसाय के दृष्टिकोण से या किसी कार्य को संकल्पित करने पर उसे कठिन मानकर नहीं देखना चाहिए, बल्कि अपना कार्य करते रहने से व्यक्ति पहाड़ को भी खोद सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवसाय में उस के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना चाहिए।

वर्तमान समय में सुख, दुख, शांति, आनंद आदि जो कुछ भी अनुभव हो रहा है, वह सब भूतकाल के कार्यों का फलस्वरूप प्राप्त हुआ है। भविष्य अपने हाथों में है। उसके अनुरूप वर्तमान में योजनाएँ बनाकर उसी तरह के प्रयास करने चाहिए। तभी एक अच्छा भविष्य होगा।

29. साधना से शरीर के अंगों में गुणात्मक परिवर्तन:

हे श्रीराम! जब कोई व्यक्ति जल के भीतर वायुनिरोध या प्राणायाम करता है, तो प्रारंभ में उसे सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई होती है। लेकिन जब वह बार-बार उस प्रयास को करता है, तो उसकी मानसिक भ्रांति दूर होती है, और वह ‘मैं अधिक समय तक रह सकता हूँ,’ यह विश्वास प्राप्त करता है। इस निरंतर साधना के परिणामस्वरूप उसके फेफड़ों की बनावट में परिवर्तन होता है, और वह लंबे समय तक सांस रोक सकने की शक्ति अर्जित करता है। — चेतावनी: यदि करनी हो, तो किसी अनुभवी की देखरेख में ही करनी चाहिए। इस साधना को स्वतंत्र रूप से नहीं करना चाहिए।

जब जीव अधिक समय तक जल में रहने का प्रयास करता है, तब पंचमहाभूत उसके संकल्प के अनुरूप उसके शारीरिक ढांचे को ढालते हैं। मछली के पूर्व संकल्प के अनुरूप वर्तमान में लंबे समय तक पानी में रहने के लिए उसका शरीर परिवर्तित हुआ है। जीव अपनी गतिविधियों के आधार पर अपने शरीर में विभिन्न परिवर्तन प्राप्त करते हैं।

जो मछली जल में रहकर बाहर के वातावरण से परिचित हो जाती है, वह प्रारंभ में जब बाहर आती है, तो उसे मानसिक बेचैनी और वातावरण की पीड़ा होती है। लेकिन जब वह बाहर बार-बार आने का प्रयास करती है, तो उसका शरीर इस वातावरण के अनुसार ढल जाता है, और वह उभयचर जीव (जल और थल दोनों में रहने वाला) बन जाती है।

मछली बाहर निकलकर अपनी जान गँवाने के बावजूद, बाहर घूमकर प्राप्त किया हुआ मानसिक निश्चय का ज्ञान उसमें पूर्व संस्कार के रूप में बना रहता है। जब वह फिर से जन्म लेती है, तो उसमें मौजूद पूर्व ज्ञान उसे फिर से बाहर जाने के लिए प्रभावित करता है। इस तरह प्रभावित होने वाली मछली अधिक समय तक बाहर घूमने की शक्ति प्राप्त करती है। इस तरह वह मछली पूरी तरह से बाहर घूमते हुए मानसिक संकल्प के कारण पैर भी प्राप्त कर लेती है। वह जीव समय के साथ कुछ करोड़ों वर्षों में बाहर घूमने वाले प्राणी के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार जीव अपने पूर्व कर्मों के फलस्वरूप वर्तमान शारीरिक ज्ञान को धारण करता है।

मानसिक स्थितियों को प्राप्त होना मात्र एक भ्रांति है। जब यह भ्रांति दूर होती है और मानसिक निश्चय दृढ़ होता है, तभी वस्तु संबंधी यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है।

जो जीव जल से बाहर आकर बाहर अधिक समय तक विचरण करता है, वह जल में रहने वाले अंगों के गुणों को धीरे-धीरे खो देता है और बाहर रहने के लिए आवश्यक गुणों को विकसित करता है।

30. प्रकृति जीव को स्वयं की रक्षा प्रदान करती है।

जीवों की आत्मरक्षा के लिए सींगों को हथियारों के रूप में, चलने और रक्षा के लिए खुरों को, और उनकी आवश्यकता के अनुसार सभी प्रकार की रक्षात्मक संरचनाओं को शक्ति प्रदान करती है।

जीव द्वारा भोजन के लिए शिकार करने की प्रक्रिया में हथियारों का उद्भव हुआ। साँप के विषैले दाँत और गिरगिट की जीभ इसी तरह विकसित हुए हैं।

भले ही सांप के काटने से कई जीव मर जाते हैं, परंतु समय के साथ वे जीव विष को सहने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं और अंततः सांप का ही शिकार करने योग्य शक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

भोजन को ग्रहण करने की आवश्यकता से ही दांतों की रचना हुई है। जो जीव दांतों का जितना अधिक प्रयोग करता है, उसके दांत उतने ही मज़बूत होते हैं और जबड़े की शक्ति भी उतनी ही प्रबल होती है।

जब जीव शिकार करते समय अपने पैरों का अधिक उपयोग करता है, तो उसके शरीर की संलग्न संरचनाएँ भी मज़बूत हो जाती हैं।

31. जीव अमर है। वह शरीर में दिव्य तत्त्व के रूप में विद्यमान रहता है।

जीव अपनी दैवीय शक्ति के साथ दैवीय पदार्थ (गॉड पार्टिकल) के रूप में विद्यमान रहता है। जीव में पूर्व ज्ञान, पूर्व संकल्प, और पूर्व मानसिक इच्छाएँ स्मृतियों के रूप में होती हैं। उसी तरह, भौतिक शरीर में माता और पिता का शारीरिक ज्ञान समाहित होता है। उनके पूर्व जन्मों की इच्छाएँ और गुण जीव के प्रत्येक कार्य में प्रतिफलित होते हैं। इसलिए विवेक के साथ व्यवहार करके और धर्म का पालन करके नकारात्मक गुणों को अस्वीकार कर, श्रेष्ठ गुणों को विकसित करना चाहिए।

जीव का वर्तमान शरीर के साथ अमर रहने की इच्छा करना अज्ञानता है। यह उस मेंढक की तरह है जो कुएँ में रहकर यही संसार समझता है। यह सीमित वाहन में यात्रा करते हुए उसे ही श्रेष्ठ समझने की भ्रांति जैसा है। दैवीय शरीर और दैवीय लोक, साथ ही अनेक श्रेष्ठ लोक असंख्य हैं। वर्तमान शरीर को साधना का माध्यम बनाकर श्रेष्ठ लोकों की ओर अग्रसर होना चाहिए।

एक मेधावी अपनी शक्ति से एक मजबूत घर बनाता है। यदि अपरिहार्य कारणों या प्राकृतिक आपदाओं के कारण वह घर नष्ट हो जाता है, तो वह अपनी बुद्धि शक्ति से फिर से निर्माण कर सकता है। उसी तरह, पंचभूतों से निर्मित जीव का भौतिक शरीर अपरिहार्य रूप से या प्रकृति में परिवर्तनों के कारण नष्ट हो जाता है, लेकिन जीव की चित् शक्ति माता के गर्भ में पुनः उचित शरीर का निर्माण कर लेती है। जीव अपने संकल्पों के अनुरूप विभिन्न लोकों में जन्म लेता रहता है।

जीव चैतन्य रूप में प्रकाशमान है। जो जीव इसे समझ नहीं पाता, वह शरीर को ही स्वयं मानता है। जैसे टोकरी में रखा मणि अपनी चमक से पूरी टोकरी को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा का चैतन्य शरीर और संपूर्ण विश्व में व्याप्त है।

शरीर आत्मा के चैतन्य से महान दिखाई देता है। वह महानता आत्मा के चैतन्य की है। जीव आत्म स्वरूप है।

जो श्रेष्ठ है, जिसमें थकान नहीं, जो शरीर आदि उपाधियों से परे है, जो भ्रम को दूर करता है, और जिसमें दुख नहीं, वही आत्मा है।

आत्मा के लिए शरीर एक विश्रांति स्थान है।

सत्य को थामना चाहिए। जो असत्य है, जो अनित्य है, और जो आनंद स्वरूप है, उसे जानना चाहिए। सत्य, ज्ञान, आनंद और अनंत ही आत्मा है।

मन केवल शरीर की सीमाओं में ही देखता है, परंतु अखंड सत्ता ही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है। यदि तुम अपनी प्रज्ञा को उसमें स्थापित करते हो, तो वह अखंड शांति प्रदान करता है। तुम सर्वत्र उसी का दर्शन करते हो।

श्रेष्ठ ज्ञान से युक्त, सत्कर्मों के साथ, धर्म मार्ग पर चलने वाला जीव दिव्य शरीर और दिव्य लोक प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।

जीव के लिए उच्च स्थिति में पहुँचने के लिए ज्ञान, सत्कर्म और धर्म प्रमुख साधन बनते हैं।

32. जीव की मनोवृत्ति के अनुसार कार्य करने वाली शक्ति

यदि जीव को यह स्पष्ट हो कि उसे कहाँ जाना है, तो शक्ति उसी मार्ग की ओर उसे प्रेरित करती है।

शक्ति को थकान नहीं होती। मन थकता है । जब मन थकान अनुभव करता है, तब शक्ति उसी अनुरूप ज्ञान को भ्रमित कर देती है। इसलिए जीव को चाहिए कि वह सही लक्ष्य को ज्ञानपूर्वक चुनकर कर्म करे।

जब जीव विषय-ज्ञान और विषय-इच्छा के साथ विषय रूपी बीज बोता है, तो ‘शक्ति’ उस विषय की वृद्धि में सहयोग देती है।

यदि जीव में विश्वास होता है, तो शक्ति अतीन्द्रिय रूप में कार्य करती है; और यदि उसमें भ्रम या संदेह होता है, तो शक्ति उसी प्रकार कार्य करती है।

जीव विषयों की उत्पत्ति का ‘पिता’ है, जबकि चित्-शक्ति उन्हें उत्पन्न करने और बढ़ाने वाली ‘माता’ के समान है। इन दोनों से उत्पन्न भौतिक शक्ति ही विषय-ज्ञान के रूप में प्रकट होती है।

जीव अपने हृदय-क्षेत्र में जिस विषय का बीज बोता है, शक्ति उसी बीज को महावृक्ष रूप में विकसित करती है।

हे श्रीराम! जीव का विषय भावना करना अर्थात् शक्ति के साथ विषय के आविर्भाव में सहयोग करना है।

जीव का दूसरों पर क्रोध और शक्ति का क्रोध एक ही है; जीव की शीतल दृष्टि और शक्ति की शीतल दृष्टि एक ही है। जीव का किसी पर अनुग्रह और शक्ति का अनुग्रह भी एक ही है। ये अलग-अलग नहीं होते। इसलिए, सामने वाले से प्रेम करना, सम्मान देना, और उसे आनंदित करना शुभ परिणामों की ओर ले जाता है। सामने वाले से द्वेष करना और उसे कष्ट देना अशुभ परिणामों की ओर ले जाता है।

जीव को सदा शुभदायी, मंगलदायी मानकर उसी की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

जब जीव कोई संकल्प करता है, तब शक्ति उस कार्य के लिए उसे प्रेरित करती है। वह प्रेरणा, चाहे वह शुभ हो या अशुभ, बुद्धि के अनुरूप होती है। इसलिए जीव को उत्तम संकल्प और उत्तम गुणों से युक्त रहना चाहिए।

यदि जीव दिव्य भाव रखता है, तो उसकी शक्ति भी दिव्य शक्ति बन जाती है। यदि उसमें दूषित भाव होता है, तो उसकी शक्ति भी दुष्ट शक्ति बन जाती है।

जीव के विद्यमान मौजूद शक्ति सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनु और कल्पवृक्ष है। लेकिन उसे यह जानना चाहिए कि क्या माँगना है और कैसे माँगना है। अन्यथा, अच्छे के साथ-साथ बुरा भी ग्रहण करना पड़ सकता है।

शक्ति तत्त्व का प्रतिकूल पहलू यह है कि यह दुष्ट संकल्प करने वाले दुराचारियों को भी शक्ति प्रदान करता है और अच्छे संकल्प करने वाले महनीयों को भी शक्ति देता है। इसी कारण कभी-कभी दुराचारी भी शक्तिशाली हो जाता है।

हे श्रीराम! जीव जिसके लिए चिंतन करता है, अच्छे-बुरे का भेद किए बिना शक्ति उसी को बढ़ाती है। जीव के मन में कोई विचार एक चिंगारी की तरह जन्म लेता है, बार-बार मनन करने से उसमें विचारशक्ति बढ़ती है और वह ज्वाला का रूप धारण करता है। जीव विषय का मनन करते हुए शक्ति को भोजन के रूप में देता है और विषय-सृजन में सहयोग करता है।

हे राम! जब जीव मन में मधुर विचार करता है, तो वह मधुर फल का बीज बोने जैसा है। यदि वह विषैले विचार करता है, तो वह विषबीज बोने जैसा है। जीव जो बीज वह बोता है, शक्ति उसी को बढ़ाती है और उसी का फल देती है।

एक ही विषय पर पूर्ण एकाग्रता से चिंतन करने से वह विषय बीज रूप में पड़ता है।

हे राम! शांत चित्त से उत्पन्न आनंददायी विषय ही शांति, धैर्य, सहिष्णुता, साहस, आनंद, निर्मलता, विश्वास और धर्म होते हैं। दूषित मन से उत्पन्न बाधाकारक विषय ही क्रोध, भय, दुःख, भ्रम, अशांति, अज्ञान और अधर्म कहलाते हैं।

प्रकृति विष-स्वरूप में भी है और अमृत-स्वरूप में भी। क्या ग्रहण करना है, यह जीव के हाथ में है। यदि किसी के हृदय में द्वेष, स्वार्थ, ईर्ष्या जैसी अशुद्धता भरी हो, तो प्रकृति उसे विष देती है; और यदि हृदय प्रेम, करुणा, स्नेह से पवित्र हो, तो वही प्रकृति उसे अमृत देती है और उसे अमर बना देती है।

हर कर्म पहले मानसिक रूप में जन्म लेता है और फिर भौतिक रूप धारण करता है।

सृजित सभी वस्तुएँ और वाहन अपने-अपने मानसिक संकल्पों के अनुरूप ही सृजित किए गए हैं। सृजित वस्तुओं को और बेहतर बनाने की उत्सुकता ही उन वस्तुओं को उच्चतर रूप में ढालने का कारण बनती है। यदि किसी विषय पर विचार का बीज पड़ता है, तो शक्ति उस कार्य के लिए प्रेरित करती है। आने वाला प्रत्येक विचार वही होता है, जो उन्होंने पूर्व में संकल्पित किया था, जो उनके भीतर संस्कार के रूप में रहता है। शक्ति उस संस्कार ज्ञान को स्मरण कराती है और कार्य के लिए प्रेरित करती है।

जब शक्ति को ज्ञान से संयोजित किया जाता है, तो ज्ञान उत्पन्न होता है। जब उसे अज्ञान से जोड़ा जाता है, तो अज्ञान की उत्पत्ति होती है।

जीवों के पास मौजूद सभी शक्तियाँ सीमित हैं। वे अपनी यात्रा में अतिरिक्त ज्ञान प्राप्त करते हैं। सभी जीव प्रजातियों में से मनुष्य के पास अतिरिक्त बुद्धि बल है। मनुष्य के पास मौजूद शक्ति भी सीमित है। उसे अभी और बहुत कुछ प्राप्त करना है।

जीव द्वारा किए गए अनेक प्रयासों में अपनी भ्रांति को नष्ट करने से तत्त्व का बोध होता है।

धर्म के अनुसार चलने वाला जीव ही देवता है, और शक्ति देवता धर्म के रूप में विद्यमान रहती है।

जीव के मनोधर्म के विपरीत शक्ति धर्म को धारण नहीं करती।

जैसे नदी के जल को खेतों तक ले जाकर उपयोगी बनाया जाता है, वैसे ही शक्ति को सही दिशा में मोड़ने का मार्ग ही सत्कर्म, सन्मार्ग और स्वधर्म है।

मानव को चाहिए कि वह धर्म और प्रकृति के नियमों के अनुसार आचरण करे। यदि वह धर्म और प्रकृति के विरुद्ध जाता है, तो उसे अनपेक्षित परिणामों का सामना करना पड़ता है।

शक्ति की कोई सीमा नहीं होती। शक्ति प्रकाश से भी तेज गति से चल सकती है। मन का संकल्प, पंचभूतों तक प्रकाश से भी अधिक तीव्रता से पहुँचता है। मन का संदेश अतीत और भविष्य दोनों में यात्रा कर सकता है। पंचभूत, उस संदेश के अनुसार प्रतिक्रिया करते हैं।

काल-ज्ञानीजन अपनी मानसिक दृष्टि से भविष्य को जानने की इच्छा रखते हैं। — इस कारण पंचभूत भविष्य की झलक प्रकट करने लगते हैं। परंतु भविष्य को पूरी तरह जानना सृष्टि के नियमों के विरुद्ध है, इसलिए दैवी शक्ति केवल उतना ही भविष्य दिखाती है, जितना जानना उचित हो।

व्यास भगवान, ब्रह्मा , नॉस्ट्रेडेमस जी आदि ने अपने तपोबल से भविष्य के कुछ अंशों को जानने की क्षमता अर्जित की थी। लेकिन भविष्य को पूरी तरह जानने का प्रयास सृष्टि के नियमों के विरुद्ध होता है इसलिए उसमें शक्ति स्वयं बाधा डालती है। केवल अष्टवसु और धर्मदेवता ही ऐसे हैं जो संपूर्ण रूप से भविष्य को जानने की शक्ति रखते हैं और सृष्टि के कार्यों को संचालित करते हैं।

जीव अपनी भौतिक शक्ति के परिपक्व होने के कारण ही वायुगमन (हवा में उड़ना) और दूरश्रवण (दूर की आवाज सुनना) जैसी क्षमताएँ प्राप्त करता है।

पक्षी, अपनी भौतिक शक्ति को बढ़ाकर, पंखों की सहायता से वायु-गमन करता है।

हनुमान, विभीषण, वाली आदि ने शक्ति के रहस्य को समझकर भौतिक पंखों की आवश्यकता के बिना ही अतींद्रिय शक्ति के माध्यम से वायु-मार्ग से आकाश में विचरण किया।

33. जीव का ज्ञान संस्कार रूप में:

जिस तरह विद्यालय में पूर्व ज्ञान को प्राप्त किया जाता है, उसी तरह शरीर का ज्ञान माता के गर्भाशय में प्राप्त होता है। प्रकृति के गुण के रूप में मौजूद शरीर, देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप विभिन्न संस्कारों को स्मरण कराता है। बाल्यावस्था, किशोरावस्था, यौवन, और वृद्धावस्था जैसे चरणों में पूर्व ज्ञान को स्मृति में लाता है। इसी तरह, जल के पास जल का ज्ञान और अग्नि के पास अग्नि का ज्ञान शक्ति स्मरण कराती है।

दिव्य देह में मन, बुद्धि और अहंकार एक समन्वित रूप में संस्कार रूप में विद्यमान रहते हैं। भौतिक शरीर में विषय ज्ञान को अनुभव के लिए प्रदान करने वाला प्रकृति गुण डीएनए और जीन के रूप में होता है। जीव का शारीरिक ज्ञान सूत्रमाला (डीएनए) के समान है, जिसे महाशक्ति योग्य व्यक्तियों को दान करती है। शारीरिक ज्ञान को विकसित करने वाला जीव ज्ञानदाता है, और उसे प्राप्त करने की योग्यता और अधिकार रखने वाला ज्ञान ग्रहीता है।

पंचभूतों से निर्मित यह स्थूल शरीर नष्ट हो सकता है, लेकिन दिव्य शरीर नष्ट नहीं होता। उसी को सूक्ष्म शरीर कहा जाता है। जब कोई शरीर अब कर्मों को पूरा करने योग्य नहीं रहता, तब जीव उस स्थूल शरीर को त्यागकर सूक्ष्म शरीर के साथ अपनी इच्छाओं और संकल्पों के अनुरूप किसी अन्य शरीर में प्रवेश करता है।

34. विकसित शरीर-ज्ञान को जीव प्राप्त कर रहा है

जीव द्वारा किसी अन्य जीव को अपने शारीरिक ज्ञान का दान करने के कारण, उस ज्ञान को प्राप्त करने वाले सभी जीव एक ही शारीरिक ज्ञान को धारण करते हैं। दस करोड़ वर्ष पहले की कछुए में विद्यमान जीव और वर्तमान में दिखने वाले कछुए में विद्यमान जीव एक नहीं हैं। पूर्वकाल में कछुए के शरीर को धारण करने वाला जीव अपनी कमजोरियों को दूर करके वर्तमान में अन्य जीव के रूप में विकसित हो चुका है। पूर्व में विकसित किए गए शरीर को ‘प्रकृति’ किसी अन्य जीव को दान करती है। यह उस जीव की इच्छाओं और आवश्यकताओं के अनुरूप शरीर को प्राप्त कराती है।

कुछ युग पहले बिल्ली का शरीर धारण किए जीव ने अपने भीतर की दुर्बलताओं को हराकर आज शेर या बाघ जैसा शक्तिशाली शरीर प्राप्त कर लिया है। उस पूर्व शरीर ज्ञान को अब कोई अन्य जीव धारण कर रहा है।

जैसे कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि से बनाए गए वाहन का दूसरे लोग भी उपयोग करते हैं, वैसे ही एक जीव द्वारा विकसित किया गया शरीर भी कोई अन्य जीव उपयोग कर सकता है। जिस तरह कार बनाने वाला अपनी बौद्धिक संपदा को बढ़ाकर और बेहतर वाहन प्राप्त करता है, उसी तरह जीव अपने प्राप्त शरीर को और उच्च स्तर पर ले जाता है। इसलिए, पूर्व में एक जीव के रूप में दिखने वाला जीव और अब उसी शरीर के साथ दिखने वाला जीव एक ही नहीं है, यह समझना चाहिए।

जीव द्वारा विकसित किया गया शारीरिक ज्ञान प्रकृति द्वारा संरक्षित किया जाता है और वह शारीरिक ज्ञान अनेक दैवीय शरीरों को प्रदान किया जाता है। इस कारण, पूर्व में किसी जीव का शारीरिक ज्ञान वर्तमान में किसी अन्य जीव द्वारा प्रारब्ध ज्ञान के रूप में प्राप्त किया जाता है और वह उसी शारीरिक ज्ञान के साथ दिखाई देता है। कई करोड़ वर्ष पहले देखे गए बंदर के शरीर में विद्यमान जीव ने अपनी शक्ति और सामर्थ्य को बढ़ाकर अपने शरीर को चिंपांजी के रूप में शक्तिशाली बनाया। चिंपांजी ने शिकार करते हुए बल प्राप्त किया और उसके मस्तिष्क में विचार करने की शक्ति बढ़ी। उन विचारों के कारण उसमें मानवता जागृत हुई और उसने अपने शरीर को वनमानुष के रूप में शक्तिशाली बनाया। वनमानुष ने अपनी रणनीतियों और बुद्धि को विकसित करके, विभिन्न कार्य करते हुए, दूसरों पर करुणा और दया दिखाकर, सहायता करने का गुण अपनाया, जिससे पूर्ण मानवता जागृत हुई और जीव ने मानव शरीर प्राप्त किया। जीव के प्रत्येक कार्य के पीछे शक्ति की प्रेरणा होती है। शक्ति जीव को उन कार्यों को करने के लिए प्रभावित करती है। जीव, शक्ति के सहयोग से ही पूर्ण मानव शरीर प्राप्त कर सका।

जीव चाहे जो भी भौतिक शरीर धारण करे, वह उस शरीर के लक्षणों से भिन्न व्यवहार नहीं करता। वह वही बन जाता है। जैसे घड़े में डाला गया पानी घड़े का आकार ले लेता है, वैसे ही भौतिक शरीर को धारण करने वाला जीव उस शरीर के अनुरूप भौतिक रूप, गुण और बल को धारण करता है।

35. दैवी शरीर तक का विकासक्रम

कुछ लोग मानते हैं कि विकासक्रम केवल मानव शरीर तक ही विकसित हुआ है। लेकिन जीव दिव्य शरीर तक विकसित हो चुका है। दिव्य शक्ति के स्वरूप महाविष्णु ने अनेक युगों पहले ही मानव शरीर को दिव्य शरीर में परिवर्तित कर दिया था।

दिव्य दृष्टि से युक्त महान तपस्वियों ने अनेक युगों पूर्व ही महा विष्णु द्वारा धारण किए गए विभिन्न अवतारों के माध्यम से इस विकास-क्रम को उजागर किया। ये अवतार हैं: मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वराहावतार, नरसिंहावतार, वामनावतार, परशुरामावतार, श्रीरामावतार, श्रीकृष्णावतार, बुद्धावतार और भविष्य में आने वाला कल्कि अवतार। इसी प्रकार, वानर रूप में हनुमान, हाथी का मस्तक धारण करने वाले गणेश, और अश्व मुखधारी हयग्रीव आदि अवतार भी विकास की शाखाओं का प्रतीक हैं।

महाविष्णु अपनी शक्ति को उन शरीरों में प्रवाहित करके उनके तत्व में परिवर्तन करते हैं। एक ही दिशा में यात्रा कर रहे जीवों को वे उस दिशा से मोड़कर उच्च दिशा की ओर ले जाते हैं। उसी दिशा-परिवर्तन के कारण ही उच्च मानव शरीर और दिव्य शरीर का प्रकट होना संभव हुआ।

कई युगों पहले, उन्होंने दिव्य शक्ति से प्राप्त अतींद्रिय ज्ञान, शारीरिक ज्ञान, और अपने गुणों के आधार पर उन्हें देवता, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, और किंपुरुष जैसे नामों से पुकारा जाता था। वे विलुप्त नहीं हुए। वे अपने संस्कार ज्ञान के अनुरूप विभिन्न लोकों में जीवित हैं। उनके वारिस के रूप में शारीरिक ज्ञान प्राप्त करने वाला जीव उस तत्त्व को अधिक समय तक बनाए रखने में असमर्थ होने के कारण दैवीयता खोकर मानव शरीर के साथ दिखाई देता है। जैसे उपयोग न की गई इंद्रिय कमजोर हो जाती है, वैसे ही दैवीय गुणों में न रहने वाले जीव के शारीरिक गुण भी कमजोर हो जाते हैं। पवित्र हृदय से उन्होंने दैवीयता प्राप्त की थी। पवित्रता के अभाव और मलिनताओं के लगने के कारण वे मानव शरीर के साथ दिखाई देते हैं। फिर भी, वे दैवीय गुण मानव शरीर में गुप्त रूप से विद्यमान रहते हैं। उनके हृदय की पवित्रता और संकल्पों के आधार पर ये गुण जागृत होते हैं। यदि जीव अपनी दिव्यता को समझ ले, तो प्रकृति उसकी दैवीय विशेषताओं को पुनः प्रदान करती है।

जीव को अपने पवित्र उद्देश्य की निरंतर परीक्षा करते रहना चाहिए। यदि यह न हो पाए तो उसे साधना द्वारा हृदय की पवित्रता बनाए रखनी चाहिए। जितने समय तक वह पवित्रता में स्थित रहता है, उतनी ही मात्रा में उसकी तपशक्ति उसके भीतर का दिव्यत्व जागृत रहता है। उसके कोशिकाएँ स्वयं को दैवी गुणों में परिवर्तित करती हैं।

हे श्री राम! इस भू-मंडल में दैवी आत्मा के मनोभाव और मनोसंकल्प के अनुरूप विकसित किया गया शरीर ही जीव द्वारा धारण किया गया मानव शरीर है। यह शक्तिशाली शरीर जीव के संकल्पों को पूरा करने की शक्ति और सामर्थ्य से युक्त है। इस शरीर को श्री महाविष्णु, महादेव, ब्रह्मा, श्री राम, श्री कृष्ण, जगन्नाथ, तिरुमला वेंकटेश्वर, महावीर, बुद्ध, जैसे दिव्यात्माओं ने अपने उत्तराधिकार रूप में धारण किया और संसार की सेवा की। उनके द्वारा धारण किए गए शरीर का रूप भले ही अलग हो, लेकिन लक्षण एक ही है। उनकी विरासत के रूप में, जीव के पूर्व कर्मों के आधार पर वर्तमान में अनेक लोगों ने इस शरीर को प्राप्त किया है। इस शक्तिशाली शरीर को प्राप्त करने वाले कुछ लोग इसे अच्छे कार्यों, सत्कर्मों और सन्मार्ग पर चलते हुए महान बनकर लोक का उद्धार कर रहे हैं।

योग, ध्यान और तपस्या के द्वारा शरीर को शक्तिशाली बनाना चाहिए। तभी महात्माओं के समान यह शरीर भी उतनी ही शक्ति के साथ यथोचित प्रतिसाद देगा। जैसे युद्ध करने वाले योद्धा के लिए उत्तम शस्त्र महत्वपूर्ण हैं, वैसे ही दिव्य कार्य के लिए अच्छा शरीर उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए, दैवीयता से युक्त शरीर को उपेक्षा से दुर्बल नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे और अधिक सशक्त बनाना चाहिए।

पंथ मनुष्य द्वारा बनाए गए हैं। इस लोक में धर्म देवता और धर्म राजा शासक के रूप में थे। वे ही सनातन धर्म के रक्षक हैं। अब वे धर्म रक्षक हिंदुओं और विभिन्न मतों के अनुयायियों के रूप में पुकारे जाते हैं। कालांतर में शासकों की उपेक्षा के कारण धर्म क्षीण होता गया और अधर्म का प्रभाव बढ़ता गया। धर्म लुप्तप्राय हो गया। किन्तु शीघ्र ही यह लोक पुनः धर्मराज्य द्वारा शासित होगा।

आज जो जातियाँ मानी जाती हैं, वे उनके पूर्वजों के पेशों के आधार पर बनी हैं। पूर्वकाल में पूर्वज जो कार्य व्यवसाय कोई करता था, वही कालांतर में उसकी जाति में बदल गई। कोई यदि कहे कि मेरी जाति महान है, तो यह उसका अज्ञान है। जैसे पंचभूतों में कोई एक तत्व सर्वश्रेष्ठ मान लेना अज्ञान है, वैसे ही अपनी जाति को सर्वोपरि मानना भी अज्ञान है। पूर्व काल में सभी जातियों के लोग मिलकर समाज को स्थिर और शक्तिशाली बनाए रखते थे।  

इस पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव और मनुष्य केवल इसी भू-मंडल में ही विकसित नहीं हुए हैं। अनेक भू-मंडल हैं। सभी मनुष्य केवल इसी भू-मंडल में विकसित नहीं हुए। अनेक लोकों में विभिन्न गुणों के साथ जीवित रहकर, अपनी प्राप्ति और धर्म का पालन करते हुए, वे यहाँ आकर सेवा कर रहे हैं। जीव विभिन्न लोकों में विकसित हो रहे हैं। जीवों के कर्म फलों के अनुरूप, अनुकूल वातावरण वाले स्थान पर वे आते और जाते हैं।

जीव जिस शरीर को दान के रूप में प्राप्त करता है, वह उसी शरीर के लक्षणों के साथ जीवित रहता है। भले ही पूर्व संस्कार ज्ञान स्फुरित हो, लेकिन वर्तमान में प्राप्त वंशानुक्रमिकवह उसी शरीर के लक्षणों के साथ जीवित रहता है। भले ही पूर्व संस्कार ज्ञान स्फुरित हो, लेकिन वर्तमान में प्राप्त वंशानुक्रमिक शारीरिक ज्ञान ही अधिकांश रूप से प्रभावित करता है। साथ ही, आसपास का वातावरण, सत्संग, पढ़ाई, संस्कृति, परंपराएँ, और संस्कार आदि भी उसे प्रभावित करते हैं। जीव अपने पूर्व और वर्तमान ज्ञान के साथ व्यवहार करता रहता है।

पूर्व में जीव को आनंद और संतोष देने वाली चीजें वासना बल के रूप में जन्म-जन्मांतर तक उसके साथ आती रहती हैं। वासनाएँ, जैसे कि जीव ने जो खाया, पिया, देखा, और अनुभव किया, यदि उन पर उसका गहरा लगाव और प्रबल इच्छा है, तो वह पुनर्जनम में उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए उपयुक्त शरीर प्राप्त करता है। जीव अपनी-अपनी रुचियों के अनुसार विद्वान, गायक, शासक, शिक्षित, या गुणवान के रूप में रहते हैं।

जीव के मानसिक नगर में जो इच्छाएँ अग्रगण्य स्थान रखती हैं, वह उन्हीं इच्छाओं के अनुरूप एक भौतिक शरीर धारण करता है।

दिव्य शरीर वाला जीव अपने मनोबल के अनुसार राग-द्वेष, क्रोध-विकार और इच्छाओं को नियंत्रित करता है। परंतु सीमित मनोबल वाला जीव इन इच्छाओं को नियंत्रित न कर पाने के कारण निष्क्रिय होकर व्यसनों के चंगुल में फंस जाता है। इसके कारण वह अत्यधिक मद्यपान, विभिन्न व्यसनों का आदी होना, आलस्य न छोड़ना, दूसरों के प्रति द्वेष रखना, और क्रोध को नियंत्रित न कर पाना जैसी समस्याओं में पड़ जाता है। लेकिन एक योग साधक केवल अपनी साधना के बल से इन सभी को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त कर सकता है।

जीव की नित्य अनुभूति विषयों तक सीमित होती है; पर आत्म-चैतन्य उसकी अनुभूति से परे रहता है। इस आत्म-चैतन्य को अनुभव के क्षेत्र में लाने के लिए प्रयास आवश्यक है। पदार्थ क्या है और परमार्थ क्या है, इसे विवेक के साथ अलग करके देखना चाहिए।

जिसे जीव शरीर और जगत मान रहा है, उसके वास्तविक स्वरूप की विवेचना करके उसे जानना चाहिए।

जीव यह मानने के कारण कि यह शरीर ही मैं हूँ, इस शरीर आदि की आयु को अपनी आयु मानने के कारण, और भ्रमवश दुख के कारण बनने वाले विषयों को पकड़ने के कारण दुखी होता है। जिस दिन वह यह जान लेता है कि वह आत्म चैतन्य है, उस दिन वह दुखों से मुक्ति प्राप्त करता है।

आत्मा को शस्त्रों से काटा नहीं जा सकता। यह अग्नि से जलती नहीं, जल से गीली नहीं होती, और वायु से उड़ाई या ढकी नहीं जा सकती। आत्मा किसी भी विषय से नष्ट नहीं होती। वही आत्मा तुममें विद्यमान है। तुम वही आत्मा हो।

दैवी सभा के सभाध्यक्ष: धर्माचार्य महाशक्ति श्रीराम ने जो कुछ बताया, उन्होंने जीव के इंद्रियों को प्राप्त करने, साधना और विश्वास की महानता, जीव द्वारा दैवीयता को प्राप्त करने और खोने जैसे विषयों को बहुत सुंदर ढंग से समझाया। मेरा एक संदेह है, जिसे मैं भी स्पष्ट करने का अनुरोध करता हूँ। वह यह है कि जीव अपने संकल्प के कारण पैर, शरीर, और इंद्रियाँ प्राप्त करता है। लेकिन चाहे जो भी संकल्प हो, हृदय, फेफड़े, और विभिन्न प्रकार के अंग और इंद्रियाँ शरीर में मौजूद हैं। ये किस प्रकार प्राप्त हुए हैं?

धर्माचार्य: इसी संदेह के साथ जब श्रीराम भीतर ही भीतर चिंतित हो उठे, तब महाशक्ति ने श्रीराम से इस प्रकार कहा।

36. भविष्य के अनुरूप शरीर की रचना और सृष्टि का निर्माण:

महाशक्ति: हे श्रीराम! जीव के पैरों की इच्छा करने से पैर प्रकट नहीं हुए। बल्कि, जीव के चलने के संकल्प के कारण, शक्ति ने पंचभूतों के माध्यम से चलने के लिए उपयुक्त साधन के रूप में पैरों का धर्म प्रदान किया। पक्षी ने यह नहीं संकल्प किया कि उसे पंख चाहिए; लेकिन उड़ने की आवश्यकता के लिए किए गए प्रयास और कार्य संकल्प के अनुरूप शक्ति ने पंख प्रदान किए। जीव ने इंद्रियों के लिए संकल्प न करने पर भी, उसके कार्य संकल्प के अनुरूप पैर, हाथ, नेत्र आदि इंद्रियाँ प्रकट हुईं। इसी तरह, अंगों के लिए संकल्प न करने पर भी, जीव के भविष्य के अनुरूप इंद्रियों के पोषण और रक्षा के लिए संबद्ध रूप में श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र, और प्रजनन तंत्र प्रकट हुए। इनके हिस्से के रूप में फेफड़े, हृदय, गुर्दे आदि अंगों का निर्माण हुआ। उसी तरह, अंगों के लिए संकल्प न करने पर भी, जीव के भविष्य के अनुरूप इंद्रियों के पोषण और रक्षा के लिए संबद्ध रूप में श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र, और प्रजनन तंत्र प्रकट हुए। इनके हिस्से के रूप में फेफड़े, हृदय, गुर्दे आदि अंगों का निर्माण हुआ।

हे राम! शक्ति ने अष्ट वसुओं को देश और काल के धर्म का निर्धारण सौंपा है। उनके द्वारा संकलित जानकारी के अनुसार, भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप शरीर की रचना और संपूर्ण सृष्टि का कार्य संपन्न होता रहता है।

शरीर के अंगों और इंद्रियों को निरंतर शक्तिशाली बनाए रखने के लिए, उनके पोषण और रक्षा के लिए जीव में भूख उत्पन्न की गई है। इसके अनुरूप, पंचभूत भूख को प्रेरित करने वाले गुण के साथ कर्मेंद्रिय के रूप में कार्य करते हैं। भूख के प्रभाव से जीव भोजन ग्रहण करता है।

37. सृष्टि के क्रम में और संतुलन में स्थापित किए गए धर्म

विश्व में क्रम और संतुलन बनाए रखने के लिए ईश्वर ने अपनी शक्ति से प्रकृति में कुछ नियम स्थापित किए हैं। इन्हीं नियमों के अंतर्गत भूतात्माएं पंचभूतों के धर्मों को धारण करती हैं, और परिपालक आत्माएँ स्त्री और पुरुष धर्म को धारण करती हैं। जिस तरह भूतात्माएँ आपसी सहयोग से पंचभूतों के रूप में उपाधि धर्म को धारण करती हैं, उसी तरह परिपालक जीवात्माएं भी परस्पर सहयोग के लिए स्त्री और पुरुष के रूप में शरीर-धर्म को धारण करती हैं।

जीव ने संकल्प न करने पर भी उसे स्त्री और पुरुष लिंग भेद प्राप्त हुए हैं। जीव की संरचना के अनुसार लिंग भेद होता है। दैवी शक्ति द्वारा लोक में स्थापित परिपालन धर्म के अनुसार, अष्ट वसु और धर्म देवता जीव को स्त्री और पुरुष योग प्रदान करते हैं। जीव के मनोभाव और मनोसंकल्पों के अनुरूप, एक-दूसरे का परस्पर सहयोग करते हुए सहजीवन के लिए दैवी शक्ति उन्हें उसी के अनुरूप धर्म प्रदान करती है।

शारीरिक रूप में, पुरुष स्त्री के लिए और स्त्री पुरुष के लिए परस्पर अनुबंध आत्मा के रूप में विद्यमान हैं। दोनों एक-दूसरे के साथ अनुबंध शारीरिक ज्ञान को धारण करते हैं।

अनेक जीवात्माओं, जो शरीर धारण किए हुए हैं, को परस्पर सहयोग और सहजीवन के लिए प्रकृति उनके शारीरिक तत्त्व को मोहित करने वाला धर्म प्रदान करती है। शृंगार (काम) सृष्टि कार्य को आगे बढ़ाने और शरीर की पुनर्जनन के लिए प्रदान की गई एक व्यवस्था है।

भले ही जीव स्वयं कोई भावना न रखे या किसी मोह में न पड़ा हो, लेकिन इच्छा-शक्ति उसमें भावना उत्पन्न करने के लिए मोह को उत्पन्न करती है। जिस प्रकार ठंड महसूस होते ही उसका असर शरीर पर पड़ता है या गर्मी लगते ही शरीर प्रभावित होता है, ठीक वैसे ही प्रकृति जीव के भीतर काम-इच्छा को उत्पन्न करती है। उसी के अनुसार स्त्री को आकर्षित करने हेतु पुरुष के भीतर काम-इच्छा और पुरुष को आकर्षित करने हेतु स्त्री के भीतर भी काम-इच्छा उत्पन्न की जाती है। प्रजनन के लिए स्त्री-पुरुष का संयोग सृष्टि-क्रम के अनुरूप निर्धारित धर्मों के अंतर्गत होता है।

जीव द्वारा अर्जित पूर्वज्ञान और तेजस्विता को पुनः सृजित करने हेतु स्थापित व्यवस्था ही स्त्री का गर्भ है। शक्ति स्त्री के गर्भ में जीव के शारीरिक ज्ञान का पुनर्जनन करती है।

गर्भालय वह मंदिर है जो भौतिक शरीर का सृजन करता है।

जीव की मृत्यु नहीं होती, केवल उपाधि (शरीर) को धारण करना या उपाधि को छोड़ना ही होता है।

38. जगत-शरीर (ब्रह्मांड) की रचना

जीव के भविष्य के अनुरूप जैसे भौतिक शरीर के अंग और इंद्रियाँ रची जाती हैं, उसी प्रकार जगत् शरीर में सूर्य, चंद्रमा, ग्रह और नक्षत्र भी भविष्य के अनुरूप रचे गए हैं।

जीव तीन प्रकार के शरीरों का धारक है: दिव्य शरीर, भौतिक शरीर, और जगत शरीर। दिव्य शरीर अहंभाव प्रदान करता है। इंद्रियाँ भौतिक शरीर का हिस्सा होते हुए शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध का अनुभव कराती हैं। सूर्य, चंद्रमा और अन्य ग्रह-नक्षत्र जगत-शरीर में स्थित होते हुए प्रकाश, गुरुत्वाकर्षण आदि से संबंधित ज्ञान प्रदान करते हैं।

जीव के मनोबल के अनुसार, ब्रह्मांड प्रत्येक जीव को विशेष रूप से या सामान्य रूप से दिखाई देता है। मानव शरीर में रहने वाले सूक्ष्म जीव के लिए मानव शरीर के अंग और इंद्रियाँ ब्रह्मांड के समान प्रतीत होते हैं। सूक्ष्म जीव के लिए जो मानव शरीर ब्रह्मांड है, वह मनुष्य के लिए सामान्य दिखाई देता है। मनुष्य के लिए जो विश्व ब्रह्मांड के रूप में प्रतीत होता है, वह अत्यंत शक्तिशाली जीव के लिए सामान्य प्रतीत होता है। जिस जीव के लिए मनुष्य को ब्रह्मांड जैसा विश्व सामान्य प्रतीत होता है, ऐसे अत्यंत शक्ति, सामर्थ्य और अखंड तपोबल वाले जीव को ही दैव (ईश्वर) कहा जाता

सूक्ष्म जीव को विश्व के समान प्रतीत होने वाला मानव का भौतिक शरीर, मानव (जीव) के मनो-संकल्प से उत्पन्न हुआ है; उसी प्रकार मानव को विश्व के समान प्रतीत होने वाला यह जगत्, दैव के मनो-संकल्प के अनुरूप सृष्ट किया गया है।

दैव ने अपनी मनोबल और तपोबल से सृजित जगत शरीर को उत्तराधिकार के रूप में मनुष्य और अन्य सभी जीव प्रजातियों ने प्राप्त किया है।

श्रीराम: हे महाशक्ति! देवता ने ब्रह्मांड जैसी विशाल सृष्टि रचने योग्य दिव्य-शक्ति किस प्रकार प्राप्त की?

39. जीव का अंतरिक्ष में दिव्य-शक्ति प्राप्त करना

महाशक्ति: हे श्रीराम! यदि एक छोटे बालक में भी संसार को शासित करने की शक्ति और सामर्थ्य निहित हैं, तो समझना चाहिए कि यह उसकी पूर्वजन्मों में अर्जित संस्कार-बल के कारण है। उसी प्रकार, ईश्वर ने विश्व में अपनी आँखें खोलने के बाद, बहुत समय तक अपनी दैवीय शक्ति को जानकर, पंचभूतों, अष्टवसुओं, अष्ट दिक्पालकों, और धर्म देवताओं को नियुक्त किया और सृष्टि को धर्म के मार्ग पर संचालित कर रहा है।

जैसे पृथ्वी पर मनुष्य समय के साथ अपनी भीतर की शक्ति को पहचानता है, वैसे ही देवता ने अंतरिक्ष में अपनी शक्ति को पहचाना।

महामाया: हे श्री राम! अंतरिक्ष में भूतात्माएँ अनंत रूप से बादलों की तरह रहती हैं और अपने संकल्प-विकल्पों के द्वारा मनोबल प्राप्त करके परिपालक आत्माओं के रूप में शक्ति अर्जित करती हैं। परिपालक आत्मा अपनी शक्ति से अन्य भूतात्माओं को प्रभावित करके उन्हें अपनी शक्ति बनाती है, यह बात तुम पहले ही समझ चुके हो। उसी क्रम में, आकाश में परिपालक आत्मा ने अपने संकल्प-विकल्पों के द्वारा कई करोड़ वर्षों में अत्यंत शक्ति प्राप्त की। समय बीतने के साथ उसका मनोबल और अधिक बढ़ता गया। अनेक करोड़ वर्षों बाद उसकी शक्ति अत्यंत बलवती होकर अखंड शक्ति के रूप में स्थापित हुई। अखंड शक्ति से युक्त महात्मा के मनोभाव और मनोबल के प्रभाव से भूतात्माएँ विश्व में अत्यधिक प्रभावित हो रही हैं। महात्मा के मनोदृष्टिकोण के अनुसार, जैसा वह चलता है, वैसा ही वे चलती हैं, और जैसी भावना वह करता है, उस भावना से भूतात्माएँ प्रभावित होकर रंग-बिरंगे प्रकाश और चमकदार किरणों के साथ दमकती हैं। परिपालक आत्मा को उनकी चमक दिखाई देने के कारण, प्रकाश देखने के संकल्प के अनुरूप महाशक्ति ने आकाश में अतींद्रिय नेत्र धर्म को प्रदान किया। समय के साथ, अनंत शक्ति और अखंड मनोबल से युक्त महात्मा के मनोउद्देश्य के कारण विश्व में भयंकर ध्वनियाँ गूँजने लगीं। यदि वह शांत स्वभाव में रहता, तो पूरा विश्व शांत रहता, और यदि वह उग्र भावना में रहता, तो विश्व उग्र रूप में ब्रह्मांड में नृत्य करता। जैसे वायु तूफान आने पर समुद्र उमड़ता है, वैसे ही ब्रह्मांड उमड़ता था। कुछ समय बाद, उसकी महाशक्ति ने उसे बताया कि उसके कारण ही विश्व में परिवर्तन हो रहा है, और उसे शांत करके उस महापुरुष को शांत किया। उस शक्ति से संदेश प्राप्त करके, उसने अनेक विषयों पर चर्चा की, अपने संदेहों का समाधान किया, और अपनी शक्ति को अत्यंत बलशाली बनाकर दैवी शक्ति में परिवर्तित किया। दैवी शक्ति के साथ लोक कल्याण पर विचार-विमर्श करते हुए, उसने अस्थिर ब्रह्मांड को स्थिर, निवास योग्य, और अद्भुत लोक के रूप में सृजित करने का मनोसंकल्प व्यक्त किया। इसके अनुरूप, उसने मनोदर्शन के द्वारा लोक को कैसा होना चाहिए, यह देखा। उसके मनोदर्शन के अनुसार, दैवी शक्ति ने अव्यवस्थित और अस्थिर भूतात्माओं को अखंड पंचभूतों, अष्टवसुओं, अष्ट दिक्पालकों, और धर्म देवताओं के रूप में उनकी भूमिका के लिए उपयुक्त पदार्थ और धर्म प्रदान किए, और भविष्य के लिए अनुकूल उत्कृष्ट लोक की सृष्टि की। सृजित ज्ञान को संरक्षित और प्रचारित करना प्रकृति का नियम है। उसी क्रम में, यह ब्रह्मांड फैल रहा है। इस तरह फैलते हुए, इसकी विरासत के रूप में प्राप्त हुआ यह जगत शरीर है। इस ब्रह्मांड को सृजित करने वाले को ‘देव’ कहा जाता है। उसकी सहायता करने वाली और भविष्य के लिए अनुकूल सृष्टि करने वाली शक्ति दैवी शक्ति है। दैवी शक्ति के सहयोग से विभिन्न कार्यों को संपन्न करने वाले पंचभूत, अष्टवसु, अष्ट दिक्पालक, और धर्म देवता हैं।

जिस प्रकार एक शक्तिशाली जीव के अधीन कण और पंचमहाभूत विभिन्न धर्मों को धारण करते हैं, उसी प्रकार एक अपरिमित दिव्य शक्ति के अधीन सूर्य, चंद्रमा, ग्रह और नक्षत्र भी अपने-अपने धर्मों से युक्त हैं।

अपने मनोसंकल्प के अनुरूप, दैवी शक्ति अन्य परिपालक आत्माओं को अखंड शक्ति प्रदान करके सूर्य, चंद्र, ग्रह, और नक्षत्रों की उपाधि प्रदान करती है। इन धर्मों को धारण करने वाले अखंड पंचभूत उनके कार्यों को पूरा करने वाले धर्मों से युक्त हैं। अष्टवसु और धर्म देवता विश्व को व्यवस्थित रखने में सहयोग करते हुए जीवों के लिए अनुकूल संरक्षण प्रदान करते हैं।

जीव ज्ञान की भावना करता है। शक्ति, ज्ञानरूप में प्रकृति धर्म को धारण करती है। देवता प्रकृति पर शासन करता है, और प्रकृति पंचमहाभूतों पर शासन करती है।

अपनी दैवी शक्ति से ब्रह्मांड की सृष्टि करने वाले देव को विभिन्न लोग अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। हिरण्यगर्भ, विराट स्वरूप, महाविष्णु, महादेव, ब्रह्मा, श्री राम, श्री कृष्ण, पराशक्ति, चित् शक्ति जैसे विभिन्न नामों से देव को पुकारा जाता है। जैसे एक शासक को अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में राजा, प्रिंस, किंग, रूलर आदि नामों से पुकारा जाता है, वैसे ही देव को अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। कोई भी उसे जिस नाम से पुकारे, सभी के लिए देव एक ही है। सभी के लिए ईश्वर एक ही है।

अपने मन में गहराई से अंकित किसी एक नाम को ही भगवान मानकर दृढ़ हुआ मन, किसी दूसरे देवता के नाम को स्वीकार नहीं करता। इस दुर्बलता को समझकर, जो यह जान लेता है कि सभी नामों से पुकारा जाने वाला वही एक परम दैव है, वही महनीय होता है।

विश्व में मौजूद मानसिक, भौतिक, रासायनिक, भौगोलिक, खगोलीय, आर्थिक, सामाजिक आदि सभी नियमों का कारण मनोउद्देश्य और मनोसंकल्प है। जीव के मनोबल के अनुरूप शक्ति उन-उन नियमों को धारण करती है।

जिस प्रकार समुद्र की मछलियों को जल के अणु स्थिर रूप में बनाए रखते हैं, उसी प्रकार अदृश्य पंचमहाभूत ग्रहों और नक्षत्रों को स्थिरता प्रदान कर रहे हैं।

पृथ्वी में मिट्टी और कीचड़-जल के रूप में अव्यवस्थित रूप से स्थित पंचभूत, पौधे की जड़ों के छिद्रों के माध्यम से जाते हुए क्रमशः पत्तियों, फलों और वृक्ष की शाखाओं के रूप में एक व्यवस्थित पद्धति से अपने-अपने धर्मों में स्थित हो जाते हैं। इसी प्रकार, ब्रह्मांड में अव्यवस्थित रूप से स्थित ग्रह, शून्य मंडल (कृष्ण बिलम्) के माध्यम से प्रवाहित होकर एक क्रम में, निर्दिष्ट देश-काल में, अपने-अपने धर्मों को धारण करते हैं।

वस्तुओं और आहार को आकर्षित करने की विद्या जानने वाले योगी अपनी महिमा से वस्तुओं और आहार को आकर्षित करते हैं। कहीं दूर स्थित आहार और वस्तुएँ शून्य मंडल के माध्यम से यात्रा करके उनके पास आकर्षित हो जाती हैं।

महाशक्तिवंतों के संकल्प से पंचभूत आहार में परिवर्तित हो जाते हैं। अपने आश्रम में आए अतिथियों को भोजन कराने के वशिष्ठ महर्षि के संकल्प के अनुसार कामधेनु ने अपनी शक्ति से लाखों लोगों को आहार कराया। श्रीकृष्ण ने अपनी महिमा से एक ही अन्न के कण से अनेकों ऋषियों की भूख मिटाई।

मरणोपरांत जीव के कर्मफल के अनुरूप, ‘शक्ति’ उसे शून्य मंडल (ब्लैक होल) के माध्यम से विभिन्न स्थानों और विभिन्न लोकों में ले जाती है।

आत्मिक चेतना ब्रह्मांडों तक व्याप्त होती है। जो ब्रह्मांडों में व्याप्त होकर उन्हें अपनी इच्छा अनुसार संचालित कर सकता है, जो ब्रह्मांडों से परे है, वह तुम्हारे भीतर है। वही आत्मा हर किसी में मौजूद है।

समस्त सृष्टि को जिसने अपने अधीन कर लिया है, वह परमात्मा भी तुम्हारे भीतर ही स्थित है। तुम अमर हो, तुम्हें मृत्यु नहीं। तुम अजर हो, तुम्हें वृद्धावस्था नहीं। तुम अजेय हो, कोई तुम्हें हरा नहीं सकता। तुम अमेय हो, तुम्हारी शक्ति को कोई माप नहीं सकता। यह किसी के लिए भी संभव नहीं है।

इस शरीर और जगत का आधार आत्मचेतना है। वह चेतना अखंड है, नाम और रूप से परे है, वह ही सत्य है, वह चैतन्यस्वरूप है, वह आनंद है, वह अनंत है, असीम है। उसी को “सत्” कहा गया है। उसी को आधार बनाकर जगत प्रकाशित होता है। तुम इस प्रकाशित जगत को देख रहे हो, लेकिन जिसके कारण यह प्रकाशित हो रहा है, उस आधार को देखो। उस आधार को जानने के बाद यह सत्य समझ में आता है कि जगत जीव के मनोज्ञान का प्रतिबिंब मात्र है।

जैसे बिना किसी कार्य के इच्छानुसार भटकने वाले व्यक्ति को परिपालक अधिकारी किसी उपाधि में नियुक्त करता है, वैसे ही दैवी संकल्प के अनुरूप दैवी शक्ति अस्थिर भूतात्माओं और परिपालक आत्माओं को सृष्टि कार्य में सहयोग करने के लिए विभिन्न धर्म प्रदान करके स्थिर करती है। एक व्यवस्था में नियुक्त पंचभूत, अखंड पंचभूत, अष्टवसु, और अष्ट दिक्पालक विभिन्न धर्मों को धारण करके सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, समुद्र, महानदियाँ, मेघ, पर्वत शिखर, हिम पर्वत, ध्रुव, और वृक्षों के रूप में सृष्टि कार्य में सहयोग करते हैं।

अष्टवसु, पंचभूत, अष्ट दिक्पालक, और धर्म देवता जीव वैविध्य को भी नियंत्रित और संचालित करते हैं। वे इस भू-मंडल को जीवों से अधिक भरा हुआ न होने देकर, इस पृथ्वी पर कितने जीव होने चाहिए, उतना ही बनाए रखते हुए नियंत्रण करते हैं। वे जीवों को विभिन्न गुण प्रदान करके यह निर्धारित करते हैं कि कौन सा जीव किसके लिए मित्र या शत्रु होगा और कौन सा जीव किसके लिए आहार होगा, और इस तरह सृष्टि का संचालन करते हैं।

पृथ्वी पर जीव जातियों को नियंत्रित रखने के लिए प्रकृति मृगों (जानवरों) को शिकार करने का तत्त्व प्रदान करती है। प्रत्येक जीव को एक विशेष गुण भी प्रदान किया जाता है। यह उनका धर्म है, न कि हिंसा। लेकिन यदि मानव ऐसा करता है, तो वह हिंसा कहलाता है।

सभी जीवों में से केवल मानव को ही अपने गुणों को नियंत्रित करने की स्वतंत्रता और सामर्थ्य प्राप्त है। इसलिए मानव को चाहिए कि वह त्रिगुणों को संतुलन में रखे। देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार, मनुष्य को यह तय करना चाहिए कि कब और कैसे सत्व, रजो, या तमो गुण में रहना है और उसी के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए।

सत्व गुण में शांति, शुद्धता, और आनंद होता है। रजो गुण में कर्मठता, कार्य के प्रति रुचि, सकारात्मक विचार, ज्ञान के प्रति जिज्ञासा, और सफलता की लालसा होती है। तमो गुण में आलस्य, जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाही, नकारात्मक विचार, और कार्य टालने की प्रवृत्ति जैसे लक्षण होते हैं। हमेशा सत्व गुण में रहना चाहिए और कार्यों में रजो गुण के साथ व्यवहार करना चाहिए। तमो गुण को अनुकूल बनाने के लिए दुष्ट संकल्पों, नकारात्मक विचारों, और लापरवाही को त्यागना चाहिए। अशुभ कार्यों को टालना चाहिए। कुछ समय बाद ये स्वयं समाप्त हो जाते हैं। तब तमो गुण अनुकूल रूप में परिवर्तित हो जाता है।

श्रीराम! जीव अपने प्रयास के बल से क्रमशः विकसित हो रहा है। उसी प्रकार जीव विश्व के नियम के अनुरूप प्रदान किए गए प्रकृति गुणों के अधीन रहकर जीवन यापन करता है।

40. जीव का शरीर — योग और भोग शरीर के रूप में विविध धर्मों से युक्त

सृष्टि के प्रत्येक भूतात्मा और परिपालनात्मक भौतिक शक्ति को विषय ज्ञान को ग्रहण करने के लिए योग शरीर, तथा विषयों ज्ञान को प्रकट करने के लिए भोग शरीर, इन द्वैत प्रमाणों के अनुसार प्रदान किया गया है।

विषय के अनुभव को जानने वाला योग शरीर है। विषय के रूप में रहकर विभिन्न अनुभव प्रदान करने वाला भोग शरीर है।

पुरुष का योग शरीर उसे विषय योग प्रदान करता है और स्त्री को विषय भोग देता है। स्त्री का योग शरीर उसे विषय योग प्रदान करता है और पुरुष को विषय भोग देता है। एक ही शरीर स्वयं के लिए योग शरीर और दूसरों के लिए भोग शरीर के रूप में द्वंद्वात्मक आधारों पर प्रदान किया गया है। दोनों परस्पर विषय के अनुभव को प्राप्त करते हैं।

सुख, दुख, राग-द्वेष को जानने वाली जीवात्मा अनुभव को समझने वाला शरीर योग रखती है। सुख-दुख को प्रकट करने वाले पंचभूत विभिन्न शरीर योगों के माध्यम से विषय ज्ञान को अनुभव के लिए प्रदान करते हैं।

भूतात्माओं को पंचभूतों के रूप में विभिन्न योग प्रदान करने के कारण, वे राग-द्वेष, शीत-उष्ण आदि अवस्थाओं के विषय ज्ञान को देती हैं। जीवात्माओं को शरीर योग प्रदान करने के कारण, वे स्पर्श ज्ञान को समझती हैं।

प्रमाता (जीवात्मा) विषय भोग का अनुभव करता है, और प्रमाण (इंद्रिय ज्ञान) विषय योग को प्रकट करता है।

शरीर के प्रत्येक परमाणु को विषय ज्ञान प्रदान करने के लिए एक नियम (योग शरीर) प्रदान किया गया है। भूतात्मा के कार्य के लिए उनकी विभिन्न वृत्तियों में स्थान भ्रंश न हो, इसके लिए उन्हें स्थिति शक्ति के रूप में धर्म प्रदान किया जाता है।

शरीर में उपाधि योग से युक्त नेत्र वस्तु को दिखाने वाली योग इंद्रिय के रूप में कार्य करता है। जगत के शरीर योग के रूप में सूर्य वस्तु को प्रकाशित करने वाले अनुबंध योग धर्म को धारण करता है।

योग शरीर में स्पर्श इंद्रियों के साथ भोग शरीर में शीतलता और उष्णता के संयोग से शीत-उष्ण अवस्थाओं का अनुभव होता है। योग इंद्रिय के रूप में जीभ की सहायता से भोग पदार्थ के रूप में आम के फल का स्वाद अनुभव में आता है। इस प्रकार, अनेक भूतात्माओं की शक्ति के लिए उनकी स्थिति और गति के लिए कार्य योग प्रदान किया गया है। उन्हें प्रदान किया गया योग शरीर अन्य आत्माओं को विषय ज्ञान देने वाला भोग प्रदान कर रहा है।

देश और काल को दर्शाने वाला आकाश, वायु जो हवा देता है, अग्नि जो ऊष्मा देती है, जल जो प्यास बुझाता है, और पृथ्वी जो भोजन और आश्रय देती है, ये सभी जीव को भोग प्रदान करने वाली उपाधि योग से युक्त अनुबंध आत्माओं के रूप में हैं। जीव का शरीर दूसरों को भोग देने वाला योग शरीर है। अनेक सूक्ष्म जीवों के लिए यह शरीर भोग शरीर के रूप में है।

योग और भोग शरीर स्त्री और पुरुष के रूप में, सूर्य और चंद्र तथा ग्रहों के रूप में,शीत और उष्ण स्थितियों के रूप में, धन, धान्य और संगीत के रूप में,तथा अग्नि, वायु, आकाश, जल और पृथ्वी जैसे पंचभूत रूपों में विद्यमान हैं।

आत्मा में निहित भौतिक शक्ति, जो विविध योग धर्मों से युक्त है, वही प्रकृति का गुण स्वरूप है।

देवालयों में स्थापित शिवलिंग को ऋषियों ने आत्मिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।यदि लिंग को आत्मा का स्वरूप माना जाए, तो उसके चारों ओर विद्यमान शक्ति प्रकृति का स्वरूप होती है। सृष्टि के धर्म के अनुसार, शक्ति हर लिंग में उसके अनुरूप गुणों को धारण करती है: आकाश लिंग में आकाश गुण, वायु लिंग में वायु का गुण, अग्नि लिंग में अग्नि तत्व, जल लिंग में जल तत्व, पृथ्वी लिंग में घन पदार्थ का धर्म निहित रहता है। शिवलिंग के लिंग रूपी गुण का अधिकारी जीव है, और उसके चारों ओर विद्यमान शक्ति ही प्रकृति का गुण है। अर्थात, आत्मा ही देवता है और शक्ति ही देवी — इन दोनों के सहयोग से सृष्टि का संचालन होता है।

विश्व में, किसी भी क्षेत्र में यदि लिंग रूप के साथ प्रकृति रूप में कोई शिलारूप की आराधना कर रहा है, तो यह समझना चाहिए कि वह वहाँ आत्म-शक्ति का रूप मानकर स्थापित किया गया है।

विग्रह की आराधना करने से मानसिक शांति, यश और तेजस्विता प्राप्त होती है। हनुमान, महाविष्णु, श्रीराम, शिव, वेंकटेश्वर, बुद्ध आदि सभी तेजस्वी देवमूर्तियाँ हैं। इनका दर्शन करने से, ऐसी दिव्य शक्ति, यश और तेज उस भक्त के भीतर उत्पन्न होते हैं ।

जिस प्रकार शक्ति भूतात्माओं में पंचभूतों के धर्म के रूप में विद्यमान है, उसी प्रकार दैवी शक्ति ब्रह्मा, विष्णु, और महेश्वर जैसे दैव आत्माओं में ज्ञान, संपदा, और बल के रूप में समान समान रूप से उपस्थित रहती है। ब्रह्मा ज्ञान के अधिकार के साथ अपनी शक्ति सरस्वती के रूप में हैं। श्री महाविष्णु संपदा और धन के अधिकार के साथ अपनी शक्ति लक्ष्मी देवी के रूप में हैं। ईश्वर बल के अधिकार के साथ अपनी शक्ति पार्वती देवी के रूप में हैं। त्रिमूर्तियों के अनुग्रह से लोग सुख, शांति, आयु, स्वास्थ्य, धन, और धान्य के साथ सुख और आनंद में रहते हैं। ये त्रिमूर्तियाँ परस्पर सहयोग करके लोक को समृद्ध बनाए रखती हैं। इनकी शक्ति पूरे विश्व में व्याप्त है।

किसी देवता के नाम से एक मूर्ति बनाने के बाद, पंडित उस मूर्ति को महर्षियों द्वारा बताए गए मूल मंत्रों से प्रबोधित कर प्राणप्रतिष्ठा करते हैं। प्राणप्रतिष्ठा करने से वह मूर्ति शक्तिशाली हो जाती है। वह मूर्ति एक गुप्त फलप्रद होती है। उस मूर्ति के दर्शन करने वाले लोग शक्ति प्राप्त करते हैं। उनका मन प्रसन्न हो जाता है। मानव को आनंद की अनुभूति होती है। उस शक्ति में लोगों को अपने दर्शन रस से आकर्षित करने की सामर्थ्य होती है।

दूसरों द्वारा पूजे जाने वाले देवता से घृणा करना, अन्य धर्मों के अनुयायियों को तुच्छ समझना, भिन्न जाति के लोगों का अपमान करना, या भिन्न आचार-व्यवहारों को अस्वीकार करना—ये सब उस मन की कमजोरियाँ हैं जो भिन्नताओं को स्वीकार नहीं कर पाता और विभाजन की दृष्टि से देखता है। मनुष्य अपने ही बनाए एक छोटे से घेरे में जी रहा है। जब वह इस घेरे को तोड़कर जाति-धर्म से ऊपर उठकर विश्व-भावना से देखना प्रारंभ करता है, तभी वह इस अनंत ब्रह्मांड के ज्ञान को ग्रहण कर मानसिक और शारीरिक रूप से उच्च अवस्था को प्राप्त करता है।

मनुष्य यह सोचता है कि भू-लोक ही सबसे विकसित लोक है। परंतु विश्व में अनगिनत लोक हैं। अत्यंत विकसित लोक भी विद्यमान हैं। कुछ प्रारंभिक अवस्था में हैं, कुछ विकास की अवस्था में हैं, और कुछ प्रतिफल की अवस्था में

मनुष्य इस भू-मंडल का समय समाप्त होने की चिंता करके और किसी अन्य ग्रह पर जीवन की खोज करने या वहाँ बसने की कोशिश करना अज्ञानता है।

जिस प्रकार एक वृक्ष के किसी फल में रहने वाला एक जीवाणु उस फल को ही संपूर्ण विश्व मानता है, जो अज्ञानता है, वैसे ही इस भू-मंडल को एकमात्र लोक मानना उतनी ही अज्ञानता है।

मनुष्य यदि अच्छे भविष्य की कामना करता है, तो उसे वर्तमान में उपयुक्त योजनाओं, उत्तम अनुशासन, संस्कृति और परंपराओं के साथ अनुकूल वातावरण बनाकर अपने जीवन और अपने बच्चों के भविष्य को अद्भुत और आनंदमय बना सकता है।

प्रत्येक परमाणु से लेकर सूर्य तक, और समस्त जीव-जंतुओं तक, उनकी शक्ति के अनुसार एक ऐसा नियम निर्धारित किया गया है कि वे लोक-कल्याण के लिए आपस में सहयोग करें। यही नियम दैवी शक्ति, महाशक्ति और प्रकृति द्वारा अनुसरित होता है।

हे श्रीराम! तुमने जिस सजीव विग्रह सुगुण सुंदरी को देखा, वह अपने मनो-ज्ञान को प्रकट कर रही है। उसने अपने माता-पिता से कुछ ज्ञान उत्तराधिकार में प्राप्त किया है। साथ ही, अपने वातावरण के लोगों और सहचरों का ज्ञान भी उसने ग्रहण किया है। उसी प्रकार, लोक-कल्याण की भावना से सृष्टि को धर्ममार्ग पर संचालित करने के लिए दैवी शक्ति ने उसमें सृष्टि-धर्म से संबंधित स्त्री-तत्त्व प्रदान किया है।

दैवी शक्ति, देश-काल की परिस्थिति और पूर्व जन्मों के कर्मों को ध्यान में रखकर, उचित उपाधियाँ (शरीर) प्रदान करती है। जीव के पास उसे अस्वीकार करने का कोई विकल्प नहीं है। उसे उसका पालन करना ही पड़ता है। स्त्री, पुरुष, गंधर्व, मनुष्य, देव, देशाध्यक्ष, इंजीनियर, डॉक्टर, या श्रमिक जैसे भेद के बिना, लोक कल्याण के लिए जो उपाधि प्रदान की जाती है, उसके लिए तैयार रहना चाहिए। उसे अस्वीकार किए बिना, उस धर्म के साथ न्याय करने वाले ऊर्ध्व गति और उच्च स्थिति प्राप्त करते हैं।

यदि जीव सकारात्मक दृष्टिकोण और पवित्र हृदय के साथ जीवन यापन करे और मानसिक रूप से योग्य बन जाए, तो प्रकृति उसे एक दिव्य शरीर प्रदान करती है।

इस ब्रह्मांड में विकसित दिव्य शरीर भी अनंत रूप में विद्यमान हैं। वे मनुष्य जो मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, वे दिव्य शरीर को धारण करने के पात्र बनते हैं।

जीव के पास जो ज्ञान, संकल्प और इच्छाएँ होती हैं, उन्हें ध्यान में रखते हुए शक्ति उसे किसी उपयुक्त गर्भ या विभिन्न लोकों में ले जाती है।

जीव के पास मौजूद ज्ञान के अनुसार पंचभूत लोक, कीट लोक, मत्स्य लोक, पक्षी लोक, जंतु लोक, राक्षस लोक, मानव लोक, दिव्य लोक आदि अनेक लोक हैं। जीव अपने ज्ञानयोग के अनुरूप इन विभिन्न लोकों में संचरण करता रहता है।

वस्तुओं में स्थित परमाणुओं को जड़ता प्रदान करने के कारण ही मनुष्य चल-फिर सकते हैं और स्थिर रह सकते हैं। पंचभूत परमाणु अवस्था में ही जड़ता को धारण किए रहते हैं।

जीव मानव शरीर में, पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, आकाश, और प्रत्येक परमाणु में मौजूद है। शरीर में हड्डी की कोशिका जीव के चलने के लिए अनुकूल स्थिति शक्ति प्रदान करने के कारण वह गतिहीन होकर जड़ अवस्था में होती है। जगत के शरीर में, गृह या पृथ्वी पर स्थित अणुओं को भी स्थिति शक्ति में रहने का धर्म प्रदान किया गया है, जिसके कारण, गतिहीन होकर जड़ रूप में स्थित रहते हैं।

सभी जीवों की सूचना एक अतीत शक्ति के रूप में मस्तिष्क में संग्रहीत रहती है। परमाणुओं और अणुओं के पंचभूतों की सूचना संग्रह उनके पदार्थ धर्म में निहित है। परिपालक आत्मा से प्राप्त सूचना के अनुरूप ही पंचभूतों की स्थिति और गति बदलती है। सूचना के अनुरूप ही परमाणु अन्य परमाणुओं के साथ संयोग, वियोग, आकर्षण, और विकर्षण के द्वारा पदार्थ धर्म, अंग धर्म, इंद्रिय धर्म, शरीर धर्म, और सूर्य, चंद्र, ग्रह, तारों के धर्म को धारण करते हैं।

शिष्य: धर्माचार्य, अन्य ग्रहों पर जड़ रूप में विद्यमान जीव अपने संकल्प के अनुसार शरीर धर्म क्यों नहीं प्राप्त करता?

धर्माचार्य: सभी ग्रह जीवों के जीवन हेतु निर्मित नहीं हुए हैं। केवल पृथ्वी ही जीवों की निवास के लिए बनाई गई है। अन्य ग्रह भिन्न-भिन्न गुणधर्मों से युक्त हैं, इसलिए वे उन्हीं गुणधर्मों के अनुरूप कार्य करते हैं। यदि कभी जीव संकल्प-विकल्प के माध्यम से सूक्ष्म भौतिक शरीर प्राप्त भी कर लेता है, तब भी वह नियंत्रित ही रहता है। जैसे जीव नदियों के पास देशांतर कर जाते हैं, वैसे ही जीव पृथ्वी पर प्रवास कर आते हैं और यहाँ निवास करते हैं।

शिष्य: धर्माचार्य! क्या ग्रह मानव को प्रभावित करते हैं?

धर्माचार्य: ग्रह मानव के मन पर प्रभाव डालते हैं। वे जीव के पूर्व कर्मों के अनुरूप प्रभाव डालते हैं।

ज्योतिष शास्त्र में ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान जानकारी को संकलित किया है। ज्योतिष शास्त्र में वर्णित प्रतिकूलताओं से डरने की आवश्यकता नहीं है। ऋषियों द्वारा प्रतिपादित ज्योतिष को जनसामान्य आज तक केवल एक प्रतिशत ही समझ पाया है। जीव ने किसे आश्रय बनाया है, उसी के अनुसार ग्रहों का प्रभाव उस पर पड़ता है। जैसे, यदि यह ज्ञात हो कि किसी विशेष समय में वर्षा होगी, तो जो व्यक्ति किसी घर को आश्रय बनाता है, उसे वह वर्षा नहीं भिगो पाती। इसी प्रकार, किसी ने किसे आश्रय बनाया है और वह किसके संरक्षण में है, यह तय करता है कि उसकी स्थिति कैसी होगी। इसलिए, धर्म को धारण करना चाहिए, सत्कर्म करने चाहिए और ईश्वर को पूर्ण शरणागत भाव से अपनाना चाहिए। संस्थाओं और सरकारों को शक्तिशाली तथा सुचारु शासन व्यवस्था के साथ कार्य करना चाहिए। तब यदि कोई ग्रहदोष भी हो, तो वह ऐसे लोगों को अधिक कष्ट नहीं दे पाता।

धर्माचार्य: जब भी तुम्हें संदेह उत्पन्न हो, तो एक बात सदा याद रखना। बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता। यदि कारण दिखाई न दे, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अस्तित्व में नहीं है। इसका अर्थ केवल यह है कि इस क्षण तुम उसे ग्रहण नहीं कर पा रहे हो। इसी प्रकार अनेक कारण दिखाई न देने पर भी उनके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। कर्म के विषय में भी ऐसा ही होता है। मनुष्य अपने पिछले कर्मों को नहीं देख सकता, लेकिन उनके परिणाम वर्तमान में अवश्य अनुभव करता है। हमारे दैनिक जीवन में भी ऐसे ही लौकिक विषय इसी प्रकार घटित होते हैं। उन्हीं के बारे में दैवी शक्ति श्रीराम से जो बातें कह रही है, उन्हें मैं तुम्हें बताता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो।

41. लौकिक विषयों में कर्म का प्रभाव

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महाशक्ति: हे श्रीराम! जैसे जीव के कर्मों के अनुसार अतीत शक्ति पंचभूतों, सूर्य, चंद्र, ग्रहों और नक्षत्रों को संचालित करती है, वैसे ही लौकिक और पारमार्थिक विषयों में भी जीव को विभिन्न कर्मों के लिए प्रेरित कर चलाती है।

तीन प्रकार के कर्मों द्वारा शक्ति जीव को प्रभावित करती है और उसे तदनुसार कार्यों में नियुक्त करती है: 1. मन की भावना और मनो-संकल्प, 2. पूर्व संस्कारों द्वारा प्रेरित कर्म और 3. सृष्टि के नियमों के अनुरूप होने वाले कर्म।

किसी विषय पर विचार करना और उस पर कोई उद्देश्य रखना भी कर्म है। कर्म के प्रभाव से शक्ति जीव को विभिन्न कार्य करने के लिए प्रभावित करती है। जो कार्य किया जाता है, उसी के अनुसार फल अनुभव होता है। अच्छी सोच से अच्छा कार्य होता है, और उसके अनुसार अच्छा फल प्राप्त होता है। बुरी सोच से शक्ति बुरे कर्मों की ओर प्रभावित करती है, जिससे बुरे फल भुगतने पड़ते हैं।

विषय विचार के द्वारा संस्कार ज्ञान प्रारंभ होता है। विचारणा बल के आधार पर संस्कार ज्ञान जीव को विभिन्न कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, और कर्म की तीव्रता के अनुसार उसका फल प्राप्त होता है। अच्छे विचारणा बल से उत्पन्न सत्संस्कार सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो सत्फल प्रदान करते हैं। वहीं, बुरे विचारणा बल से उत्पन्न दुष्ट संस्कार दुष्कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं, जो दुष्फल देते हैं।

वर्तमान में जीव जो विषय पर विचार करता है या जिस विषय की इच्छा करता है, वही भविष्य में एक संस्कार ज्ञान के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यह संस्कार ज्ञान मन को उन कर्मों की ओर प्रेरित करता है।

दूध पीना चाहिए ऐसी सोच सत्कर्म है, जबकि धूम्रपान करने की सोच दुष्कर्म है। यदि मन में इस प्रकार की भावना या सोच लगातार बनी रहे, तो वह कर्म विचारबल को प्राप्त करती है। इस कर्मबल के आधार पर शक्ति, संस्कार ज्ञान के रूप में बल प्राप्त करती है । यह संस्कार ज्ञान क्रिया करने के लिए प्रेरित करता है। दूध पीने के विषय विचार कर्म के कारण कर्म बल प्राप्त होता है, जो संस्कार ज्ञान के रूप में बलवान बनता है। यह बलवान संस्कार ज्ञान दूध पीने के लिए प्रेरित करता है। यह सत्कर्म उसके स्वास्थ्य पर अच्छा फल देता है। धूम्रपान करने की दुष्ट कर्म की इच्छा दुष्कर्म को प्रेरित करके धूम्रपान करवाती है, जिसके कारण मनुष्य अपने स्वास्थ्य पर दुष्फल प्राप्त करता है। सत्कर्म से सत्फल प्राप्त होता है।

पौधा लगाने की सोच कर्म है। प्रारंभ में उत्पन्न यह विचार उस कार्य को करने के लिए सहायता करने में कमजोर होता है। लेकिन जैसे-जैसे यह विचार तीव्र होता जाता है, यह कर्म बल प्राप्त करता है। कर्म बल के आधार पर संस्कार ज्ञान उस कार्य को करने के लिए प्रेरित करता है। कार्य के होने की प्रक्रिया में, कार्य की तीव्रता के आधार पर उसका फल देश, काल, और परिस्थितियों के अनुरूप होता है। पौधा बड़ा होने पर फल, छाया, और ऑक्सीजन प्रदान करता है।

वर्तमान में अनुभव की जा रही हर चीज पूर्व कर्मों के प्रभाव के कारण ही हो रही है।

महाशक्ति: श्रीराम धर्मज! लौकिक विषयों में कर्म के प्रभाव के बारे में वशिष्ठ महर्षि ने श्रीरामचंद्र को कुछ बातें बताई थीं, मैं तुम्हें वे बातें बता रही हूँ, ध्यान से सुनो।

किए गए कर्म संस्कारों (वासनाओं) के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। संस्कार यह हैं कि भले ही तुम वर्तमान में कोई कार्य करने की न सोचो, पूर्व कर्मों के कारण वे स्मृति में आकर उन कार्यों को करने के लिए प्रेरित करते हैं। जो व्यक्ति जिस प्रकार के कर्मों का प्रयास करता है, वह उसी प्रकार के कर्म फल को प्राप्त करता है।

अंतःकरण में प्रवृत्ति ही सभी बाह्य व्यवहारों का मूल कारण है। यह प्रवृत्ति श्रद्धा और शक्ति के आधार पर विभिन्न प्रयोजनों की सिद्धि का कारण बनती है।

जिस प्रकार एक छोटे जामुन के बीज में विशाल जामुन के वृक्ष की योजना और उसके फल छिपे रहते हैं, उसी प्रकार कर्म बीज में भी कार्य की पूरी रूपरेखा और उसके फल अंतर्निहित रहते हैं।

जीव का पूर्व कर्म बल और वर्तमान प्रयासों का कर्म बल निरंतर एक-दूसरे से संघर्ष करते रहते हैं। इनमें जो अधिक बलशाली होता है, वही विजयी होता है। पूर्व और वर्तमान कर्मों में जो अधिक शक्तिशाली होता है, वही प्रबल होता है। पूर्व कर्म दोषों को वर्तमान के उत्तम कर्मों द्वारा निश्चित रूप से शुभप्रद बनाया जा सकता है। यदि कभी वर्तमान प्रयास विफल हो रहे हों, तो समझना चाहिए कि पूर्व के प्रतिकूल प्रयास प्रबल हैं। बार-बार प्रयासशील होना चाहिए। इस जगत में वर्तमान में प्राप्त और अनुभव की जा रही प्रत्येक वस्तु के पीछे पूर्व कर्म की प्रयासशीलता अतींद्रिय रूप में विद्यमान है, यह समझना चाहिए।

इसलिए मनुष्य को शास्त्र के नियमों का पालन करते हुए सत्कर्मों से संबंधित प्रयासों को निरंतर बढ़ाना चाहिए। धीरे-धीरे ये सत्कर्म प्रबल होकर उत्कृष्ट संस्कारों के रूप में आकार लेते हैं। ऐसे सुसंस्कार विवेक को जागृत करते हैं और शुद्ध सत्त्व रूपी आत्म वस्तु की निकटता प्रदान करते हैं। यदि शुभ कर्म करने के प्रयासों के दौरान कोई बाधाएँ आती हैं, तो यह समझना चाहिए कि ‘ये सभी मेरे पूर्व दुष्कर्मों का प्रभाव हैं।’ ऐसे समय में स्वयं के प्रयासों को छोड़ना नहीं चाहिए। दृढ़ संकल्प के साथ, निरंतर प्रयास करते हुए शुभ कर्मों का ही आश्रय लेना चाहिए। पूर्व के अशुभ कर्मों के प्रभाव, दुष्ट संस्कारों, और वासनाओं को हटाना चाहिए। इसके लिए धैर्य, दृढ़ता, दृढ़ संकल्प, और निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।

हे राम! पूर्व में अर्जित मन के दोषों को नष्ट करने तक शास्त्रानुसार सत्कर्मों का शरण लेना आवश्यक है। पूर्व के अशुभ कर्म वर्तमान के प्रयासों से पराजित किए जा सकते हैं। शुभ कर्मों से शुभ फल प्राप्त होता है, और अशुभ कर्मों से अशुभ फल मिलता है।

श्रीराम! इस जगत में यदि किसी को कोई वस्तु प्राप्त करनी है तो ‘प्रयत्न ही’ उपाय है। प्रयास के बिना कुछ भी नहीं मिलता। कोई भी परिणाम केवल प्रयास करने से ही प्राप्त होता है। जो मनुष्य प्रयास करना नहीं छोड़ता और निरंतर परिश्रम करता है, वह अवश्य सफलता प्राप्त करता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन के श्रेष्ठ लक्ष्य को पहले दृढ़ करे और फिर श्रद्धा एवं सम्यता के साथ मार्ग में आगे बढ़े।

श्री राम! इस विश्व में अज्ञान और गरीबी का तांडव होने का कारण केवल यह है कि लोग प्रयासशील नहीं हैं। एक समर्थ और प्रयासशील व्यक्ति अपने आसपास को भी समृद्धि से भर सकता है। उसके लिए यह धरती तल कोई बड़ी बात नहीं है। प्रयासशील व्यक्ति को उसके लक्ष्य से दूर करने में केवल ‘प्रयासहीनता’ ही सक्षम हो सकती है, और कुछ नहीं।

बचपन से ही सत्संग (ज्ञानियों और बड़ों का साथ), शास्त्र चर्चा, और अच्छे अभ्यास मनुष्य के लक्ष्य को दृढ़ करते हैं। उत्तम ज्ञान के लिए अनुकूल प्रयास करने का संकल्प रूप लेता है। जिस प्रयास का वह आश्रय लेता है, वही मनुष्य को अमोघ फल प्रदान करता है।

जो लोग आलस्य का त्याग करते हैं, केवल उन्हीं को श्रेष्ठ वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

प्रयासशील व्यक्ति बड़े सहज रूप से भाग्य को भी अपने अधीन कर सकता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य में समर्थ होता है, तो इसके पीछे उसका प्रयास छिपा होता है। लेकिन मंदबुद्धि व्यक्ति उस समर्थता के पीछे निहित प्रयासशीलता को समझ नहीं पाता। वह अंत में यह मानकर संतुष्ट हो जाता है कि भाग्य ने उसका साथ दिया। यह समझना चाहिए कि ‘समर्थता’ भाग्य के अनुसार नहीं, बल्कि बल्कि यह स्वयं के निरंतर प्रयासों की मात्रा और गुणवत्ता पर निर्भर होती है, यह बात समझनी चाहिए।

वर्तमान में किए जा रहे सत्प्रयासों को, पूर्व के अशुभ प्रयासों के आकर्षण से पराजित न होने देना चाहिए। जो व्यक्ति अपने श्रेष्ठ लक्ष्य से पीछे नहीं हटता, वही सच्चे अर्थों में विजयी होता है।

वर्तमान में किए जा रहे सत्कर्म पूर्व जन्मों के प्रारब्ध (पूर्वकर्म) को भी शुभ में परिवर्तित कर देते हैं और ऐसे समर्थ व्यक्ति के भविष्य को उज्ज्वल बना देते हैं। इसलिए, जीव को सदैव कर्मशील बनना चाहिए, आलस्य और लापरवाही को त्याग देना चाहिए। वह अपने स्वप्रयत्न (सत्कर्म) के माध्यम से ही इच्छित फल प्राप्त कर सकता है।

मन में जो विषय स्फुरित होता है, चित्त भी उसी आकार को धारण करता है। उस चित्त से इंद्रियों के प्रयास बाह्य रूप में प्रकट होते हैं। व्यक्ति बचपन से जिन-जिन विषयों के लिए जिन-जिन प्रयासों को करता है, उसके फल भी उसी प्रकार प्राप्त होते हैं। इसलिए कर्म ही सर्वस्व का मूल कारण है। कर्म के प्रभाव से प्राप्त फल को न केवल वह स्वयं अनुभव करता है, बल्कि उसके आसपास के लोग भी उस प्रभाव को अनुभव करते हैं।

यदि परिवार का मुखिया सत्कर्म और शुभ विचारों से युक्त हो, तो उसके प्रभाव से परिवार के सभी सदस्य भी आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। किसी संस्था का प्रमुख यदि सत्कर्मशील हो, तो उसके अधीन कर्मचारी सही मार्ग का अनुसरण करते हुए संस्था की उन्नति में सहयोगी बनते हैं। नेता और गुरु सत्कर्म करके सन्मार्ग पर चलने से शिष्यों को भी सत्कर्म और सन्मार्ग की ओर अग्रसर होते हैं।

भविष्य की योजना बनाकर और उसके अनुरूप प्रयास करने से अनेक लोग भोग और भाग्य के साथ आनंदमय जीवन जीते हैं। अनेक लोगों को होने वाली आपदाओं और दुर्दशा का कारण भविष्य की योजना का अभाव है।

हे राम! मैं बार-बार घोषणा करता हूँ कि व्यक्ति जिसके लिए जितना प्रयास करता है, वह उतना ही प्राप्त करता है। अश्रद्धा और लापरवाही दिखाता है और प्रयास नहीं करता, उसे कहीं भी कुछ भी प्राप्त नहीं होता। मनुष्य को जो प्राप्त करना है, उसके लिए उसे श्रेष्ठ प्रयास करना ही होगा। फल तुरंत भी मिल सकता है या कुछ विलंब से भी प्राप्त हो सकता है, किन्तु एक बात निश्चित है: सत्प्रयासों का फल शुभ होता है, और अशुभ प्रयासों का परिणाम दुखद। इन्हें कोई भी रोक नहीं सकता, यह एक अटल नियम है।

निरर्थक प्रयास भी केवल निरर्थक परिणाम ही लाते हैं। संपूर्ण और सतर्क समझ के साथ किए गए प्रयास से ही मनचाहा फल प्राप्त होता है।

पूर्वकर्मों से प्राप्त दुष्ट संस्कारों को वर्तमान के सत्प्रयासों से शुभ में बदला जा सकता है। वर्तमान सत्कर्म पूर्व के दोषों को धो डालने की शक्ति रखते हैं। इसलिए हे राम! सदैव सत्कर्म करने का ही प्रयास करना चाहिए।

‘क्या मेरे प्रयास अल्प हैं या उत्कृष्ट?’ – जीव को इस पर विचार करके उचित निर्णय लेना चाहिए।

यदि लौकिक कार्यों को देखा जाए, तो राज्य कल्याण, भोग-विलास, व्यवस्थित ढांचा, परिवार का पोषण, क्रोध, संयम, नियंत्रण, या आकर्षण जैसे अनेक जटिल कार्य केवल प्रयास बल के द्वारा ही संभव हो पाते हैं। दैव को स्वीकार करते हुए मनुष्यों को उत्तम सत्कर्मों का आश्रय लेकर उन्नति प्राप्त करना चाहिए।

जब बात ‘इच्छाओं की पूर्ति’ की आती है, तो इसके लिए तीव्र इच्छा के साथ किया गया प्रयास लक्ष्य की शुद्धता को जन्म देता है और सकारात्मक विचारों और कार्यों को एकत्रित करता है। पूर्व के प्रयासों से उत्पन्न बुद्धि इसके लिए तैयार होती है और उस विचार को स्वीकार करती है। बार-बार प्रयास करने से फल प्राप्त होता है।

मनुष्य, अपने पूर्वजन्मों में किए गए स्वकीय प्रयासों का सार स्वरूप बनी हुई वासनाओं के अनुसार ही वर्तमान में सोच रहा है, बोल रहा है और व्यवहार कर रहा है। वासनाएँ ही कर्मों में परिणत होती हैं, और वही वासनाएँ पुनः उन कर्मों को करने के लिए प्रेरित करती हैं। जिनके पास जैसी वासनाएँ होती हैं, वे उसी के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं।

जिसके भीतर जो वासनाएँ अधिक बलशाली होती हैं, वे ही अंततः उसके कर्मों में परिवर्तित हो जाती हैं। किंतु वह अपने पूर्वजन्मों के प्रयासों को समग्रता से निरिक्षण न करने के कारण उन्हें स्पष्टतः पहचान नहीं पाता, अतः वह उनके प्रभाव को समझ नहीं पाता।

प्रत्येक जीव में शुभ और अशुभ पूर्वकर्म विद्यमान रहते हैं। इनमें शुभ वासनाएँ शुभ कर्मों की ओर और अशुभ वासनाएँ अशुभ कर्मों की ओर जीव को प्रेरित करती हैं। इन दोनों में जो अधिक बलशाली होती है, वह शीघ्र ही दूसरी को पराजित करके जीव को उस प्रकार के आचरण में नियुक्त करती है। लेकिन वर्तमान में क्या करना चाहिए? क्या नहीं करना चाहिए? किसका आश्रय लेना चाहिए? किसका नहीं लेना चाहिए? क्या और कैसे ग्रहण करना चाहिए? क्या और कैसे ग्रहण नहीं करना चाहिए? यह सब चैतन्यस्वरूप जीव के हाथ में हैं। इसके लिए सन्मार्ग दिखाने वाले मार्ग और विधि-विधानों को विवेक बुद्धि से ग्रहण करके केवल शुभ कर्मों का ही आश्रय लेना चाहिए। यदि शुभ वासनाओं से प्रेरित होकर जीव शुभ पुरुषार्थ बल के द्वारा क्रमशः शाश्वत मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यदि अशुभ वासनाएँ प्रबल होकर अशुभ कर्मों में प्रवृत्त करवाती हैं, तो वर्तमान काल में उत्तम प्रयास अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान प्रयासों के द्वारा धीरे-धीरे अशुभ वासनाओं को कमजोर करना चाहिए। इस प्रकार प्रयास करते हुए, एक शुभ क्षण में उन अशुभ संस्कारों को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए।

जीव कोई जड़ शरीर नहीं है। वह चैतन्यस्वरूप, प्रज्ञामय स्वरूप है। ऐसे जीव को पूर्व संस्कारों के अधीन रहने की क्या आवश्यकता है?

जब तुम्हारा मन बुरे मार्ग पर जाने लगे, तब उसे अच्छे मार्ग पर मोड़ने का प्रयास ही शुभ कर्म कहलाता है।

इस जीव का चित्त एक शरारती बच्चे की तरह अत्यंत चंचल होता है। किंतु चित्त की एक विशेषता यह है कि जिस दिशा में हम इसे मोड़ते हैं, यह उसी दिशा में तेज़ी से दौड़ता है।यदि हम इसे अशुभ से शुभ की ओर ले जाएँ, तो यह धीरे धीरे शुभ कर्मों को स्नेहपूर्वक अपना लेता है। पर यदि इसे शुभ से अशुभ की ओर जाने दें, तो यह उतनी ही गति से दुष्कर्मों को भी प्रेमपूर्वक अपनाता है। इसलिए इस चित्त को कुछ दृढ़ता के साथ बलपूर्वक शुभ प्रयासों की ओर ही मोड़ना चाहिए। इसे जैसा है वैसा ही छोड़ देना उचित नहीं। हमें दुष्कर्मों को धीरे-धीरे क्षीण करते हुए, करुणा, समदर्शिता जैसे उत्तम गुणों को अभ्यासपूर्वक अपनाना चाहिए।

वासनाएँ अभ्यास के प्रभाव से ही मज़बूत होती हैं। वे या तो अज्ञान से या अभ्यास से या फिर किसी और कारण से भी बढ़ सकती हैं। किन्तु इनका उपचार मात्र शुभ कर्मों से ही संभव है। शुभ आचरण सदा ही हितकारी होता है। ये भविष्य में दुष्ट वासनाओं के बनने की संभावना को कमजोर कर सकते हैं।

जब मन पवित्र हो जाता है, तब जीव सूर्यकांत मणि की भाँति स्वयं प्रकाशमान हो उठता है।

पवित्र मन के साथ जो जीव योग्यताप्राप्त होता है, वह शीघ्र ही मोक्ष और मुक्ति को प्राप्त करता है।

श्रीराम: हे महाशक्ति! तुम कह रही हो कि जीव को उसकी योग्यता के अनुसार मुक्ति और मोक्ष प्राप्त होते हैं। कृपया अब इस मोक्ष और मुक्ति के विषय में और अधिक विस्तार से समझाइए।

महाशक्ति: श्रीराम! मुक्ति का अर्थ है कि जीव अपनी वर्तमान अवस्था से उच्च अवस्था को प्राप्त करे, दुखों और कष्टों से निकल जाए; तीन प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाए; माया के रहस्य को जानकर पूर्ण ज्ञान प्राप्त करे। जो जीव मुक्ति को प्राप्त कर लेता है वह स्वतंत्र हो जाता है। वह प्रकृति पर अधिकार कर सकता है। उसमें दूसरों को मुक्ति देने की शक्ति होती है। वह ईश्वर के समान हो जाता है। उसके अधिकारों में प्रकृति की रक्षा करना और सृष्टि निर्माण में योगदान देना भी सम्मिलित है। ऐसे मुक्त आत्माएँ धर्म के दिव्य देवताओं के रूप में विद्यमान रहती हैं।

42. धर्म से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति

महाशक्ति: हे श्रीराम! जीव को मुक्ति और मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक निश्चित काल-सीमा निर्धारित की गई है। प्रत्येक जीव को जो भी कर्तव्य या कार्य (उपाधि) सौंपा गया है, वह एक निश्चित कर्तव्यकाल तक सीमित होता है। जब तक वह अपने निर्धारित कर्तव्यों को निभाता है, तब तक उसका जीवन चलता है। और जब वह अपने धर्मपूर्वक कर्तव्यों को पूर्ण कर लेता है, तब ईश्वर उसे मुक्ति या मोक्ष प्रदान करता है।

पंचभूत अपने साथ निर्धारित उपाधियों में जो कर्तव्य निभाते हैं, उसका समय समाप्त होने पर ही वे मुक्त होकर स्वतंत्र जीव बन जाते हैं। जीवों के गुणों में विभिन्न धर्म निश्चित किए गए हैं। उन्हीं गुणों के अनुसार वे विभिन्न कर्तव्यों का पालन करते हैं। उनके कर्तव्यकाल के समाप्त होने पर ही वे मुक्ति को प्राप्त करते हैं। वे उत्तम गुणों वाले देश को प्रधान रूप से प्राप्त करते हैं। मनुष्य का कर्तव्य यही है कि उसे जो विविध धर्म और कर्तव्य सौंपे गए हैं, उनका पालन करे। अपने धर्म और कर्तव्यों को पूरा किए बिना उनसे बचना नहीं चाहिए। मनुष्य अपने कर्तव्यकाल को पूर्ण रूप से निभाकर ही मुक्ति और मोक्ष प्राप्त करने के लिए उत्तम गुणों को प्राप्त करता है।

जीव के मन और उसकी पात्रता के अनुसार उसे उच्च लोकों में प्रवेश दिलाने वाला मोक्ष प्राप्त होता है; दैवलोक में प्रवेश करने के लिए जिन धर्मों का पालन करना चाहिए, उनका वर्णन दैवलोक धर्मशास्त्र में किया गया है, और उन्हें समझकर मनुष्य अपनी मानसिक अवस्था और कर्मों के अनुसार मोक्ष का अधिकारी बनता है।

43. दैव-लोक धर्मशास्त्र

हे श्रीराम! यदि मनुष्य को मुक्ति या मोक्ष प्राप्त करना है, तो उसे दैव-लोक धर्मशास्त्र में उल्लिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है। ये नियम दो प्रकार के होते हैं— उपदेश, 2. आदेश।

उपदेश: वह व्यवहार जो दैव-लोक धर्मशास्त्र में वर्णित विधानों के अनुसार तथा वरिष्ठों द्वारा सुझाए गए मार्ग के आचरण करना, उसे उपदेश कहा जाता है। यह विशेषतः आंतरिक रूप से धारित किए जाने वाले नियमों को इंगित करना ही उपदेश है। आदेश: इसमें वे नियम आते हैं जिनका मनुष्य को अनिवार्य रूप से पालन करना चाहिए। इन्हें यथावत् पालन करना चाहिए। साथ ही, संविधान द्वारा निर्धारित शासन और धर्मों का आचरण करना चाहिए।

इस चराचर जगत को धारण करने वाली एकमात्र दैवी शक्ति धर्म है। धर्म के कारण यह लोक स्थिर रहता है। सभी लोकों को परस्पर आधारित रखने वाली शक्ति का नाम धर्म है।

धर्म का अर्थ है आचरण। अनुभवी लोग जो यह बताते हैं कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, यदि करना है तो कैसे करना चाहिए और कैसे नहीं करना चाहिए, वह धर्म है। यह नीति-नियमों को बताता है और लोगों के उत्थान का कारण बनता है, वह धर्मशास्त्र कहलाता है।

परिपालन नामक व्यवस्था के होने का मुख्य कारण यह है कि किसी के प्रिय, इच्छा अथवा बल के प्रभाव से अन्याय न हो, बल्कि सबके कल्याण के लिए सबको समान रूप से सभी सुविधाएँ उपलब्ध हों। यदि शक्तिशाली व्यक्ति अपने बल से सब कुछ छीन ले, तो निर्बलों और सामान्य लोगों के लिए अभाव उत्पन्न हो जाएगा। इस अंतर को नियंत्रित करके, प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार समान न्याय प्रदान करने वाली ही परिपालन की धर्म व्यवस्था है। अतः शासन-व्यवस्था के नियम का सम्मान करते हुए धर्मसम्मत आचरण करना चाहिए।

जैसे नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए बाँध होता है, वैसे ही समाज के लिए धर्म होता है। समाज के हित के लिए धर्म द्वारा व्यवस्था नियंत्रित रहती है। व्यवस्था में नियुक्त धर्म का पालन करने से समाज की रक्षा होती है।

धर्म मनुष्य को यह सिखाता है कि वह अपने साथी मनुष्यों और प्रकृति के साथ सुखपूर्वक कैसे जी सकता है। धर्म मनुष्य के भीतर के सभी संघर्षों को नष्ट करके उसे शांतिपूर्ण जीवन जीने में सक्षम बनाता है।

धर्म का अर्थ है धारण करना, धारण किए रहना, आधार बनना, न्याय के पक्ष में समर्थन करना, और स्थिरता प्रदान करना। जो कुछ हमें आधार और स्थिरता देता है, वही धर्म कहलाता है।

सैनिक कवच धारण करके शत्रुओं के प्रहार से सुरक्षित रहता है। गायों के झुंड के पास चरवाहा लाठी पकड़कर रहता है, जिससे गायें जंगली जानवरों के हमले से सुरक्षित रहती हैं। वकील और रक्षक बल सत्य का पक्ष लेकर दुष्टों को दंडित करते हैं, जिससे नागरिक सुरक्षित रहते हैं।

जो जिम्मेदारियाँ किसी एक को दी गई हैं या जिन्हें उसने स्वीकार किया है, उनके प्रति कटिबद्ध होकर कार्य करना ही धर्म है।

आपातकाल में भी यह सोचने वाला कि ‘मेरी रक्षा हो या न हो, धर्म की रक्षा होना सर्वोपरि है,’ वह उत्तम धार्मिक व्यक्ति है। मनुष्य को चाहिए कि भले परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, वह धर्म की रक्षा के लिए प्रयासशील और तैयार रहना चाहिए।

अपने कार्य को त्रिकरण शुद्धि के साथ—अर्थात् मन, वचन, और कर्म से—उसमें पूरी तरह निमग्न होकर अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए।

धर्म आश्रम (जीवन के चरण), देश, काल, और परिस्थितियों के अनुसार बदलता है।

उत्तरदायित्व का निर्वहन करना ही धर्म है। इसके विपरीत, उत्तरदायित्व से पलायन यह अधर्म है।

अधिकारियों के आदेशों का उल्लंघन किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करना धर्म है।

वे सत्कर्म हमें विकास, कल्याण, आनंद, और सिद्धि प्रदान करते हैं, उन्हीं को धर्म कहा जाता है। शारीरिक, मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक, और सामाजिक विकास प्रदान करके पूर्ण कल्याण देता है, वही धर्म है।

धर्म न केवल व्यक्ति के लिए, बल्कि समाज के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यदि धर्म को खतरा होता है, तो उससे धर्मात्माओं और कमजोर लोगों को हानि पहुँचती है।

जो व्यक्ति अपने स्वधर्म का पालन करता है, वही सर्वोत्तम पुरुष कहलाता है। वही व्यक्ति धर्म का रक्षक बनता है, और समाज का उद्धार करता है।

स्वधर्म का अर्थ है अपनी वृत्ति (पेशा) के प्रति न्याय करना। चाहे वह कर्मचारी हो या अधिकारी, अपने कर्तव्य को भूले बिना, उसे सौंपे गए दायित्व को जिम्मेदारीपूर्वक और बिना किसी बाधा के पूरा करना ही स्वधर्म है।

धर्म को धारण करने वाले साहसी होते हैं। धर्म साहस और तेजस्विता प्रदान करता है।

सभी धर्मों का मूल सत्य है। धर्म दुराचारों को नष्ट करता है। सत्य, शुचिता, दया जैसे अच्छे गुणों के साथ मनुष्य को सत्कर्म में रत रहकर जीना चाहिए। शुद्ध चित्त के साथ धर्म प्रकाशित होता है। जहाँ धर्म है, वहाँ पाप नहीं रहता।

धैर्य के साथ धर्म को धारण किया जा सकता है। धैर्य के बिना धर्म स्थिर नहीं रहता। धैर्य ही सब कुछ है। धैर्य ही यज्ञ है, धैर्य ही दान है, धैर्य ही धर्म है। धैर्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं। धर्म के लिए पहला और आवश्यक गुण धैर्य है। समाज के हित के लिए धर्म अत्यंत आवश्यक है।

धर्म को कमजोर करने वाली आज्ञाएँ या प्रवचन नहीं होने चाहिए।

जिसके कारण समाज के लोग निडर होकर जीते हैं, जो “मैं तुम्हारे साथ हूँ” कहकर अभय देता है, और जो संस्कारों के हित में व्यवहार करता है, वही धर्मात्मा है। उसके कारण लोग सुरक्षित रहते हैं। वह जिस संस्था में कार्य करता है, उस संस्था को नुकसान नहीं होता, बल्कि उसकी कीर्ति बढ़ती है। धर्म से च्युत होने पर न केवल वह स्वयं पतन की ओर जाता है, बल्कि उस पर भरोसा करने वालों का भी पतन होता हैं। मनुष्य को शाश्वत रूप से रक्षा करने वाला केवल धर्म ही है।

जो व्यक्ति “मैंने अपने धर्म का पालन किया” इस मनोदृढ़ता के साथ रहता है, वह परम संतोष और शांति में रहता है।

यदि धन धर्म के साथ न जुड़ा हो, तो यह ऐसा है जैसे क्रूर जंगली जानवरों से भरे महारण्य में मवेशियों को पालने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति का जीवन दुखमय हो जाता है। धर्म को छोड़ने वालों का जीवन भी ऐसा ही दुखमय होता है।

जो व्यक्ति धर्म में कठिन परिस्थितियों में भी डटा रहता है, वही श्रद्धावान कहलाता है। कैसी भी आपत्तिजनक परिस्थिति क्यों न हो, यदि वह व्यक्ति शास्त्र और धर्म का त्याग किए बिना अडिग रहता है, तो वह सच्चे अर्थों में श्रद्धा रखने वाला है।

केवल अनुकूल परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि जटिल और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धर्म को दृढ़ता से पकड़कर साहस बनाए रखना चाहिए। उत्साह को न छोड़ते हुए परम श्रद्धा के साथ धर्म को धारण करना चाहिए। धर्म ही तुम्हारी रक्षा करेगा।

व्यक्तिगत लाभ, प्रतिष्ठा, या स्वार्थ के लिए धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए।

जहाँ कहीं भी जाओ, वहाँ धर्म का पालन करना चाहिए। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म का पालन करे, तो विश्व में शांति और सुरक्षा की कमी नहीं होगी। विश्व में शांति शब्द का अर्थ ही धर्म का आचरण है।

जब धर्म का लोप होता है, तो चाहे कितने भी नियम बनाए जाएँ या कितना भी प्रयास किया जाए, लोग शांति से नहीं जी सकते। धर्म को छोड़ देने से यह लोगों को किसी भी खतरे की ओर ले जाता है।

जो धर्म को दृढ़ता से पकड़ता है, जहाँ वह रहता है, वहाँ शांति और सौभाग्य प्रचुर मात्रा में होते हैं।

मानव जन्म अत्यंत दुर्लभ है। इतना दुर्लभ जन्म प्राप्त करने वाला धर्म के आचरण से ही मोक्ष प्राप्त कर सकता है। धर्म के आचरण से ही मानव जन्म का प्रयोजन सिद्ध होता है।

जीव दैव स्वरूपी है। सभी जीवों और मनुष्यों की योगक्षेम (कल्याण और सुरक्षा) का ध्यान रखना देवताओं की योगक्षेम का ध्यान रखने के समान है। ऐसा करने पर ही देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उन्हें कष्ट देने से उनका क्रोध भड़कता है। यही धर्म है। अपने शत्रु को भी केवल मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि पंचभूतों के अधिकारी के रूप में देखना चाहिए। जिस प्रकार उसका संकल्प शक्ति सक्रिय रूप से कार्य करती है, उसी प्रकार उसका आशीर्वाद और क्रोध भी सक्रिय रूप से कार्य करता है। जो पीड़ा देता है, वह उसका फल निश्चित ही भोगता है। यह प्रकृति का नियम है। संभव है कि वर्तमान परिस्थितियाँ और समय उसके अनुकूल हों और इसका प्रभाव दिखाई न दे, लेकिन एक दिन प्रतिकूल समय भी आएगा। उस समय पंचभूत चारों ओर से घेरकर खड़े होकर उसे रोक देंगे और सजा को अवश्य लागू करेंगे।

किसी को कष्ट देने से उस जीव के क्रोध के कारण शापग्रस्त हो जाते हैं। सुख और आनंद पाने वाले जीव के आशीर्वाद से पुण्य प्राप्त होता है, जिसके फलस्वरूप सौभाग्य और भोग प्राप्त होते हैं। शाप ही पाप के रूप में और आशीर्वाद ही सौभाग्य के रूप में प्राप्त होता है। इनके पूर्व कर्म इतने गुप्त होते हैं कि कोई उन्हें समझ नहीं सकता, लेकिन समय के साथ वे अनुभव में आते हैं।

यदि आपने कोई दोष नहीं किया है, तो केवल किसी के आक्रोश या क्रोध से शापित हो जाने का भय मत रखिए। बिना कारण क्रोध करने वालों की नकारात्मक तरंगें (वाइब्रेशन्स) उन्हें स्वयं प्रभावित करके नष्ट करती हैं। हर शाप प्राप्त करने वाले को कष्ट भोगना पड़ता है।

जिनके मन में प्रसन्नता होती है, उन्हें दूसरों के शाप नहीं छूते।

किसी के लापरवाही या क्रोध के कारण कष्ट झेलने वालों या अस्वस्थ लोगों को यह नहीं मानना चाहिए कि यह शाप के कारण हुआ है। यह अज्ञान और अधर्म है। जो लापरवाही या क्रोध से व्यवहार करके दूसरों के कष्ट का कारण बनते हैं, केवल वही दंड भोगते हैं।

किसी के द्वारा किए गए अपराधों के लिए केवल न्यायालय ही दंड दे सकता है। इसका उल्लंघन करने वाला अधर्मी कहलाता है।

व्यक्ति के उद्देश्य और कर्तव्य को ध्यान में रखकर ही हिंसा या अहिंसा का निर्धारण होता है। अपने कर्तव्य का पालन करने वाले सैनिकों और वकीलों को हिंसा का दोष नहीं लगता।

दुष्ट अंग को काटने वाला वैद्य हिंसक नहीं होता। यह देखना चाहिए कि वह किस उद्देश्य और कितने पवित्र हृदय से कार्य कर रहा है—इसी आधार पर यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि वह कार्य हिंसा है या अहिंसा। यदि वह अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होकर कार्य कर रहा है, तो वह हिंसा नहीं कहलाती।

बिना उचित कारण, कर्तव्यनिष्ठा के बिना, न्याय-अन्याय का विवेक न रखते हुए केवल सामने वाले को कष्ट देने के उद्देश्य से बोले गए शब्द हिंसा-दोष बन जाते हैं। मन को पीड़ा पहुँचाना भी हिंसा ही है।

चाहे ज्ञान हो या अज्ञान, धर्म हो या अधर्म, उनका प्रसार करना उनका स्वभाव है। ज्ञान और धर्म को स्वीकार करना और प्रसार करना चाहिए। अज्ञान और अधर्म को रोकना चाहिए। जो अपने कर्तव्य को धर्मानुसार निभाते हैं, जो अपने अधिकार का उपयोग सही धर्म मार्ग में करते हैं, और जो ज्ञान और धर्म का प्रसार करते हैं, वे धीर पुरुष होते हैं। यदि अनेक लोग उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं, तो वे उन्हें ज्ञान देने वाले दाता बनते हैं। जो कर्तव्य के प्रति लापरवाही, आलस्य, या अधिकार का दुरुपयोग करते हैं, वे अज्ञान का प्रसार करते हैं और दैवी क्रोध के पात्र बनते हैं।

ज्ञानी को अपनी शक्ति को धर्म और धर्म कार्यों की ओर मोड़ना चाहिए। समाज का कल्याण और समाज की रक्षा उसका ध्येय होना चाहिए। जो धर्म की रक्षा करते हैं, धर्म उनकी योगक्षेम की रक्षा करता है। यदि शक्ति का उपयोग अधर्म की ओर किया जाता है, तो उसका बुरा प्रभाव भुगतना पड़ता है।

स्वार्थ, द्वेष, और अधर्म बगल में भाले की तरह हैं, जो किसी न किसी दिन कष्ट और दुख देते हैं। शांति, सहनशीलता, धैर्य, करुणा, दया, दान, और धर्म छतरी की तरह हैं, जो धूप और बारिश से रक्षा करने वाले छतरी की भाँति हैं जो सभी को आनंद प्रदान करते हैं।

दुष्ट भावनाओं वाले लोगों की शक्ति न केवल दुष्ट सुझाव देती है, बल्कि जैसे अग्नि को वायु और प्रज्वलित कर देती है, वैसे ही दुष्ट शक्तियाँ भी उनका साथ देकर उन्हें और प्रभावित करती हैं। लेकिन जिनके संकल्प धर्मपरक होते हैं, उनकी शक्ति उन्हें धर्ममार्ग ही दिखाती है। उसी तरह, ऐसे लोगों के संकल्प को पंचभूत, अष्टवसु, अष्ट दिक्पालक, और धर्म देवता सहयोग करते हैं।

मनुष्य को अज्ञान और अविवेक जितना कष्ट देते हैं, उतना कष्ट रोग या आपदाएँ नहीं दे सकतीं। इसलिए मनुष्य को यह परखना चाहिए कि वह किन-किन अज्ञानताओं से कष्ट पा रहा है।

वर्तमान काल में ज्ञान और धर्म का लोप हुआ है, और अज्ञान व अधर्म बढ़ गया है। वर्तमान में दिखाई देने वाली दुर्दशा का यही कारण है, इसे समझना चाहिए।

यदि बुराई पर अच्छाई को विजय प्राप्त करनी है, तो अधर्म पर धर्म को विजय प्राप्त करनी होगी। यदि अपने परिवेश या समाज में अधर्म और अन्याय हो रहा है, और फिर भी शक्ति व सामर्थ्य होने के बावजूद उसे न रोका जाए, तो यह अधर्म का समर्थन करने के समान है। जो अधर्म और अज्ञान का विरोध करता है, वही धर्म की रक्षा करता है।

शत्रु और मित्र के बीच वाद-विवाद के समय, यदि न्याय शत्रु के पक्ष में हो, तो शत्रु के पक्ष में ही खड़ा होना चाहिए, यही धर्म है। धर्म का पालन करते समय शत्रु या बलहीन व्यक्ति में कोई भेद नहीं देखना चाहिए। धर्म को दृढ़ता से पकड़ने वाला ही सच्चा बलवान है। बलहीन लोग लंबे समय तक धर्म को धारण नहीं कर सकते। जो कोई धर्म को पकड़ता है, वह अत्यंत बलवान होता है। जो धर्म के पक्ष में खड़ा होकर धन या प्राण की चिंता नहीं करता, वही धर्मात्मा है। तब नियति उसे उच्च स्थिति में स्थापित करती है।

जीव के ज्ञान और धर्म के आधार पर नियति उसे विभिन्न लोकों और उन लोकों के अनुरूप स्थानों पर ले जाती है और उसे उन कर्तव्यों में नियुक्त करती है।

विधि और विधाता पर विश्वास करना अपनी शक्ति को स्वतंत्रता देना है। जो विधि पर भरोसा करके अपने कर्तव्य को धर्मानुसार निभाते हैं, वे निश्चिंत और निर्भय होकर जीवन जी सकते हैं।

जो लोग दैव पर विश्वास किए बिना अपनी सीमित बुद्धि और वाणी के बल से दूसरों की शक्ति को कमजोर करते हैं, उन्हें समाज को कमजोर करने वाले अज्ञानी समझना चाहिए। ऐसे लोगों के प्रति सावधान रहना चाहिए।

मनुष्यों को अपनी शक्ति पर विश्वास करना चाहिए। उनकी शक्ति पर्दे के पीछे अत्यंत प्रभावशाली, शक्तिशाली और अविश्वसनीय रूप से कार्य करती है। अपनी शक्ति पर विश्वास करते हुए दैव शक्ति पर भी विश्वास करना चाहिए। तब मनुष्य अपने जीवन में चमत्कारों को देखेगा।

क्षणिक सुख के लिए दूसरों को कष्ट देने वाला मूर्ख और स्वार्थी व्यक्ति जब तक अपने अज्ञान को दूर नहीं करता, तब तक वह ऐसे ही स्थानों और लोकों में जन्म लेता रहता है।

यदि कोई मानसिक या शारीरिक रूप से दूसरों को कष्ट देकर पाप करता है, तो उसका परिणाम तुरंत नहीं भी हो सकता, लेकिन देश, काल, और परिस्थितियों के अनुसार प्रत्येक क्रिया का प्रतिक्रिया अवश्य होता है।

दैव स्वरूपी महाविष्णु, राम, कृष्ण, शिव, बुद्ध, जैसे महापुरुष भी कष्टों और दुखों से बच नहीं सके। जब जीव को ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती, तब उसके द्वारा की गई गलतियाँ समय के साथ प्रभाव दिखाती हैं।

जैसे परिपालक आत्मा का मनो-संदेश पंचभूतों तक पहुँचता है, वैसे ही जीव की हृदय की पवित्रता दैव आत्मा तक पहुँचती है। अच्छे उद्देश्य वाले लोग दैव कृपा प्राप्त करते हैं, जबकि बुरे उद्देश्य वाले दैवी क्रोध के पात्र बनते हैं।

यह समझना चाहिए कि दैव द्वारा संकल्पित घटना के बाद जीव जो भी कार्य करता है, वह केवल एक पात्र (माध्यम) मात्र है। दैवी संदेश के अनुरूप कर्म जीव को प्रभावित और संचालित करता है। जीव सोचता है कि वह स्वयं विचार कर रहा है, लेकिन प्राप्त संदेश भी उसी के विचारों जैसा प्रतीत होता है। यह अलग नहीं लगता। जैसे एक बल्ब को चालू (ऑन) या बंद (ऑफ) करने के लिए दो स्विच होते हैं, और बल्ब को यह नहीं पता कि कौन सा स्विच बिजली प्रवाहित कर रहा है या रोक रहा है, वैसे ही सीमित ज्ञान वाला जीव यह नहीं समझ पाता कि उसकी सोच दैव से प्राप्त संकेत है या उसकी बुद्धि से।

यदि जीव ने पहले कोई गलतियाँ की हैं, तो दुष्ट शक्ति उसके अच्छे कार्यों में बाधा डालती है। यदि दैवी कृपा हो, तो ये बाधाएँ हट जाती हैं और संकल्पित कार्य शीघ्र पूर्ण हो जाता है।

लोगों को शासक के आदेशों का सम्मान करते हुए विश्वासपात्र रहना चाहिए।

शासक, नेता, अधिकारी, और कर्मचारी धर्म के रक्षक और समाज सेवक के रूप में अपने कर्तव्यों का पालन करें। उन्हें अपने पेशे के प्रति न्याय करना चाहिए।

जो लोग धर्म का पालन करते हैं, वे विश्व नियमों में सहयोग करते हैं।

परमाणु से लेकर सूर्य-चंद्र तक सभी के लिए एक ही धर्म है, और वह है परस्पर सहयोग का धर्म। इस धर्म को भूले बिना, अपने साथी मनुष्य को सहायता और सहयोग देना चाहिए।

देश का भविष्य एक व्यक्ति के व्यवस्था में किए जा रहे व्यवसाय और समाज में उसके व्यवहार के तरीके पर निर्भर करता है। अपने व्यवसाय को लापरवाही से नहीं करना चाहिए। समाज में लापरवाही से व्यवहार नहीं करना चाहिए। यदि कर्तव्यनिष्ठा और समाज के हित के साथ व्यवहार किया जाए, तो वह व्यवस्था और समाज के उद्धार का कारक बनता है।

यदि व्यवस्था को सुधारना है, तो उसमें कार्यरत कर्मचारी को स्वार्थ और शक्ति का दुरुपयोग किए बिना अपने सौंपे गए कार्य को पूर्ण करना चाहिए। उसे अपने उच्च अधिकारी के प्रति अहंकार से व्यवहार नहीं करना चाहिए। साथ ही, यदि वह अधिकारी है, तो उसे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए और उन्हें व्यवस्था की रीढ़ मानकर देखना चाहिए। दूसरों का सम्मान करके सम्मान प्राप्त करना चाहिए। व्यवस्था को कमजोर करने वाली रिश्वत का विरोध करना चाहिए। तभी व्यवस्था का उद्धार होगा।

धर्माचार्य: यह बात हमेशा याद रखें कि पूर्व कर्मों के फलस्वरूप ही आज आपको अधिकार प्राप्त हुआ है। यदि उस अधिकार की शक्ति को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करोगे, तो नीचे गिरने में अधिक समय नहीं लगेगा। और पुनः उच्च स्थिति प्राप्त करने में बहुत समय लगेगा।

निर्धारित लक्ष्य को जल्दी पूरा करने के लिए कर्मचारियों पर दबाव डालना अधिकारी का धर्म है। कर्मचारियों का अपने लक्ष्य को पूरा न करके उच्च अधिकारी की निंदा या अवहेलना करना अधर्म है।

जीव द्वारा किए गए कार्यों से अर्जित पुण्य फल के अनुसार विधि उसे कार्यों को पूरा करने की सामर्थ्य, प्रज्ञा, और शक्ति प्रदान करके विभिन्न पदों पर नियुक्त करती है।

अंधकार में भी तुम्हारे द्वारा किए गए पाप-पुण्य देखे जाते हैं। आत्मा साक्षी बनकर देखती रहती है। शक्ति उन्हें ग्रहण करती है और शक्ति ही विधि रूप में उसका उत्तर देती है।

शासकों को धर्म की रक्षा करनी चाहिए। यदि वे धर्म में जरा भी विमुखविमुख हो जाएँ तो अंधकार फैल जाता है।

मनुष्यों के कष्टों का मुख्य कारण यह है कि लोग सामाजिक संतुलन को भूलकर, अधिकांश लोग सत्ता के लिए संघर्ष करते हैं और केवल सुखद पेशे को अपनाना चाहते हैं।

यदि हाथ की पाँच उंगलियाँ समान हों, तो मुट्ठी मजबूत नहीं होगी और कोई कार्य करने में उंगलियाँ सहयोग नहीं करेंगी। इसी तरह, यदि पंचभूत समान अनुपात में न हों और प्रत्येक भूत पानी का गुण चाहे, तो पूरी पृथ्वी जलमय हो जाएगी। यदि केवल अग्नि तत्त्व की इच्छा हो, तो पृथ्वी अग्नि गोला बन जाएगी। पंचभूतों का अपने-अपने धर्मों के साथ संतुलन में रहना ही पृथ्वी को जीवों के लिए अनुकूल बनाता है। प्रत्येक मनुष्य को समतापूर्ण समाज के लिए संतुलित रूप से अपने पेशे को अपनाकर, अपने प्राप्त कार्य के प्रति न्याय करना चाहिए, जिससे देश के विकास और लोगों के कल्याण में सहयोग देना चाहिए। केवल अधिकार के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने पेशे को दैवी कार्य मानना चाहिए। समय के अनुसार दैवी शक्ति उनके लिए उचित न्याय करती है।

भले कोई सफाई कर्मी हो या देश का शासक, सभी को समाज की सेवा करने वाले रूप में देखना चाहिए। यह सेवा ईश्वर की सेवा के समान मानी जानी चाहिए। कर्मचारी को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह छोटे पेशे में है। उसे इसे जनसेवा और ईश्वर का आदेश के रूप में मानना चाहिए।

भय और आलस्य कमजोर करते हैं। बल, साहस, और उत्साह को बढ़ाना चाहिए। तभी कार्य शीघ्र फलदायी होता है।

ज्ञान मंथन में विषयों की विवेचना करते समय अनेक विषयों के बीज उत्पन्न होते हैं। कर्म के बारे में जानने की प्रक्रिया में जन्मा यही बीज है – ‘यदि कर्म न किया जाए तो पुनः जन्म नहीं होगा’ — यह सिद्धांत। यह सिद्धांत यद्यपि सत्य है, किंतु वर्तमान देश-काल परिस्थिति में मोक्ष के समीप नहीं ले जाता। पंचभूत भले ही अपने-अपने वृत्तियों में रहने का संकल्प न करें, तथापि विश्व नियम ने उन्हें उनके-अपने वृत्तियों में स्थापित किया है। देवता भी लोककल्याणार्थ विभिन्न उत्तरदायित्व ग्रहण करके अपने-अपने कार्य कर रहे हैं। जीव चाहे कर्म का आरंभ न करे, परंतु सृष्टि के नियम के अनुसार प्रकृति उसे किसी-न-किसी कार्य में नियोजित कर देती है। मनुष्य भी यदि कर्म का संकल्प न करे तो प्रशासनिक नियम का पालन करते हुए उसे अपने-अपने कार्य करने ही पड़ते हैं। कर्तव्यभाव से किया गया कर्म जीव से नहीं जुड़ता; वही उसे मोक्ष के समीप ले जाता है।

समाज की सेवा करके यदि मोक्ष के योग्य बन जाए, तो ऐसे आनंदमय लोक और दैव लोक हैं जहाँ बिना किसी कर्म के भी जीवित रहा जा सकता है। उन लोकों में किसी भी प्रकार का कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती। किंतु जब तक जीव दिव्यता को प्राप्त नहीं करता, तब तक उसे निश्चित रूप से कर्म करते रहना ही पड़ता है।

मोक्ष के लिए जंगल में 100 वर्ष तक तपस्या करने वालों की तुलना में समाज कल्याण के लिए एक दिन सेवा करने वाला मोक्ष के अधिक निकट होता है।

यदि कर्म न किया जाए, तो व्यक्ति की शक्ति, ज्ञान, और धन कमजोर हो जाते हैं, जिससे अष्ट दरिद्रता आती है। कर्म पर भरोसा करके कार्य करना चाहिए। धर्म पर भरोसा करके लौकिक व्यवहार करना चाहिए। इससे सभी क्षेत्रों में विजय प्राप्त होती है और सभी के लिए शुभ होता है।

सबसे बड़ी सेवा यह है कि मनुष्य अपने कर्तव्य को धर्म के अनुरूप निभाए।

अधिकार का निर्णय धर्मानुसार होना चाहिए। योग्य व्यक्तियों को ही अधिकार और नौकरी दी जानी चाहिए। जिसमें जिसकी प्रवीणता हो, उसे वही अधिकार दिया जाना चाहिए।

जो भी कार्य किए जाएँ, वे देश के विकास और समाज की पूर्ण भलाई के लिए उपयोगी होने चाहिए।

स्वर्ग और नरक कहीं अलग लोकों में नहीं हैं। जहाँ लोग सुख, संतोष, और आनंदमय वातावरण में रहते हैं, वही स्वर्ग है। जहाँ लोग दुख और कष्ट में रहते हैं, वही नरक है। स्वर्ग लोक एक सीमित स्थान पर नहीं, बल्कि सर्वत्र सृजित किया जा सकता है। किसी और नई लोकों की कल्पना करने के बजाय, अपने वर्तमान लोक को स्वर्ग लोक में बदलने का प्रयास करना चाहिए। जहाँ तुम हो, उसी स्थान को आनंदमय और मनोहारी बनाओ।

निरुत्साह और द्वेष में जलते रहना नरक है। उत्साह और आनंद में डूब जाना ही स्वर्ग है।

जन्म देने वाली माता और पिता के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। शरीर की रक्षा करने वाली प्रकृति, पंचभूतों, अष्टवसुओं, अष्ट दिक्पालों और धर्म देवताओं के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।

जहाँ धर्म है, वहाँ सब कुछ सुरक्षित रहता है। धर्म द्वारा जो भी सुरक्षित नहीं होता, वह अंततः नष्ट हो जाता है।

धर्म के प्रति कटिबद्ध रहने का गुण होना चाहिए। व्यवस्था के नियमों का पालन करते हुए अपने कर्तव्य को निभाने से तुम सत्य में स्थिर रहते हो। इससे चित्त की शुद्धि होती है और कर्म करने में कुशलता प्राप्त होती है।

सभी मनुष्यों के आचार-व्यवहार धर्म के ढांचे में समाहित होने चाहिए। पेशा व्यवस्था के नियमों के अनुसार होना चाहिए। व्यवस्था के नियम शासन नियमों के अनुरूप होने चाहिए। शासन के नियम लोगों को सभी सुख-सुविधाएँ और आनंद प्रदान करने वाले होने चाहिए। तभी वे धर्म के ढांचे में समाहित होते हैं।

एक व्यक्ति को कीर्ति, उन्नति, प्रतिष्ठा, और शांति उसके द्वारा धारण किए गए धर्म से प्राप्त होती है।

एक को सहायता करनी चाहिए और उससे सहायता प्राप्त भी करनी चाहिए, यही पारस्परिक सहयोग का धर्म है।

यदि तुम धर्म जैसे महान शब्द का अर्थ समझ जाओ कि तुम्हें क्या करना है यह पता चल जाए, तो तुम्हारे द्वारा किए जा रहे अच्छे-बुरे सभी कर्मों का भी तुम्हें बोध हो जाएगा। मोह दूर होकर ज्ञान प्राप्त होगा और तुम्हें अपने कर्तव्य का बोध होगा।

कार्य करते समय मन को एकाग्र रखकर बहुत सावधानी और कुशलता के साथ करना चाहिए। लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। पहले की गई सारी कुशलता एक छोटी सी लापरवाही से नष्ट हो सकती है। जो श्रद्धा और कुशलता के साथ कार्य करते हैं, वही योग में कुशल होते हैं।

यदि तुम कर्म करते समय फल की आकांक्षा किए बिना कार्य करते रहते हो, तो फल देने वाला कोई है। वह देश, काल, और परिस्थितियों के अनुसार फल देता है। इसे समझकर धैर्य के साथ अपने कर्तव्यों को निभाने वाला ही योगी है।

इच्छा, भय, या लोभ के कारण धर्म को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए।

तुम जो भी कार्य करो, पहले यह विचार करो कि क्या वह श्रद्धा और निःस्वार्थ भाव से किया जा रहा है। क्या वह धर्मानुसार है? क्या उसमें स्वार्थ है या निःस्वार्थता? इसे समझकर सत्प्रवृत्ति के साथ त्रिकरण शुद्धि (मन, वचन, कर्म की शुद्धि) के साथ कर्तव्यों को धर्मानुसार निभाना चाहिए। यही दैवी गुण है। तुम्हारा मन पवित्र होना ही दैवी गुण है।

मन की भावना के अनुसार शक्ति की प्रतिक्रिया होती है। यदि जीव दैवी गुण और सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है, तो उसके शरीर में DNA में परिवर्तन होता है और शरीर दैवी गुणों को प्राप्त करता है।

जब तुम बोलते हो, वाद-विवाद करते हो, निर्णय देते हो, या कर्तव्य निभाते हो, तब तुम्हारा उद्देश्य सबसे महत्वपूर्ण होता है। उसी के अनुसार तुम्हारा उद्देश्य भौतिक रूप लेता है। उसी उद्देश्य के अनुसार पंचभूत कार्य करते हैं और दैव तक संदेश पहुँचता है। उसी के अनुसार दैवी कृपा या दैवी क्रोध प्राप्त होता है।

जिन विषयों से क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या, या भय उत्पन्न होता है, उन्हें परखने के लिए धैर्य और ज्ञान होना चाहिए। तभी मन निर्मल और पवित्र होगा।

कार्य में कठिनाई या ऊब की भावना रखने से कर्तव्यनिष्ठा में बाधा आती है। शक्ति के लिए कोई कार्य कठिन नहीं होता। केवल मन ही कठिनाई की भावना या ऊब पैदा करता है। ऊब के साथ किया गया कार्य बोझ बनता है, जबकि इच्छा और श्रद्धा के साथ किया गया कार्य हल्का लगता है।

जब तुम धार्मिक कार्यों में बुद्धि के साथ व्यवहार करते हो, तब तुम्हारी मनोकामना पूरी होने के लिए सभी पापरूपी बाधाएँ हट जाती हैं। जब तुममें धर्म कार्य करने की धार्मिक बुद्धि जागृत होती है, तब उससे सभी मंगलमय कार्य प्रारंभ होते हैं।

धर्मानुसार किया गया कार्य यदि असफल हो जाए, तो यह तुम्हारी गलती नहीं है। तुम्हें अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य निभाना है।

प्रत्येक कार्य को उत्कृष्ट ढंग से पूरा करने के उद्देश्य से तुम्हें जितना संभव हो उतना प्रयास करना ही तुम्हारा धर्म है। किये जाने वाला प्रत्येक कार्य और वस्तु को प्रगति की ओर ले जाने का प्रयास निरंतर करते रहना चाहिए।

मन की पवित्रता और संस्कारों की शक्ति के अनुरूप जीव को जन्म प्राप्त होता है।

जो लोग साहस, निःस्वार्थता, और उत्साह के साथ रहते हैं, वे पवित्र होते हैं। जितने समय तक वे इस स्थिति को बनाए रखते हैं, उतने समय तक वे परम शांति, निर्मलता, और निश्चलता के साथ आनंद में रहते हैं। उनकी छाया और रक्षा में कई लोग निश्चिंत और निर्भय होकर जीते हैं।

उत्तेजना और व्यग्रता से भरे नाटक, सिनेमा, पुस्तकें, और भाषण मन को विषाक्त करते हैं। इनके प्रति सजग और सावधान रहना चाहिए।

जो अपनी गलती को स्वीकार करके पश्चाताप करता है और उसे सुधारता है, वह सत्प्रवृत्ति की ओर बढ़ता है।

जो कार्य तुम्हें करना है, उसे पूरा करने की योग्यता ईश्वर ने तुम्हें पहले ही प्रदान की है। इसका दुरुपयोग न करके इसे दस लोगों के लाभ के लिए उपयोग करो।

जो तुम्हारी उन्नति की कामना करते हैं, उनके प्रति तुममें प्रेम और भक्ति होना ही यह दर्शाता है कि तुम धार्मिक जीवन जी रहे हो।

महिलाओं का सम्मान करना चाहिए। उन्हें शक्ति स्वरूप मानना चाहिए।

ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि मेरी बुद्धि धर्म की ओर कदम बढ़ाए और अधर्म की ओर क्षणभर भी न ठहरे।

मिट्टी में पड़ा बीज एक बूंद पानी से भी महान वृक्ष बन जाता है। लेकिन पत्थर पर पड़े बीज पर कितना भी पानी डालो, वह केवल गीला होता है, अंकुरित नहीं। जो आत्मा, धर्म, और कर्म के त्रय ज्ञान को धारण करते हैं, वे ज्ञान में महावृक्ष की तरह बनकर दस लोगों को मधुर फल और छाया प्रदान करते हैं। जिन्हें इन विषयों का ज्ञान नहीं, उन्हें कितना भी अच्छा उपदेश दिया जाए, वह पत्थर पर बीज को पानी देने जैसा निरुपयोगी होता है। उन्हें पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता। कर्म, धर्म, और आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने वाले सभी धर्मों का सार जानने वाले पंडित बनते हैं।

धर्म कहता है कि तुम शांत रहो और दूसरों को भी शांत रखो।

जो श्रद्धा और भक्ति के साथ धर्म का जप करते हैं, वे दैव द्वारा रक्षित होते हैं।

जैसे नदी में पानी का प्रवाह होता है, वैसे ही तुम्हारी प्रज्ञा प्रवाहित होनी चाहिए। ज्ञान, धन, और शक्ति का प्रवाह एक से दूसरे तक होना चाहिए। यदि यह प्रवाहित होता है, तो उपयोगी होता है; अन्यथा यह किसी के काम नहीं आता और धर्म का ढांचा निर्बल हो जाता है।

जो सत्य और धर्म के लिए तप करते हैं, उनके पाप मिट जाते हैं।

धर्म का पालन करने वाला मुक्ति प्राप्त करता है। जो परम सत्य है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं, जो सभी से परे है, और जो छह विकारों से अतीत है, वह आत्मा का ज्ञान प्राप्त होता है।

जैसा कि श्रवण महत्वपूर्ण है, वैसा ही मनन भी अत्यंत आवश्यक है। मनन के माध्यम से ही धारणा बनती है। जो कुछ सुना है, उसे जितनी गहराई से विश्लेषित करते हैं, जितना उसे स्मरण में रखते हैं, वह उतनी ही गहराई से मन में बस जाता है।

यदि तुम्हारे निरीक्षण में तुम्हारी कोई गलती स्पष्ट रूप से दिखाई देती है और फिर भी तुम उसे सुधारने का प्रयास नहीं करते, तो वह और बड़ी गलती बन जाती है।

धर्म केवल प्रयासपूर्वक किया जाने वाला कर्तव्य न होकर, उसे स्वाभाविक आदत के रूप में अपनाना चाहिए।

आपदा में फँसे व्यक्ति के सामने खड़े होने, उनकी सेवा करने, यह कहने में सक्षम होने कि मैंने उनकी कोई सेवा की, और दस लोगों के लिए उपयोगी जीवन जीने जैसे कार्य करने पर तुम्हारा स्वास्थ्य, तुम्हारी शक्ति, तुम्हारी बुद्धि और तुम्हारी वाणी सार्थक हो जाती है। यदि इनमें से कुछ भी तुम अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करते हो, तो उसमें तुम्हें प्रसन्न होने के लिए कुछ नहीं मिलेगा। न ही कोई तुम्हें आदर्श मानेगा। अपने स्वार्थ के लिए इन सबका उपयोग करने के बजाय, त्यागमयी बनकर समाज की सेवा करो। तब तुम सभी के लिए आदर्श पुरुष बनकर खड़े रहोगे।

यदि तुम्हें देखकर दूसरों में यह इच्छा जागे कि वे तुम्हारे जैसा बनें और वे उत्साहित हों, तो उस दिन तुम्हारा जन्म धन्य हो जाता है।

केवल धर्म को जानने वाला धर्मात्मा नहीं होता। जो धर्म का आचरण और अनुष्ठान करता है, वही धर्मात्मा है।

जब तक धर्म को थामे रखा जाता है, तब तक विश्व सुरक्षित और शांतिपूर्ण रहता है। धर्म का प्रबोधन करना ही सभी शास्त्रों का प्रयोजन है।

धर्म शास्त्र दैवी शासन है। यह समाज के कल्याण का कारण बनता है। धर्म शास्त्र में अटल विश्वास रखना चाहिए।

मनुष्य का पहला गुण धर्म के प्रति समर्पण और कर्तव्य के प्रति निष्ठा होना चाहिए। शास्त्र को ही शासन मानकर धर्म का पालन करना चाहिए। जो धर्म के प्रति समर्पित होता है, वही विश्व के लिए उपयोगी होता है और विश्व का उद्धार करता है।

यदि धर्म की परवाह किए बिना धर्म का पतन हो रहा हो और अधर्म बढ़ रहा हो, तो तुम्हें चुप नहीं रहना चाहिए। धर्म की रक्षा के लिए खड़ा होना चाहिए। यदि धर्म के लिए खड़े नहीं होते, तो धर्म को हानि होती है, और इसके परिणामों के लिए तुम भी जिम्मेदार होगे। साथ ही, इसके लिए उचित मूल्य भी चुकाना पड़ेगा।

यदि यह संदेह हो कि क्या धर्म है और क्या अधर्म, तो एक ही बात समझनी चाहिए: जो व्यवहार दूसरों द्वारा तुम्हें कष्ट देता है, उसे तुम दूसरों के लिए न करो, यही धर्म है। तुम्हारा व्यवहार अच्छा है या बुरा, यह पहले तुम्हारा अंतःकरण बताता है। इसे नकारकर किया गया व्यवहार अधर्म है।

जो लोग धर्म को थामने में संतुष्ट होते हैं और जो यह सोचकर दुखी होते हैं कि मैंने फलाने समय में धर्म को छोड़ दिया, वही लोग धर्म को थामने वाले बनते हैं।

कितनी भी कठिनाइयों में धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। धर्म कभी न कभी तुम्हें किनारे तक पहुँचा देता है।

जो लोग धर्म को थामे रखते हैं, उनके शील और चरित्र की गरिमा अनजाने में ही प्रकाशित होती रहती है।

जो लोग धर्म को थामते हैं, वे धर्म द्वारा रक्षित होते हैं। धर्म के आचरण से मन में उत्साह जागृत होता है।

यदि धर्म में समाज के प्रति प्रेम के साथ अनुष्ठान किया जाए, तो जैसे गर्म लोहे की नली में कोई कीड़ा नहीं आता, वैसे ही समाज को भी कोई हानि नहीं पहुँचती।

44. (क्रोध)

जहाँ क्रोध है, वहाँ कुटिलता जन्म लेती है। यह जीव के पतन का कारण बनती है। अज्ञान और माया के कारण उत्पन्न होने वाली यह एक बड़ी खाई है, जिसे पार करने के लिए कई जन्मों तक परिवर्तन लाना संभव नहीं होता।

क्रोध के कारण अर्जित तप की शक्ति नष्ट हो जाती है। क्रोध से ग्रस्त व्यक्ति का तप भंग हो जाता है। क्रोध के कारण अणिमा आदि सिद्धियाँ और महिमाएँ नष्ट हो जाती हैं। क्रोध धार्मिक कार्यों को करने की अनुमति नहीं देता। क्रोधी व्यक्ति तपस्वी नहीं हो सकता।

क्रोध की अवस्था में कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। न निर्णय करना चाहिए, न विचार करना चाहिए, न योजनाएँ बनानी चाहिए। क्रोध में लिए गए निर्णय में उचित अनुचित का विवेक नहीं होता। क्रोध के कारण बुद्धि में उत्पन्न व्यग्रता सही ढंग से सोचने की अनुमति नहीं देती। क्रोध के कारण की गई एक गलती जीवन भर कष्ट दे सकती है। क्रोध में लिया गया निर्णय बाद में यह सोचकर पछताना पड़ेगा कि “अगर उस समय वह निर्णय न लिया होता, तो मेरी स्थिति कुछ और होती।” इससे पहले ही सतर्क हो जाना चाहिए।

मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि वह किसके कारण बर्बाद होता है, उसकी मुख्य कमजोरी क्या है, और वह किस बात से उन्नति प्राप्त करता है। जैसे एक पेड़ की जड़ में लगी छोटी सी चिंगारी अंततः उस पूरे पेड़ को जला देती है, वैसे ही ईर्ष्या, द्वेष, और क्रोध जैसे दुर्गुण मनुष्य को जलाकर राख कर देते हैं।

यदि तुम अपनी शक्ति को सही मार्ग में उपयोग नहीं करते, तो वह गलत मार्ग में चली जाती है। मनुष्य का उसका कर्म ही उसकी उन्नति या पतन का कारण बनता है।

मनुष्य के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय विषय यदि कोई है, तो वह है ईर्ष्या। ईर्ष्या एक ऐसी वासना दोष है, जिसे जीव कई जन्मों से लेकर आता है। इसलिए प्रयासपूर्वक ईर्ष्या के स्थान पर प्रेम लाना चाहिए।

धैर्य रखने वाला व्यक्ति, जो नित्य सत्य और धर्म का व्रत धारण करता है, वह हर चीज को सहन करने की शक्ति और सामर्थ्य रखता है। वह किसी भी महान कार्य को पूरा करने में सक्षम होता है।

क्रोधित हो जाने के लिए शक्ति की कोई आवश्यकता नहीं होती, लेकिन धैर्य रखने के लिए बहुत शक्ति चाहिए।

कई स्थानों पर व्यग्रता के साथ छोड़ा गया वचन ब्रह्म दंड से भी अधिक शक्तिशाली होकर प्रभाव डालता है। केवल तपस्या करना ही महान नहीं है, बल्कि तपस्या करने वाले व्यक्ति के लिए  संयम प्राप्त करना भी उतना ही महान है। छोड़ा गया वचन उसकी शक्ति को प्रेरित करता है। उस संदेश को प्राप्त करने वाली शक्ति पंचभूतों को प्रेरित करती है। संदेश को स्वीकार करने वाले पंचभूत संबंधित कार्यों को पूरा करते हैं।

यदि मन में द्वेष प्रवेश कर जाता है, तो उसने जो कुछ पहले सुना, पढ़ा, और सीखा हुआ होता है सब कुछ निष्फल हो जाता है। कुछ भी स्मृति में नहीं रहता। कोई अन्य विचार नहीं आता। बुद्धि मंद पड़ जाती है और यह किसी भी दुष्ट संकल्प को करने के लिए बाध्य करती है।

45. शील (चरित्र)

शील (चरित्र) सबसे महत्वपूर्ण गुण है। शील ही सबसे बड़ी संपत्ति है। जिनके पास महान शील होता है, बुद्धिमान लोग उनके आचरण को आदर्श मानकर उसे अपनाते हैं।

जिनमें शील का वैभव होता है, वे धार्मिक, आदर्श पुरुष बनकर अनेक लोगों को प्रभावित करते हैं। वे लोग आगे चलकर अनेक जीवनों को प्रेरित करते हुए उन्हें उत्तम मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन देते हैं।

एक व्यक्ति क्या सोचता है, क्या पढ़ता है, क्या सुनता है, क्या आचरण करता है — इन्हीं सबके आधार पर उसके शील का स्वरूप गढ़ा जाता है।

46. मन और बुद्धि

यदि मन मजबूत हो, यदि मन तेजस्वी हो, यदि मन सत्य और धर्म को आश्रय देता हो, यदि मन में ईश्वर में आस्था हो, तो ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य सिद्ध कर सकता है।

आनंद का अर्थ है तुम्हारी दिव्य, अडिग, और निराकार स्थिति में रहना। किसी भी विषय से न दुखी होना और तुच्छ बातों से न विचलित होना। यदि कोई चीज तुम्हें दुखी या विचलित करती है, तो तुम आनंद में नहीं हो। तुम किसी के प्रभाव में आ रहे हो। तुम किसी के द्वारा प्रभावित तभी होते हो जब तुम्हारा स्वयं का अधिकार नहीं होता; अन्यथा कोई तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकता। पसंदीदा भोजन या पसंदीदा वस्तु में मिलने वाला आनंद क्षणिक होता है। पूर्ण आनंद केवल ब्रह्मानंद में प्राप्त होता है। उस आनंद को कोई और चुरा नहीं सकता।

यदि चित्त निर्मल हो, तो मन शांत रहता है। शांत मन वाला व्यक्ति मधुर वाणी बोलता है। मनुष्य में जो गुण होना चाहिए, वह है मृदुता। अपने मन को शांत रखना तुम्हारे ही हाथ में है।

मन अनगिनत कल्पनाएँ रचता है। निरर्थक चिंताओं में उलझता है। यही चिंता अंततः स्वास्थ्य को बिगाड़ती है।सत्य का व्रत, शास्त्रों का श्रवण, मनन, प्राणायाम, योग, और ध्यान, ये सभी मन को नियंत्रित करने के उत्तम साधन हैं।

मन पर नियंत्रण होना चाहिए। भय पैदा करने वाला भी मन है, और भय को दूर करने वाला भी मन। आपदा लाने वाला भी मन है, और आपदा को हटाने वाला भी मन। मन की आज्ञा का पालन करने वाली शक्ति कार्य करती है।

यदि एक शक्तिशाली शासक का मन शांत और मजबूत हो, तो वह सभी शक्तियों को नियंत्रित करके संसार को शांतिपूर्ण और आनंदमय बना सकता है। लेकिन यदि वही शासक चिंता और उत्तेजना में रहता है, तो दुनिया की सारी शक्तियाँ भी उद्विग्न हो जाती हैं और संसार अशांति से भर जाता है।

संस्कारों को प्राप्त करने के लिए इंद्रियों के माध्यम से भीतर प्रवेश करने वाली वस्तुओं के चयन में सतर्कता होनी चाहिए। मन इंद्रियों से प्रभावित होता है। तुम अपनी आँखों से क्या देख रहे हो, कानों से क्या सुन रहे हो, त्वचा से क्या छू रहे हो, जीभ से क्या स्वाद ले रहे हो, नाक से क्या सूंघ रहे हो — इन सबका असर सीधे मन पर होता है। इससे मन उत्तेजित और अशांत हो जाता है।

जिसे तुम आश्रय देते हो, वही तुम्हारी बुद्धि पर प्रभाव डालता है।

जो अपने लक्ष्य पर अडिग रहता है, वही बलवान, गुणवान और धैर्यवान होता है।

जब मन पवित्र और परिपुष्ट होता है, तभी लक्ष्य की सिद्धि संभव होती है।

तुम्हारा मन अच्छा है या बुरा, इसका साक्षी केवल तुम स्वयं ही है।

जितनी बार तुम अपने संकल्पों में दूसरों से द्वेष करते हो, उतनी बार तुम बुरे मन के साथ रहते हो। जितनी बार तुम दूसरों के अच्छे कार्यों को याद करते हो, उतनी बार तुम अच्छे मन के साथ रहते हो। जितना तुम अच्छे मन के साथ रहते हो, उतना ही शांत रहते हो। जितना तुम शांत रहते हो, उतने ही अच्छे शब्द बोलते हो और अच्छा व्यवहार करते हो।

बुद्धि ही मार्गदर्शन करती है और निर्णय लेती है। बुद्धि हमेशा अच्छे की ओर ले जाती है। निष्पक्ष रूप से संकल्प में अच्छे-बुरे का विचार कर, पक्षपात के बिना यह बताती है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा, और सही मार्ग दिखाती है।

बुद्धि कर्म को प्रेरित करती है, और कर्म बुद्धि को प्रेरित करता है।

बुद्धि यह कहती है कि जो कार्य कल्याणकारी नहीं है, उसे नहीं करना चाहिए। जो कल्याणकारी नहीं है, उसे छोड़ देने वाला व्यक्ति महान होता है।

संसार की कोई भी वस्तु, जिसे लोग सुखदायक मानते हैं, वह वास्तव में पूर्ण सुख नहीं देती। चाहे कितनी भी वस्तुएँ हों, यदि स्थिरप्रज्ञता न हो, तो सुख-शांति नहीं मिलती। और यदि कुछ भी न हो, लेकिन स्थिरप्रज्ञता हो, तो व्यक्ति शांत रहता है।

अपने स्वभाव पर विजय पाना कठिन है। लेकिन साधना के द्वारा बुरे स्वभाव को हटाकर अच्छे स्वभाव को विकसित करना चाहिए। हृदय को प्रसन्न रखना चाहिए। तुम्हारे व्यवहार से दूसरों का मन भी प्रसन्न रहना चाहिए।

हृदय बोलता है, और उसी हृदय की भावना ही संदेश बनकर जाती है।

हर छोटी बात पर निराश होने से शरीर एक मिट्टी का पिंड बन जाता है। व्यक्ति गिर जाता है और उठ नहीं पाता। इसलिए निरंतर उत्साह बनाए रखना चाहिए।

जब विचारों की धारा पवित्र होती है, तभी मन को गलत रास्ते पर पर जाने से रुकता है और नियंत्रित रहने की स्थिति प्राप्त करता है।

अंतःशुद्धि सबसे महत्वपूर्ण है।

सभी शत्रुओं में सबसे बड़ा शत्रु शोक ही है। जो व्यक्ति यह सोचकर दुखी होता है कि मैं यह हासिल नहीं कर पाया, वह उन्नति नहीं कर सकता। शोक सबसे पहले साहस को नष्ट करता है। यह पहले सुनी गई अच्छी बातों को भुला देता है। शोक के कारण व्यक्ति उन्नति से वंचित होकर गिर जाता है। जो निरंतर उत्साही रहता है, उसके लिए जीवन में असाध्य कुछ भी नहीं है।

मन को निराशा नहीं होनी चाहिए। निराशावाद नहीं होना चाहिए। मनुष्य को आशावादी होकर ऊपर उठने का प्रयास करना चाहिए।

किसी के बारे में बात करते समय पहले उनके अच्छे गुणों को याद करो और उनकी अच्छाई के बारे में बोलना शुरू करो। इससे धीरे-धीरे यह आदत बन जाएगी। अच्छाई देखने से शांति मिलती है। बुराई देखने से क्रोध और उत्तेजना उत्पन्न होती है। जितना अच्छा देखोगे, उतना शांत रहोगे, और तुम्हारी मानसिक स्थिति सुधरेगी।

जिस वस्तु से तुम्हें प्रीति है, मन उसी के इर्द-गिर्द घूमता है। यही मन की सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। सार्थक वस्तु पर मन लगाना शक्ति है, और निस्सार वस्तु पर लगाना कमजोरी।

तुम कितने बलवान हो, यह महत्वपूर्ण नहीं; तुम्हारा मन कितना बलशाली है, यह महत्वपूर्ण है।

अपने धर्म और कर्तव्य को भूलकर अनावश्यक कार्यों में नहीं पड़ना चाहिए। अनावश्यक विषयों का अध्ययन नहीं करना चाहिए। जो कार्य करने की आवश्यकता नहीं, उसे करने की कोशिश करना और जो कार्य करना चाहिए, उसे छोड़ देना, इससे न केवल स्वयं का नाश होता है, बल्कि दूसरों को भी हानि होती है और अधर्म अनियंत्रित रूप से बढ़ता है।

मन कितना पवित्र और शक्तिशाली है, यह सबसे महत्वपूर्ण है। कोई व्यक्ति शारीरिक बल के बिना भी, अपने मन की पवित्रता और शक्ति के द्वारा समाज के लिए महान उपकार कर सकता है।

मन पवित्र होता है, और उस मन को हमेशा पवित्र वस्तुओं को ग्रहण करने का प्रशिक्षण देने वाला जीव इसके द्वारा उन्नति प्राप्त करता है।

मन को संस्कारित करने का एकमात्र मार्ग है- शास्त्रों को जानना, अच्छी तरह विचार करना, शास्त्रों का अध्ययन करना, और सीखे हुए को अभ्यास व साधना के द्वारा आचरण में लाना। इससे मन संस्कारित होता है।

अपने मन को संस्कारित करो। उसे उस दिशा में मोड़ो जो ग्रहण करने योग्य है। यही अभ्यास है। जैसे एक अवश घोड़े को वश में करना। अभ्यास के माध्यम से ही वश में करने की बुद्धि प्राप्त होती है।

यदि तुम अपने मन को वश में कर सको, अनावश्यक मोह से मुक्त हो सको, अपनी आकांक्षाओं को लोक कल्याण के लिए बदल सको, और तुम्हारे सभी कार्य लोक प्रीति के लिए हों, तो तुम लोक के लिए कल्याणकारी कार्य करने वाले और अपने कर्तव्य का निर्वहन करने वाले के रूप में यशस्वी बनोगे।

47. सत्य

वाणी और मन का एकाकार होकर बोलना ही सत्य है।

सत्य बोलते समय भी अप्रिय बातें नहीं बोलनी चाहिए। केवल प्रिय और उपयोगी वचन ही बोलना उचित है।

सामने वाले में दोष दिखाकर, “मैं तो सच ही कह रहा हूँ” ऐसा सोचकर बोलना धर्म सम्मत नहीं है, भले ही वह बात सत्य क्यों न हो।

वाणी सदैव प्रिय होनी चाहिए। एक शब्द भी बोलो, तो उसमें सामने वाले के लिए कुछ लाभ हो, उसमें सुधार का बीज हो, और वह उद्धार का साधन बने।

वाणी अज्ञान को भस्म करने की शक्ति रखती है।

जो व्यक्ति वाणी को तपस्या मानकर, वाणी से किसी को चोट न पहुंचाते हुए, सत्य को प्रतिष्ठित करते हैं — वे उत्तम मनुष्य हैं। उन्हें अपनी वाणी पर पूर्ण नियंत्रण होता है।

जो नहीं कहना चाहिए वह कहने से, शांतचित्त लोगों में भी क्रोध उत्पन्न होता है, जिससे अशांति फैलती है। लेकिन अगर उचित वचन बोला जाए, तो अशांत व्यक्ति भी शांत हो सकता है।

जो देखते हो, सुनते हो, बोलते हो, और जिस तरह व्यवहार करते हो, वह उन्नति की ओर ले जाना चाहिए और लाभकारी होना चाहिए।

वाणी पर नियंत्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है। जो भी बोलो, मन और वाणी का समन्वय करके बोलने की आदत डालनी चाहिए। जो सत्य है, वही बोलना चाहिए।

सत्य को तप के रूप में अपनाने वालों की वाणी अद्भुत शक्ति प्राप्त करती है।

वाणी प्राण ले सकती है, प्राण दे सकती है, नष्ट कर सकती है, और उद्धार का कारण बन सकती है।

वाणी की शक्ति बहुत प्रबल है। यह अस्त्र-शस्त्र से भी अधिक शक्तिशाली है। तपस्वी व्यक्ति अगर जल्दबाजी में कुछ वचन बोल देता है, तो सामने वाले को कितना कष्ट हो सकता है, इसका विचार करना चाहिए।

योगी के मन में जो होता है, वही वाणी के रूप में बाहर आता है।

जो सदैव असत्य बोलता है, उसकी वाणी इतनी निर्बल हो जाती है कि एक बच्चा भी उसे नहीं सुनना चाहता। भले ही वह बाद में सच बोले, उसकी बात असर नहीं करती। लेकिन जो व्यक्ति सदैव सत्य बोलता है, उसकी वाणी में असीम बल होता है, वह संपूर्ण संसार को प्रभावित कर सकती है।

अमंगलकारी बातें न बोलो, न सुनो।

धर्म की रक्षा के लिए वाणी को हथियार बनाना चाहिए। वाणी परिस्थितियों को बदल सकती है। वाणी किसी भी महान विशेषता को एक दिशा से दूसरी दिशा में मोड़ सकती है। वाणी का वैभव होना चाहिए।

वाणी कितनी भी दूर तक जा सकती है। इतनी शक्तिशाली वाणी मनुष्य को प्राप्त है। इसका मूल्य समझकर इसे बहुत सावधानी से उपयोग करना चाहिए। यदि वाणी का सही उपयोग न किया जाए, तो यह स्वयं के पतन का कारण बनता है। जो वाणी का सही उपयोग करते हैं, वे उन्नति करते हैं और उद्धार पाते हैं।

सत्य की दीक्षा से तुम यश के साथ रहते हो।

धर्म में सत्य प्रतिष्ठित होता है। यदि धर्म को छोड़ दिया जाए, तो सत्य और धर्म दोनों छूट जाते हैं। सत्ययुक्त धर्म को धारण करना चाहिए।

सत्य को पकड़कर धर्म छोड़ना या धर्म को पकड़कर सत्य छोड़ना, दोनों ही खतरनाक हैं।

जो अपरिवर्तनीय है, उसे सत्य कहते हैं। जो देश, काल, और परिस्थितियों के अनुसार बदलता है, उसे धर्म कहते हैं।

सत्य और धर्म के प्रति ही प्रतिबद्ध रहना चाहिए, इसके सिवा किसी और चीज़ के प्रति नहीं। हर समय सत्य और धर्म के मार्ग को अपनाने की इच्छा रखनी चाहिए।

देश, काल, और परिस्थितियों के अनुसार सत्य के मामले में धर्माधिकारियों को छूट मिलती है।

यदि मन का उद्देश्य समाज के कल्याण के लिए हो, तो कुछ परिस्थितियों में कर्तव्य धर्म के रूप में सत्य बोलने का अभिनय किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक रक्षक यदि चोर की रणनीति जानने के लिए चोर की तरह व्यवहार करता है और समाज हित के लिए झूठी वाणी बोलता है, तो वह असत्य नहीं है। उसकी हिंसा भी हिंसा नहीं है। वह मन में जनकल्याण की कामना रखकर बाहर से असत्यवादी का अभिनय करता है, लेकिन उसे कर्तव्य के रूप में धर्म का पालन करने वाला माना जाना चाहिए।

असत्य वाणी और हिंसा के मामले में छूट के विषय में धर्म की सूक्ष्मता को समझकर ही कार्य करना चाहिए। यह बहुत संवेदनशील विषय है। बिना पर्याप्त समझ और विचार के सामान्य सिद्धांत के रूप में असत्य वाणी बोलना या हिंसा करना उचित नहीं है। ऐसा करना भी अधर्म ही बन जाता है।

जब तुम यह संतोष अनुभव करते हो कि मैंने धर्म को बनाए रखने और धर्म में प्रतिष्ठित होने का परम अद्भुत अवसर प्राप्त किया, उस दिन तुम धन्य हो।

यदि तुम धर्मदेवता का सहयोग पाना चाहते हो, तो तुम्हें स्वयं धार्मिक होना होगा। तभी तुम्हें उनकी कृपा प्राप्त होगी।

जो व्यक्ति राज्य को धर्म के मार्ग पर चलाने के लिए खड़ा होता है और जो उसमें सहयोग करता है — वही इस संसार के सच्चे रक्षक होते हैं।

भक्ति के साथ रहना सबसे श्रेष्ठ है।

जिस सत्य को शास्त्र बताते हैं, जिस सत्य पर यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड टिका हुआ है — उस परम सत्य का ही आधार धर्म है।

यदि अभी असत्य बोलकर कष्ट से बच सकते हो, लेकिन यह स्थायी रक्षा नहीं है। अभी सत्य बोलने से भले ही कष्ट आए, लेकिन सत्य तुम्हें स्थायी रूप से रक्षा करेगा। चाहे कितने भी कष्ट आएँ, कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए और कभी सत्य को नहीं छोड़ना चाहिए।

शासक ही धर्म है, शासक ही विजय है, शासक के कारण ही विश्व को रक्षा मिलती है। जिस दिन शासक धर्म से भटकता है, उस दिन विश्व में रक्षा नहीं रहती। कोई भी सुखी और आनंदमय जीवन नहीं जी सकता।

शासक और अधिकारी को जनता और कर्मचारियों के साथ ऐसा रहना चाहिए, जैसे पिता अपने पुत्र के साथ रहता है।

जैसे छैनी पर हथौड़ी का वार पत्थर को रूप देता है, वैसे ही धर्मशास्त्र से निकलने वाले वचन यदि मन पर पड़ें, तो मन के दोष मिटकर उसके भीतर छिपा सत्य प्रकाशमान होता है। तब मन सात्त्विक बन जाता है। शास्त्र का अभ्यास भी तपस्या के समान है।

सुख और शांति कहाँ से आते हैं, इसका स्थान जान लेना चाहिए।

मन में कैसी पवित्रता होनी चाहिए, इस पर ध्यान देना चाहिए। यदि मन में संस्कार नहीं हैं, तो तुम कितना भी कर लो, कोई लाभ नहीं।

जितने समय तक धर्म बना रहेगा, उतने समय तक समाज समृद्ध रहेगा।

परिस्थितियों की उथल-पुथल से विचलित न होने वाला व्यक्तित्व होना चाहिए। जो मन अस्थिरता के आगे झुक जाता है, उससे अच्छे निर्णय नहीं निकलते। जो अपनी स्वस्थ स्थिति से विचलित हुए बिना साक्षी भाव से विषयों को देखकर निर्णय ले सकते हैं, वही महान निर्णय लेने में सक्षम होते हैं।

ईश्वर वह है जो हृदय की गहराई तक जानता है। बाकी लोग केवल बाहर से दिखने वाली चीजें जानते हैं। इसलिए हृदय को जानने वाले ईश्वर के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए।

यह स्थिति होनी चाहिए कि मैं जो किया वह सत्य है। यदि तुम कोई निर्णय लेकर कोई कार्य करते हो तो उसके बाद यह भावना न आए कि मैंने गलती की है, बल्कि यह कह सको कि मैंने जो किया वह यथार्थ है — तभी वह कार्य करो। यदि ऐसा कहने की स्थिति न हो तो वह कार्य मत करो। यही सत्यवान के लिए प्रधान गुण है। अपने भीतर किसी दोष के बिना, धर्म को आधार बनाकर विवेक करो।

ईश्वर पर संदेह को त्यागना चाहिए और पूर्ण शरणागति को प्राप्त करना चाहिए। यदि बुद्धि में कोई भ्रम या कमजोरी न रखते हुए तुम पूर्ण समर्पण कर सको, तो ईश्वरीय अनुग्रह अवश्य प्राप्त होगा। संदेह तुम्हें कष्ट देता है। लेकिन पूर्ण शरणागति साहस, शांति, और आनंद देती है।

चिता एक बार जलाती है, लेकिन चिंता हर क्षण जलाती है।

काल अपने प्रबल स्वरूप से स्वयं ही अपने फल देने के लिए तुम्हारी बुद्धि को मोह में डालता है। मोह उत्पन्न करके वह वैर और कामना को जन्म देता है। तुम्हें तुम्हारे कर्मफल का अनुभव करना ही होता है। यह पूरी योजना इसी उद्देश्य से रची गई है—कि तुम अपना प्रारब्ध फल भुगतो। यह सब प्रत्येक व्यक्ति के अपने-अपने कर्मों का ही परिणाम है।

धन (अर्थ) को धर्मानुसार कमाना चाहिए। काम भी धर्मानुसार होनी चाहिए। धर्म के विपरीत अर्जित किया गया धन स्वयं को और समाज को जला डालता है। धर्म के विपरीत कामना व्यक्ति और समाज को दुखी करती है।

हे श्रीराम! लोग विभिन्न स्थानों में आनंद के साथ तांडव करने और मन की शांति के साथ संतोष प्राप्त करने का कारण सत्कर्म, सन्मार्ग, उच्चतम ज्ञान और धर्म हैं। जहाँ ये मौजूद होते हैं, वह स्थान समृद्ध और सुरक्षित रहता है। लोगों द्वारा अनुभव की जा रही दुर्घटनाओं और दुरावस्थाओं का कारण दुष्कर्म, दुराचार, अज्ञान और अधर्म हैं। जहाँ अधर्म होता है, वहाँ लोग दुखी, पीड़ित और कष्टों से ग्रस्त होते हैं।

48. ज्ञान

ज्ञान की खोज और ज्ञान अर्जन के द्वारा ज्ञान की संपदा प्राप्त करनी चाहिए। सभी संपदाओं में सबसे उत्तम संपदा ज्ञान की संपदा है।

जिन विवेकियों के पास ज्ञान की संपदा होती है, वे बुद्धि बल वाले लोग ही श्रेष्ठ उद्देश्य को लक्ष्य बनाकर रखते हैं।

सत्य वस्तु को समझने के लिए ज्ञान रूपी प्रकाश की आवश्यकता होती है। ज्ञान के प्रकाश में ही यथार्थ वस्तु दिखाई देती है। यदि प्रकाश न हो, तो अंधेरे में गंदगी और चोर में अंतर नहीं समझा जा सकता, जैसे रस्सी और साँप में अंतर नहीं समझा जाता। जब तक ज्ञान का प्रकाश नहीं होता, तब तक सत्य और असत्य में भेद नहीं समझा जाता। सत्य वस्तु को समझने के लिए ज्ञान का प्रकाश होना चाहिए, और इसके लिए शास्त्रों को जानकर धर्म के ढांचे में जीना चाहिए।

जिनमें ज्ञान की खोज करने की सामर्थ्य होती है, वे अपने स्थान पर सभी भयों को त्यागकर दसों दिशाओं में शोभायमान होते हैं।

विवेकशील व्यक्ति ही अंत में सभी में और सबके बीच श्रेष्ठ बनकर विजय प्राप्त करता है। वह इन आपदाओं से रक्षा करता है।

पूर्ण ज्ञान से बुद्धि बल प्राप्त करने वाला जीव शम (शांति) और संतोष का आश्रय लेने की सलाह देता है।

49. शौच (शुद्धता)

शौच सबसे महत्वपूर्ण धर्म है।

शौच दो प्रकार का होता है – (1) बाह्य शौच, (2) आंतरिक शौच। बाह्य शौच का अर्थ है शरीर को स्वच्छ रखना, और अपने आस-पास के वातावरण को साफ-सुथरा बनाए रखना। आंतरिक शौच का अर्थ है मन को पवित्र और निर्मल बनाए रखना।

शरीर सत्य को जानने और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक साधन है । इसलिए शरीर को स्वच्छ और पवित्र रखना आवश्यक है।

हृदय को स्वच्छ रखना चाहिए।

जो लोग दूसरों के प्रति ईर्ष्या और द्वेष पालते हैं, वे कैसे पतन को प्राप्त होते हैं – यह कोई नहीं कह सकता। लेकिन इतना निश्चित है कि ईर्ष्या और द्वेष रखने वाले अवश्य पतित होते हैं।

आंतरिक शौच में शुभ गुणों को प्रयत्नपूर्वक धारण करना चाहिए। असहनशीलता को घटाकर सहनशीलता और धैर्य को बढ़ाना चाहिए।

यदि शुभ गुणों को भीतर लाने का प्रयास किया जाए, तो व्यक्ति सदा उत्तम विचार ही करता है। मन में जो विचार आते हैं, बुद्धि का स्वरूप भी वैसा ही बनता है।

जब भीतर उत्तम विचार होते हैं, तब उत्तम संकल्प उत्पन्न होते हैं। और जब संकल्प शुभ होते हैं, तब कर्म भी श्रेष्ठ होते हैं।

यदि व्यक्ति उत्तेजक दृश्य देखता है, उत्तेजक बातें सुनता या बोलता है, तो उसका मन शांत नहीं रह सकता।

पात्र (बर्तन) कभी शुद्ध न था, ऐसा नहीं है। वह पहले शुद्ध था, परंतु बाद में उसमें मलिनता चिपक जाती है। जैसे मलिन बर्तन को साफ करने के लिए साबुन या पदार्थ का उपयोग किया जाता है, वैसे ही मन की मलिनता को दूर करने के लिए धर्म शास्त्र ही उपाय है।

सभी का मन मूल रूप से अच्छा ही होता है, लेकिन समय के साथ ईर्ष्या, द्वेष, और स्वार्थ जैसी मलिनताएँ उससे चिपक जाती हैं। इन मलिनताओं को साफ करने के लिए सत्कर्म, धर्म शास्त्र आदि हैं। धर्म शास्त्र को समझकर और उसका आचरण करने से चित्त शुद्ध होता है। शुद्ध चित्त मन को शांत बनाता है, जो तुम्हें और विश्व को उन्नति की ओर ले जाता है।

जीव स्वभाव से बुरा नहीं होता, बल्कि उसके द्वारा अर्जित गुण बुरे हो सकते हैं।

जब चित्त शुद्ध हो जाता है, तो कभी न कभी ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान के कारण अज्ञान नष्ट हो जाता है, और यह समझ आता है कि सर्वत्र केवल एक ईश्वर ही है। पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए सत्कर्म और सन्मार्ग दिखाने वाले धर्म मार्ग को अपनाना चाहिए।

क्रोधपूर्ण चिंतन करने से जिसके पतन की बात सोची जा रही है, वह शक्ति प्रतिशोध में बदल जाती है, जिससे या तो उसका अंत होता है या अपनी प्रतिक्रिया के कारण स्वयं का अंत हो जाता है। क्रोधपूर्ण चिंतन केवल प्रतिकार की शक्ति को बल देता है, जबकि अन्य शक्तियाँ निष्क्रिय हो जाती हैं। इससे व्यक्ति को अपनी हानि का भी बोध नहीं रहता, और उसकी इंद्रियाँ इतनी कमजोर हो जाती हैं कि वह उन्मादी हो जाता है।

शुद्ध चिंतन करने से शास्त्र-संबंधी जिज्ञासा उत्पन्न होती है और उससे शास्त्रीय बुद्धि प्राप्त होती है। शुद्ध चिंतन से व्यक्ति महाज्ञानी और महान पंडित बनने की शक्ति तथा सामर्थ्य प्राप्त करता है। ये शक्तियाँ उसकी साधना और अभ्यास के अनुसार इस जन्म में अथवा भविष्य के जन्मों में प्राप्त हो सकती हैं। यदि इस जन्म में न भी मिलें, तो पूर्व अनुभवों और वासनाओं के कारण अगले जन्म में वह शुद्ध चिंतन के अनुरूप कार्य करते हुए अंततः सफलता प्राप्त करता है।

50. शरीर – उपयोगिता

जो व्यक्ति नाव का उपयोग करता है, वह नदी पार कर लेता है। जो नाव को देखकर प्रसन्न हो जाता है और यह सोचकर कि नाव को कुछ हो न जाए, उसका उपयोग नहीं करता, उसके लिए वह नाव किसी काम की नहीं रही। उसी प्रकार, शरीर का भी उपयोग उपयोगिता लिए करना चाहिए।

उच्च लोकों तक पहुँचने के लिए भी शरीर का उपयोग उद्देश्यपूर्ण ढंग से करना पड़ता है। तभी शरीर उन्नति कर सकता है। जो इस नाव का सही उपयोग करते हैं, वही नदी पार करते हैं।

शोक और भय से बड़ा कोई शत्रु नहीं। जिसके मन में शोक और भय उत्पन्न होते हैं, वे उसके लिए ये दोनों सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं । शोक के कारण साहस नष्ट होता है और मन कमजोर पड़ता है। चाहे कितने भी साधन हों या सामर्थ्य हो, यदि मन कमजोर पड़ता है, तो सब व्यर्थ हो जाता है।

भय के समान कोई शत्रु नहीं, और साहस के समान कोई मित्र नहीं। उत्साही व्यक्ति के लिए कष्ट जैसा कुछ नहीं होता। उत्साह वाला व्यक्ति प्रयास से खड़ा हो सकता है। उत्साहहीन व्यक्ति के पास चाहे कितने साधन हों, वह कुछ नहीं कर पाता।

जब किसी को अपने कर्तव्य का स्मरण होता है, जब उसे अपने धर्म की पहचान होती है, और वह अपने कार्य के लिए उत्साहित होता है, तो वह कुछ भी हासिल कर सकता है।

     51. देही – शरीर

श्री राम! दिव्य शरीर (देही) ही ईश्वर के रूप में मोक्ष को धारण करता है। प्रत्येक जीव या मनुष्य स्वभाव से ईश्वर के रूप में ही है, लेकिन वह बुद्धि से इसे ग्रहण नहीं कर पाता। वह इस भाव को अनुभव में नहीं ला पाता। समय के साथ यह दैवी भाव अनुभव में आता है।

देही (आत्मा) ने देह (शरीर) को धारण किया है।

शरीर के भीतर जो आत्मा है, वही मैं हूँ। यह निश्चित करना चाहिए कि शरीर मेरे संकल्पों और इच्छाओं को सहयोग देने वाली शक्ति है।

सबसे शक्तिशाली उपकरणों से देखी गई चीज को सत्य मान लिया जाता है, लेकिन यह समझना चाहिए कि वह उस समय की उपाधियों (सीमाओं) के साथ होती है। वह नित्य नहीं है। जो आत्मा उस चीज को दिखाने का कारण है, वही नित्य और सत्य है। उसे न देखा जा सकता है, न छुआ जा सकता है, और न ही कोई उसे नष्ट कर सकता है।

आत्मा में कोई विकार (परिवर्तन) नहीं होता। मन में विकार होते हैं, और मन के विकारों पर प्रतिक्रिया करने वाली और विचलित होने वाली शक्ति है। यह शक्ति फिर मन को विचलित करती है।

आत्मा का नया दर्शन नहीं होता; आत्मा केवल जानी जाती है। जो है, वह आत्मा ही है। आत्मा, मन, और शक्ति अलग-अलग तीन नहीं हैं; ये आत्मा की तीन अवस्थाएँ हैं।

‘मैं’ वह साक्षी है जो भीतर है। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। यह सभी परिवर्तनों को जानता है।

सभी मनुष्यों को आत्म ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यह निश्चित करना चाहिए कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ’। आत्मा ही मैं हूँ। इसकी शक्ति सर्वव्यापी है। यह नष्ट नहीं होती, पानी से गीली नहीं होती, आग से जलती नहीं। इसका कोई नाश नहीं। यही मैं हूँ। इस निश्चय तक पहुँचना ही आत्म ज्ञान है। इस स्थिति में स्थिर रहने वाले जीवन्मुक्त होते हैं।

बचपन का शरीर यौवन में बदल जाता है। जो बदल रहा है, वह जीव नहीं, शरीर है। देश, काल, और परिस्थितियों में शरीर ही जीव को अनुभव देता है। शरीर बदलता है, लेकिन देही (आत्मा) परिवर्तन का अनुभव करता है।

जो जान रहा है, वही सच्चा ‘मैं’ है। यह सत्य है। यह सब कुछ साक्षी के रूप में देखता है। अपरिवर्तनीय आत्मा बदलते शरीर को जानती है। जानने वाली आत्मा में परिवर्तन नहीं होता, लेकिन जिसे जाना जा रहा है, उस शरीर में परिवर्तन होता है। काल में शरीर चला जाता है, लेकिन देही नहीं जाता। वह अपने अगले प्रवास के लिए दूसरा शरीर चुनता है।

चाहे तुम कितनी वस्तुएँ बदलो, कितने वाहन बदलो, कितने घर बदलो, तुम स्वयं नहीं बदलते। तुम जीर्ण और बेकार चीजों को छोड़ते रहते हो।

जिस शक्ति ने शरीर को बनाया, वही शक्ति तुम्हारे संकल्पों और इच्छाओं के अनुसार उचित शरीर प्रदान करती है।

ब्रह्म (आत्मा) को देखने के लिए यह बाहरी नेत्र पर्याप्त नहीं है। मांस की आँखों से केवल संसार को देखा जा सकता है। केवल ज्ञान नेत्रों या दिव्य दृष्टि से ही शरीर में स्थित परमात्मा का दर्शन किया जा सकता है।

माया की कृपा से ही परमात्मा का दर्शन हो सकता है।

तुमने जो कर्म किया, वही कर्म तुम्हारे शरीर प्राप्त करने का कारण है।

जब शरीर रहने योग्य नहीं रहता, तब देही (आत्मा) शरीर को छोड़ देता है। जैसे उसने पहले कोई और शरीर छोड़कर यह शरीर धारण किया था, वैसे ही यह शरीर छोड़कर कोई और शरीर धारण करता है। जो ज्ञानी होता है, वह इस सत्य से डरता नहीं है।

जो आत्मा के सत्य को सही ढंग से जान लेते हैं, वे भय नहीं रखते।

जीव को पिछले जन्मों की स्मृतियाँ याद न आएँ, इसे नियंत्रित किया जाता है। यदि ये स्मृतियाँ आ जाएँ, तो पुराने अनुभव और पुरानी शत्रुता के कारण उसका जीवन पतन की ओर चला जाता है। प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। एक अन्य कारण यह है कि प्रकृति द्वारा जीव की विविधता में बनाए रखने वाले धर्म में बाधा उत्पन्न होती है। अपने जीवन की चिंता किए बिना, ईश्वर की शरणागति लो और अपने कर्तव्य का पालन करो। तुम्हें कहाँ होना चाहिए, यह ईश्वर तय करता है।

पिछले जन्मों की स्मृतियों के कारण सृष्टि के कार्य में विघ्न पड़ता है।

यदि पिछले जन्मों की वासनाएँ या स्मृतियाँ आती हैं, तो वह जीव उद्धार नहीं पाता।

जैसे बचपन में प्राप्त अनुभवों से यह ज्ञान होता है कि कुछ चीजें दोबारा नहीं करनी चाहिए, वैसे ही पूर्व जन्मों में सीखे गए अच्छे-बुरे अनुभव संस्कार ज्ञान के रूप में वर्तमान जीवन में सामने आते हैं। अच्छा अनुभव और बुरा अनुभव दोनों आते हैं। बुराई को गुप्त रखकर और अच्छाई को जागृत करके जीवन को उन्नति की ओर ले जाया जा सकता है।

धर्म चिंतन के कारण विधि (नियति) व्यक्ति को सही मार्ग पर ले जाती है, स्वतंत्रता प्रदान करती है, और मोक्ष के निकट लाती है।

वर्तमान जन्म के लिए, भविष्य में होने वाले अगले जन्मों में जो बुद्धि और ज्ञान प्रदान किया जाएगा, उसके लिए तुम ही कर्ता हो।

पुनर्जन्म का कारण ईश्वर नहीं, बल्कि मन है। मन के द्वारा ही मनुष्य उद्धार पाता है।

ईश्वर तुम्हें प्रत्येक उपाधि में एक विशेष अधिकार और विभूति के रूप में प्रवेश देता है। तुम्हें केवल उस कर्तव्य को निभाना है।

जो है, वह शुद्ध चैतन्य ही है। जो है, वह वैसा ही नहीं जाना जाता। वह एक महान स्वर्ण पात्र है, जो मलिनता से ढका हुआ प्रतीत होता है। स्वर्ण पात्र पर विश्वास करने के लिए मलिनता को हटाना होगा। तभी वह विशुद्ध आत्म चैतन्य स्वयं के रूप में प्रकट होता है।

आत्मा सभी का साक्षी है। साक्षी के रूप में रहते हुए वह पतन का भी साक्षी है। यह समझ लेने के बाद कि वह अविनाशी, अक्षय, और नष्ट न होने वाली वस्तु है, उसी क्षण वह ईश्वर के पर्याय के रूप में जाना जाता है। वह स्वयं ईश्वर के रूप में, ज्ञान प्राप्त कर, ईश्वर के रूप में स्थिर हो जाता है। इस स्थिति तक पहुँचने के लिए साधना प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण है।

मन और इंद्रियों की सूक्ष्म गतिविधियों को साक्षी के रूप में देखकर ग्रहण करना चाहिए। दुष्ट भावनाओं को सूक्ष्म अवस्था में ही समाप्त कर देना चाहिए। इससे अंतर्मुखता की रीति बनती है। आत्मा का परिशीलन आदत बन जाता है। आत्मा नामक एक वस्तु है, इस प्रज्ञा का विकास होता है।

विद्यमान चैतन्य की विशेषता यह है कि उसका न कोई नाम है, न रूप है, न अभिव्यक्ति है। वह न प्रकाश है, न अंधकार; उसमें कोई क्रिया नहीं है और न ही उसका कोई मापन है। वह केवल चैतन्य स्वरूप है — न कारण, न कार्य। वह न अंधकार है, न तेज। उस एकत्व को शास्त्रों ने अनेक नाम दिए हैं — ऋतं, आत्मा, परब्रह्म, सत्य, दैव। वह शुद्ध चित्-स्वभाव है। उसी से जगत् विवर्त-भाव प्राप्त कर व्यक्त होता है।

मन जो दृश्य पकड़ता है, वही विश्व है। उसकी अनुभूति ही जगत है। जब तक अनुभूतियों के साथ तादात्म्य रहता है, तब तक अधिष्ठान का बोध नहीं होता। जब ज्ञान प्राप्त होता है, तभी वास्तविकता की पहचान होती है।

विभिन्न आकृतियों में दिखने वाला पदार्थ वही ईश्वरीय तत्व है। यह चित् शक्ति के कारण विभिन्न रूपों में प्रकट होता है।

जैसे समुद्र को आधार बनाकर लहरें आती-जाती हैं, वैसे ही आत्म चैतन्य को आधार बनाकर विषय उत्पन्न होते, बढ़ते और समाप्त होते हैं। विश्व से अलग और उससे परे अखंड सच्चिदानंद स्वरूप स्थिर रहता है। दैवीय स्वरूप वाला आत्म चैतन्य ही तुम्हारी दृष्टि में होना चाहिए।

52.  शम (आंतरिक शांति)

जीव को सदा शम (शांति) रखनी चाहिए। शम का अर्थ है शांत चित्त।

जिसने शम प्राप्त कर लिया, उसका मन सदा शांत और निर्मल रहता है। उसमें कोई भ्रांति नहीं होती। वह इच्छा-रहित होता है। वह कुछ भी पाने की लालसा नहीं करता और न ही कुछ खो देने की चिंता करता है। वह सदा शांति की स्थिति में होता है।

शम ही श्रेय (कल्याण) है, शम ही परम पद है, शम ही शांति है, और शम ही भ्रांति को दूर करता है।

जिसके हृदय में शम रूपी चंद्रमा प्रकाशित होता है, उसका हृदय सदा शांत रहता है।

विश्व की सभी वस्तुएँ प्राप्त होने से जो आनंद मिलता है, वह शम से प्राप्त आनंद की तुलना में तुच्छ है।

शांत व्यक्ति सभी जीवों के प्रति दयार्द्र हृदय और मैत्री भाव रखता है। सभी लोग उसके प्रति प्रेम भाव रखते हैं।

जो व्यक्ति समत्व और शम का पालन करता है, वही वास्तव में जीवित माना जाता है। बाकी लोग, भले ही जीवित हों, जीवित जैसे नहीं हैं।

जो कुछ भी सुनने, स्पर्श करने, देखने, स्वीकार करने, या कोई कर्म करने पर न तो उत्तेजित होता है और न ही दुखी होता है, वही शांत व्यक्ति है।

शांत गुण वाला व्यक्ति इस सृष्टि में सभी को समान प्रेम भाव से देखता है।

शांति के साथ साहस का गुण भी जुड़ा होता है।

केवल शम वाला व्यक्ति ही तेजस्वी (आभामय) बनता है

शांति रूपी अमृत को कोई चुरा नहीं नहीं ले जा सकता। जो व्यक्ति ऐसी शांति को अपनाता है, वह परम पद को प्राप्त कर चुका होता है।

जैसे आकाश में उदय और अस्त नहीं होते, वैसे ही आत्म ज्ञान प्राप्त व्यक्ति में अशांति, द्वेष, स्वार्थ, भय, और दुख नहीं होते।

विचारणा के द्वारा आत्म स्थिति प्राप्त करने वाला व्यक्ति खोए हुए के लिए चिंता नहीं करता, प्राप्त हुए को अस्वीकार नहीं करता, न दुखी होता है, न तपता है। वह लहरों के बिना शांत समुद्र की तरह रहता है।

ब्रह्म पदार्थ न तो जड़ है, न शून्य। यह केवल चैतन्य और आनंद है।

53. संतोष

सदा नित्य संतुष्ट रहना चाहिए।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना या उन्हें देखकर आनंदित होना, कुछ न कुछ करना चाहिए। गीत गाना या सुनना, नृत्य करना या देखना, नाटक आदि देखने से मन संतोष और आनंद से भर जाता है।

संतोष परम कल्याण का प्रतीक है। संतुष्ट व्यक्ति में निराशा या दीनता जैसे दोष नहीं होते।

खेल खेलना या देखना, इससे मन में उत्सुकता उत्पन्न होती है और शारीरिक, मानसिक दृढ़ता एवं आनंद की अनुभूति होती है।

धर्म के साथ जो कुछ प्राप्त हुआ, उससे संतुष्ट रहना और दीनता की ओर न जाना ही संतृप्ति है। संतुष्ट व्यक्ति को जो सुख मिलता है, वह किसी और को नहीं मिलता।

संतोष से तेज बढ़ता है। यदि संतोष और प्रसन्नता न हो तो तेज भी मंद पड़ जाता है।

जैसे पानी पड़ने से आग बुझ जाती है, वैसे ही असंतुष्टि से तेज भी नष्ट हो जाता है।

सभी लाभों में सबसे बड़ा लाभ आनंद है। सभी मार्गों में श्रेष्ठ है सत्संग। सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ है विवेचना। सभी सुखों में सबसे श्रेष्ठ है शम (आंतरिक शांति)।

जब तक बुद्धि पूर्ण रूप से स्थिर नहीं होती, तब तक शास्त्रों का उपदेश सुनते हुए शिष्टाचार के साथ जीना चाहिए और धर्मानुसार पुरुषार्थ अर्जित करना चाहिए।

हे श्री राम! जो व्यक्ति धर्मशास्त्रों में वर्णित अच्छाइयों को बढ़ाते हैं, बुराइयों को दूर करते हैं और पवित्र हृदय से जीवन जीते हैं — वे ही वास्तव में दिव्यता को प्राप्त करते हैं।

श्रीराम! अभी बताए गए विषयों के साथ यदि दिव्यलोक प्रशासन प्रणाली की सुपर पावर प्रशासन युक्त शासन-नियमों का पालन और क्रियान्वयन किया जाए, तो प्रजा सुख और संतोष के साथ अत्यंत आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करेगी।

54. दिव्यलोक प्रशासन प्रणाली. (DIVINE RULE)

हे श्रीराम! सभी विषयों में धर्म को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है। किसी सामान्य वस्तु में जब कोई विशेष कर्तव्य या धर्म जोड़ा जाता है, तो वह अधिक प्रभावी रूप से कार्य करती है। जैसे एक सामान्य वाहन में शक्तिशाली इंजन का धर्म प्रदान करने से वह तेज और शक्तिशाली बन जाता है, वैसे ही किसी व्यवस्था को उच्च मूल्यों से युक्त धर्म प्रदान करने से वह व्यवस्था प्रभावी ढंग से कार्य करती है। उच्च मूल्यों, अच्छी संस्कृति, परंपराओं, और उत्कृष्ट नियमों से युक्त समाज के कारण वह देश उन्नति करता है।

लोग यह मानते हैं कि उनकी सभी सुविधाएँ राजनेता प्रदान करते हैं और क्षेत्र में उच्च-नीच स्थितियों के लिए राजनेता ही जिम्मेदार हैं। इसीलिए वे नेताओं का चुनाव करते हैं। सत्ता में आए नेता के कार्यकाल में यदि क्षेत्र का विकास नहीं होता, तो लोग फिर किसी अन्य नेता को चुनते हैं। आजकल हम देखते हैं कि लोग बार-बार नेताओं को बदल रहे हैं। वास्तव में, बदलने की आवश्यकता नेताओं की नहीं, बल्कि व्यवस्था की है। व्यवस्थाओं को संचालित करने वाला प्रशासनिक नियम (administration system) बदलने चाहिए। विकास में शासक की भूमिका होती है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रशासनिक नियम की होती है। प्रशासनिक नियम ही व्यवस्थाओं को संचालित करता है। एक शक्तिशाली प्रशासनिक नियम ही धरती को स्वर्गलोक में बदलने की शक्ति रखता है। इसे समझने के लिए एक वाहन का उदाहरण लें: जैसे वाहन में इंजन यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वैसे ही प्रशासनिक नियम लोगों को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह जितना शक्तिशाली होगा, व्यवस्थाएँ उतनी ही प्रभावी होंगी।

लोगों का कल्याण करने के सत्संकल्प के साथ आए धर्म पालकों के संकल्प पूरे नहीं हो रहे, क्योंकि शक्तिशाली प्रशासनिक नियम का अभाव है। जैसे वाहन का इंजन जितना शक्तिशाली होता है, उतने अधिक यात्रियों को ले जा सकता है, वैसे ही प्रशासनिक नियम की शक्ति जितनी प्रबल होगी, उतने अधिक लोगों को वह संचालित कर सकता है। वर्तमान में विश्व की करोड़ों जनसंख्या को संचालित करने के लिए मौजूदा प्रशासनिक नियमों की शक्ति पर्याप्त नहीं है। विश्व में अशांति, विनाश, चोरी, गरीबी, और धार्मिक विद्वेष का कारण शक्तिशाली प्रशासनिक नियम का अभाव है। अभी विश्व की जनसंख्या के लिए अब एक शक्तिशाली सुपर पावर प्रशासन प्रणाली (Divine Rule) की आवश्यकता है। इस प्रणाली को संचालित करने के लिए मनुष्यों में मानसिक बल, शक्ति, सामर्थ्य, और कौशल होना चाहिए। जैसे वाहन और इंजन अच्छा होने पर भी उसे चलाने वाला ड्राइवर कुशल और सक्षम होना चाहिए, तभी यात्री गंतव्य तक पहुँचते हैं। वैसे ही, प्रशासनिक नियम शक्तिशाली होने पर भी उसे संचालित करने वाले शासक, नेता, अधिकारी, और कर्मचारी मानसिक बल, सामर्थ्य, और कौशल से युक्त होने चाहिए।

दिव्यलोक प्रशासन प्रणाली (Divine Rule) में न महँगाई होगी, न गरीबी। सभी लोग शिक्षित, स्थिर आय, और स्वस्थ होकर आनंदमय जीवन जीएँगे। सभी को विशाल घर, अच्छी संस्कृति और परंपराओं से युक्त वातावरण प्राप्त होगा, जिससे लोग सुख-शांति के साथ जीवन जी सकेंगे। लोगों के कल्याण की कामना करते हुए देश के शासकों को दिव्यलोक प्रशासन प्रणाली लागू करनी चाहिए। लोगों को भी (Divine Rule)  प्रणाली के नियमों का पालन कर अपने धर्म का निर्वहन करना चाहिए।

(Divine Rule) प्रणाली के कारण किसी भी परियोजना के लिए धन की कमी नहीं होगी। देश के सभी लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे। सभी संसाधनों का उचित उपयोग होगा। जैसे नदी का पानी समुद्र में व्यर्थ न बहकर खेतों और तालाबों तक पहुँचाया जाता है, वैसे ही (Divine Rule) प्रणाली लोगों की सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराएगी।

लूटपाट और चोरी की दुर्दशा नहीं आएगी। भोजन के लिए भीख माँगने वाले नहीं होंगे। मिलावटी व्यापार नहीं होगा। सभी कार्य सुचारु और स्वच्छ रूप से होंगे, और प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपने कार्य में संलग्न रहेगा।

मन को आसपास का वातावरण प्रभावित करता है। मन को आह्लादकारी बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक मंदिर, खेलों के लिए उपयुक्त वातावरण, आउटडोर और इंडोर स्टेडियम, ध्यान केंद्र, कला मंदिर, दर्शक मंदिर, और मन को सुख देने वाले अनेक मंदिर स्थापित होंगे। आनंददायक उद्यान, बच्चों के पार्क, योग और ध्यान केंद्र, जिम आदि (Divine Rule) व्यवस्था द्वारा प्रदान किए जाएँगे।

हे श्री राम! जब तुमने दैवी लोक का दर्शन किया, तभी दैवी लोक निर्माण का बीज बोया गया। दैवी लोक का निर्माण सत्य है! इसे कोई रोक नहीं सकता।

हे श्री राम! तुम्हारी दृष्टि में जो नीच स्थितियाँ, अज्ञान, और अधर्म दिखाई दिए, वे अब नहीं दिखेंगे। वे सब स्थितियाँ इतिहास का हिस्सा बन जाएँगी, लेकिन तुम्हारी आँखों को वे फिर कभी दिखाई नहीं देंगी। यह भू-मंडल आह्लादकारी बन जाएगा। सभी के हृदय स्वच्छ हो जाएँगे। सभी लोग ज्ञान मार्ग और धर्म मार्ग पर चलेंगे और दैवी गुणों को प्राप्त करेंगे।

भू-मंडल पर दैवी लोक की सृष्टि होगी। सभी लोग शीघ्र ही उस दिव्यलोक में प्रवेश करने वाले हैं। दिव्यलोक के निवासी इस धरती पर आते-जाते रहेंगे।

अब तक धर्म शास्त्र में जो कहा गया, उसमें निहित अतिंद्रिय ज्ञान, विश्व रहस्य, और उपदेश मनुष्य की अंतर्दृष्टि को बदलकर मन को स्थिर करने में सहायक होंगे। आगे बताए जाने वाले कुछ और उपदेश और आदेश मनुष्य को यह निर्देश देंगे कि उसे कैसे चलना चाहिए। साथ ही, दिव्य लोक प्रशासन नियम (Divine Rule) के नियमों को स्पष्ट रूप से समझाया जाएगा।

अब तक बताए गए उपदेश, और आगे बताए जाने वाले आदेश, तथा दिव्य लोक प्रशासन नियम (Divine Rule) जब विश्व में लागू और आचरण में लाए जाएँगे, तब यह लोक दिव्य लोक के रूप में प्रकाशित होगा।

यह अखंड ज्ञान ही अमृत है। इस ज्ञान को प्राप्त करने वाले, अज्ञान के कारण मरने और कष्ट पाने वाले जीव को मुक्ति मिलती है। वह अमर हो जाता है। जो अखंड ज्ञान-अमृत को पीते हैं और उसका आचरण करते हैं, वे संसार-सागर को पार कर जाते हैं और मृत्यु को जीत लेते हैं।

धर्माचार्य: इस प्रकार दैवी शक्ति ने श्रीराम को सृष्टि के रहस्यों का उद्घाटन किया। सभा में उपस्थित लोगों से मैं मुख्य रूप से यह कहना चाहता हूँ कि सृष्टि के रहस्यों को मनुष्य को जितना जानना आवश्यक है, उतना ही जानना चाहिए। महाशक्ति ने श्रीराम को जो सभी रहस्य बताए, वे सभी मैं तुम्हें नहीं बता रहा हूँ; जितना बताना उचित है, उतना ही मैंने बताया है। तुम्हारी मानसिक शक्ति के आधार पर समयानुसार और कुछ ज्ञान तुम्हें प्राप्त होगा। दैवी शक्ति द्वारा श्रीराम को बताए गए दिव्य लोक-प्रशासन नियम (Divine Rule) मैं शीघ्र ही तुम्हें बताऊँगा। सभी लोग सुख और शांति के साथ समृद्ध होंगे।

भक्त: गुरुजी! दैवी शक्ति ने श्रीराम को जो परम सत्य बताया, उसे हमें बताने के लिए हम आपके कृतज्ञ हैं। कुछ और उपदेश, मनुष्य के आचरण के लिए आवश्यक आदेश, और दैवी लोक प्रशासन नियम को शीघ्र प्रदान करने की प्रार्थना करता हूँ।

धर्माचार्यः शीघ्र ही मैं तुम्हें उस ‘दैव-पालन’ से अवगत कराऊँगा, जो संसार को आनंद और परम शांति प्रदान करता है। अब तक जो दिव्य ज्ञान तुमने जाना है, उसका पालन करो और दूसरों को भी पालन करने के लिए प्रेरित करो। यह समझो कि तुम्हारे द्वारा किया गया प्रत्येक कार्य गिना जाता है। किसी प्रकार का संदेह न रखते हुए दैव की शरण ग्रहण करो। धर्ममार्ग पर चलते हुए लोक-उद्धार में सहभागिता करो।                                   

                                                                                                                       सब सुखी हों

                                                                                                                   “धर्मो रक्षति रक्षित”